google-site-verification=V6YanA96_ADZE68DvR41njjZ1M_MY-sMoo56G9Jd2Mk Satyam Education
latest articles

What is Demerit and solution of Current Indian Education System

1.वर्तमान शिक्षा प्रणाली के दोष एवं समाधान((What is Demerit and solution of Current Indian Education System?)-

What is Demerit and solution of Current Indian Education System
What is Demerit and solution of Current Indian Education System
भारत के स्वतंत्रता प्राप्ति को लगभग 70 वर्ष हो चुके हैं परन्तु शिक्षा प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता थी परन्तु भारत की सरकारों तथा शिक्षाविदों द्वारा इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया गया है. आज के लोकतांत्रिक भारत देश में लोकप्रिय होना तथा वोट प्राप्त करके सत्ता में बने रहना मुख्य उद्देश्य रह गया है जबकि शिक्षा व्यक्ति, समाज व देश की नींव है तथा नींव ही कमजोर होगी विद्यार्थियों तथा देश का भविष्य क्या होगा यह अनुमान लगाया जा सकता है. देश के राजनीतिज्ञों तथा शिक्षाविदों को इस शिक्षा पर ध्यान देने की आवश्यकता ही नहीं है. लोक लुभावन मुद्दों पर ध्यान देना एकमात्र मकसद रह गया है. हमारे नवयुवक विदेशों में शिक्षा प्राप्त करना गौरव समझते हैं. कोई समय था लोग विदेशों से भारत में शिक्षा प्राप्त करने के लिए नालन्दा, तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों में आते थे. इसी कारण भारत विश्वगुरु रहा है परन्तु आज की शिक्षा प्रणाली को देखकर ऐसा आभास ही नहीं होता है. आज भी शिक्षा के क्षेत्र में जो निर्णय लिये जाते हैं उनमें शिक्षाविदों का सुझाव, परामर्श पर निर्णय लिये जाते जो विदेशों में पढ़े लिखे हैं जिन्हें ठीक से भारतीय संस्कृति का ज्ञान भी नहीं है. विदेशी विद्वानों तथा विदेशों में पढ़े लिखे शिक्षाविदों को आमन्त्रित करना तथा परामर्श लेना, विश्वबन्धुत्व की भावना रखना तथा अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग लेना अच्छी बात है परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि हमारे देश की मिट्टी से जुड़े हुए जो शिक्षा शास्त्री है उनकी बुद्धि को गिरवी रख दिया जाये.
एक बात ओर आज व्यवसाय के रुप में शिक्षा क्षेत्र का चुनाव तब किया जाता है जबकि अन्य किसी क्षेत्र में जाने के रास्ते बंद हो गया हो.प्राथमिकता डाॅक्टर, इंजीनियर, बैंकों तथा सिविल सेवाओं I. A. S, RASजैसी सेवाओं को दिया जाता है. शिक्षक को समाज में सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता है बल्कि एक मुफ्तखोर की नजर से देखा जाता है. यह स्थिति हमने ही बनाई है वरना क्या कारण है कि शिक्षा के लिए अच्छी प्रतिभाओं का चयन करने के बावजूद सरकारी स्कूलों का परिणाम खराब रहता है. निजी स्कूलों का परीक्षा परिणाम तो अच्छा रहता ही है परन्तु निजी स्कूल से निकलने वाले बच्चे अनुशासित भी रहते हैं. 90%सरकारी स्कूलों की स्थिति बूचड़खानों जैसी हो गई. आखिर सोचनेवाली बात है कि एक गरीब से गरीब अभिभावक भी अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं हालांकि इसका तात्पर्य यह नहीं है कि निजी स्कूलों में बच्चों को नैतिक, आध्यात्मिक शिक्षा दी जाती है, इसमें जिम्मेदार हम सब ही एक अकेले स्कूल ही जिम्मेदार नहीं हैं. हमें यह स्थिति बदलनी होगी तथा समाज तथा देश को यह दिखाना होगा कि शिक्षक का बच्चों के भविष्य तथा एक अच्छा नागरिक बनाने में कितना योगदान होता है. ऐसा हम तभी कर शिक्षार्थीयों के प्रति समर्पित होकर, उनकी समस्याओं का समाधान करेगें. ऐसा केवल एक विषय का ज्ञाता बनने से काम चलने वाला नहीं है.अपने विषय के साथ अन्य विषयों का सामान्य ज्ञान तथा आध्यात्मिक ज्ञान में भी पारंगत होना होगा. उनका शारीरिक, मानसिक, चारित्रिक तथा आध्यात्मिक विकास की हमारी जिम्मेदारी है भले हमें सामाजिक संगठनों तथा सरकारों से सहायता मिले अथवा न मिले.

2.दोष(Demerit):-

(1.)वर्तमान शिक्षा प्रणाली में विद्यार्थियों के चिंतन, मनन, नैतिकता व चारित्रिक विकास पर ध्यान नहीं दिया जाता है.
समाधान :- वर्तमान शिक्षा प्रणाली में नैतिक तथा चारित्रिक विकास को पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया गया है. बालक के चिंतन, मनन का विकास तभी सम्भव है जब पाठ्यक्रम में आध्यात्मिक, नैतिक व चारित्रिक बातों को शामिल किया जाये तथा उनको आचरण में उतारने पर बल दिया जाये. माता-पिता तथा अध्यापकों को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है. यह तभी संभव है जब माता-पिता स्वयं भी इनको अपने जीवन में अपनाये, उनकी कथनी और करनी में कोई अन्तर न हो. बालक देखकर व अनुकरण से ज्यादा सीखता है. माता-पिता का यह दायित्व है कि वे अपने घर में इस तरह का वातावरण रखे जिससे बच्चों का नैतिक व चारित्रिक विकास हो, स्वयं दुर्व्यसनों से दूर रहे तथा अपना चरित्र शुद्ध व पवित्र रखें जिससे बच्चों पर दुष्प्रभाव न पड़े. अध्यापकों का विशेष उत्तरदायित्व है कि वे अपने आचरण को श्रेष्ठ, तप व समर्पण से युक्त रखे. वस्तुतः विद्यार्थी देखा-देखी ज्यादा सीखते हैं.
आजकल का वातावरण तथा संगति ऐसी हो गई है कि बच्चे आधुनिक सुख सुविधाओं में रहना चाहते हैं. भौतिकता तथा विज्ञान के नये नये आविष्कारों से आज युवा ही नहीं हर वर्ग चकाचौंध है क्या माता-पिता, क्या अध्यापक तथा क्या ही विद्यार्थी चारों ओर नैतिकता तथा चरित्र का पतन होता जा रहा है. आशा की किरण यही है कि उनमें कुछ शिक्षण संस्थान, ऋषि-मुनियों तथा साधु सन्तों द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों में बहुत पवित्र, भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत वातावरण उपलब्ध है तथा वे विद्यार्थियों में गुणात्मक परिवर्तन की नींव रख रहे हैं. परन्तु ऐसे विद्यार्थियों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है जो फिल्में, टी, वी, व सोशल मीडिया पर गन्दी, बेकार तथा बच्चों के कोमल दिमाग को पूर्व में परिपक्व करनेवाली अश्लील वीडियो को देखकर तथा उससे प्रेरित होकर रंगीन सपने देखते हैं. ऐसे युवा जब डिग्री लेकर वास्तविक जीवन में प्रवेश करते हैं तो जीवन की वास्तविक सच्चाइयों से सामना होने पर घबरा जाते हैं, उन्हें अपना जीवन अंधकारमय नजर आता है तथा वे अनैतिक रास्ता अपना लेते हैं. उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं देता है तथा न कुछ सोच पाते हैं कि वे क्या करे क्या न करें. ऐसी स्थिति में माता-पिता तथा अध्यापकों का दायित्व बढ़ जाता है तथा विद्यार्थियों को उनके मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है. परन्तु अभिभावक तथा अध्यापक उचित मार्गदर्शन तभी कर पायेंगे जब उनका आचरण पवित्र, शुद्ध होगा तथा सांसारिक समस्याओं का मुकाबला करने तथा उनका समाधान करने का उनको अनुभव होगा.
(2.)सुख-सुविधाएं, तकनीकी व वैज्ञानिक विकास के बावजूद तथा शिक्षण सुविधाएं कोचिंग की सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद विद्यार्थियों का उचित विकास क्यों नहीं हो रहा है?

3.समाधान (Solution):- 

वर्तमान शिक्षा प्रणाली परीक्षा केन्द्रित है जबकि प्राचीन शिक्षा प्रणाली ज्ञान केन्द्रित थी.सैद्धान्तिक तौर वर्तमान शिक्षा प्रणाली बाल केन्द्रित शिक्षा है परन्तु व्यावहारिक धरातल पर प्रत्येक बच्चे पर ध्यान नहीं दिया जाता है. इस प्रणाली में बच्चे की सोचने समझने की योग्यता का परीक्षण नहीं होता है. बच्चों के सामने नई नई समस्याएं आती हैं तो वे उसे सुलझा नहीं पाते हैं. बच्चों पर एक ही बात का दबाव रहता है कि उन्हें प्रथम तथा सबसे अव्वल आना है. अभिभावकों तथा अध्यापकों का एक ही लक्ष्य होता है कि परीक्षा परिणाम अच्छा कैसे रहे. अच्छे माता-पिता, अच्छे अध्यापक, अच्छे विद्यालय वे ही माने जाते हैं जिनके बच्चों को का परीक्षा परिणाम उत्तम रहता है. इस प्रतिस्पर्धा में बच्चों का शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक विकास गौण हो जाता है. परिणामस्वरूप विद्यार्थियों के मानसिक, चिन्तन का विकास करने बजाय रटने की प्रवृत्ति बढ़ती है. अतः पाठ्यक्रम, पुस्तकें, गाइडे सभी परीक्षा केन्द्रित हो गई है जिससे विद्यार्थियों के विकास बहुत घातक प्रभाव पड़ता है. ज्योंही परीक्षा निकट आती है विद्यार्थियों को रात-दिन पाठ्य पुस्तकें, नोट्स तथा गाइड़ो का पाठ करना, उनको रटना शुरु करा दिया जाता है. बच्चों के शारीरिक तथा मानसिक विकास नहीं हो पाता है. अतः बच्चे येन केन प्रकारेण अर्थात् नकल करके अनुचित साधनों का प्रयोग करके परीक्षा में सफल होने का प्रयास करते हैं. इस प्रकार विद्यार्थियों के मानसिक विकास का मापदंड परीक्षाफल हो गया है जिससे उनका शारीरिक, मानसिक, चारित्रिक विकास नहीं हो पाता है. ऐसी स्थिति में आध्यात्मिक विकास की बात तो सोची ही नहीं जा सकती है.

इस स्थिति को बदलना होगा बच्चों पर परीक्षा के नाम पर अनावश्यक दबाव न डालें. उनको किसी प्रकार की शारीरिक, मानसिक समस्या है तथा पढ़ाई सम्बन्धी कोई समस्या है तो उसको सुलझाने में मदद करे. परीक्षा के नाम पर अनावश्यक न तो स्वयं तथा न ही अध्यापकों पर अनावश्यक दबाव डाले. सोशल मीडिया तथा टी. वी वगैरह पर मन पर दुष्प्रभाव डालने सामग्री पर भी निगरानी रखे. उनके मित्रों का भी ध्यान रखें कोई बुरी संगति दिखाई दे प्रेम से उसे समझा दे तथा उनकी हानियों से अवगत कराये. तात्पर्य यह है कि उनके साथ मित्रवत व्यवहार करे. दिनचर्या व्यवस्थित करने में सहयोग करे. पाठ्यक्रम के अलावा भी व्यावहारिक बाते, नीति, सदाचार की बातें कहानियों के माध्यम से बताये. स्वयं भी उनके साथ बैठकर अध्ययन करने की प्रवृत्ति डाले.
Read more

what is unemployment and solution in current education

what is unemployment and solution in current education

वर्तमान शिक्षा प्रणाली में बेरोजगारी की समस्या एवं समाधान(.what is unemployment and solution in current education)-
.what is unemployment and solution in current education

what is unemployment and solution in current education 

(1.)शिक्षा की जो व्यापक परिभाषा है उसके अनुसार तो शिक्षित व्यक्ति बेरोजगार हो ही नहीं सकता है. परन्तु वर्तमान में भारत में जो शिक्षा प्रणाली प्रचलित है उसके कारण बेरोजगारी की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है.

(2.)वर्तमान शिक्षा युवाओं को साक्षर करती है जिसमें युवाओं का सर्वांगीण विकास नहीं होता है. जब तक युवाओं को विवेकवान, योग्य तथा पात्र नहीं किया जायेगा यह समस्या दिनोंदिन बढ़ती जायेगी.

(3.)वर्तमान शिक्षा प्रणाली से विद्यार्थी को मात्र डिग्री मिलती है और डिग्री प्राप्त करके उसमें अहंकार उत्पन्न हो जाता है जिससे वह परिश्रम करने से जी चुराता है, कोई छोटा मोटा व्यवसाय करना नहीं चाहता है. डिग्री प्राप्त करके सरकारी नौकरी प्राप्त करना चाहता है क्योंकि सरकारी नौकरी प्राप्त करने के पीछे सेवा करने की भावना नहीं होती है बल्कि उसके पीछे भावना है कि कम से कम काम करो, मन करे तो काम करो अन्यथा मत करो अर्थात् जिम्मेदारी बिल्कुल नहीं कोई रोकनेवाला, टोकनेवाला नहीं, कोई निरीक्षण करने वाला नहीं. वेतनमान इतना कि आराम से जिन्दगी कट जाती है, इसके अतिरिक्त समय समय पर मँहगाई भत्ता, पेंशन, ग्रेच्युअटी की सुविधा,कई प्रकार के समय समय अवकाश लेने की सुविधा. ये सब चीजें युवाओं को आकर्षित करती है. भ्रष्टाचार के रूप में ऊपर इन्कम हो जाती है वो अलग यानी पाँचो ऊँगली घी में.

(4.)जब युवाओं का शिक्षा अर्जित करने के पीछे मकसद ही यही है कि पढ़ लिखने के बाद नौकरी प्राप्त करना. इसलिए डिग्री लेने के बाद जब नौकरी नहीं मिलती है तो युवाओं का सरकार से असंतोष ही इस बात को लेकर है कि उनके लिए सरकार नौकरी की व्यवस्था नहीं कर रही है. अब सरकार सभी युवाओं को नौकरी तो दे नहीं सकती है, मात्र 10-15%को ही नौकरी दे सकती है. तात्पर्य यही है कि युवा पढ़ लिखकर करनेवाला कार्य नहीं करना चाहता है.
(5.)दूूसरा कारण है जनसंख्या का विस्फोट. भारत में जनसंख्या गुणोत्तर रुप से बढ़ती जा रही है.
(6.)तीसरा कारण है मशीनों के आविष्कार के कारण छोटे छोटे कुटीर उद्योग नष्ट होते जा रहे हैं.
(7.)चौथा कारण है कि कम्प्यूटर के कारण बीस-पचास व्यक्तियों का कार्य एक व्यक्ति ही कर सकता है.
समाधान :-(1.) मशीनों तथा कम्प्यूटरों का प्रयोग होने के बावजूद यदि युवावर्ग को सैद्धांतिक के साथ साथ व्यावहारिक शिक्षा भी दी जाये तो इसका समाधान हो सकता है. इसके लिए शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन करना होगा. आजादी मिलते ही शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन करना आसान था. अब 70वर्ष व्यतीत होने के पश्चात शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन करना आसान कार्य नहीं है परन्तु असम्भव भी नहीं है. यदि सरकार धीरे धीरे शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन करे तो दीर्घकाल में जाकर यह समस्या हल हो सकती है अन्यथा मौजूदा व्यवस्था से तो हालात ओर बिगड़ेंगे.
(2.)दूसरा समाधान यह है कि माता-पिता बचपन से ही अपने बच्चों को कोई भी हुनर सीखाना प्रारम्भ करे तो शिक्षा पूर्ण होते ही बेरोजगारी की समस्या का समाधान नहीं करना पड़ेगा.
(3.)तीसरा समाधान यह है कि यदि युवावर्ग पुरुषार्थी हो, परिश्रमी हो तो कोई भी छोटा मोटा कार्य जैसे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना, कोचिंग में पढ़ाने का कार्य, अखबार वितरण करना या अन्य कोई छोटा मोटा कार्य करना प्रारंभ करे. अर्थात् पार्टटाइम थोड़ी बहुत कला भी कला सीखनी चाहिए.


(4.)चौथा समाधान यह है कि युवावर्ग फैशनपरस्ती से दूर रहे, फिजूलखर्ची करने के बजाय बचपन से ही जो पाकेटमनी के रुपये मिले उनकी बचत करना प्रारंभ कर दे तो स्कूल, कालेज की शिक्षा समाप्त होते ही उस बचत की धनराशि से कोई भी छोटा मोटा कार्य करना प्रारंभ कर दे.
इस प्रकार युवावर्ग सरकारी नौकरी न मिलने की शिकायत छोड़कर अपना समय कठोर पुरुषार्थ, समझदारी व सुदृढ़ संकल्प को बढ़ाने के लिए करे तो बेरोजगारी की समस्या का सामना कर ही नहीं सकता है.
Read more

Who is Responsible For Education || Are Teachers Responsible

Who is Responsible For Education || Are Teachers Responsible For education

शिक्षा का उत्तरदायित्व किस पर?(Who is Responsible For Education)-

(1.)शिक्षा आजीवन चलनेवाली प्रक्रिया है इसलिए व्यक्ति एवं समाज के निर्माण में शिक्षकों, अभिभावकों, धर्मोपदेशकों, समाजसुधारकों, चिन्तकों, राजनीतिज्ञों, साहित्यकारों, कलाकारों, सुसम्पन्नों, न्यायाधीशों इत्यादि का अपने अपने ढंग का योगदान होता है. परन्तु व्यक्ति का निर्माण बाल्यावस्था एवं युवावस्था में ही प्रमुख रूप से होता है. प्रारम्भ में बालक सबसे अधिक गुरुजनों एवं अभिभावकों के सम्पर्क में रहता है. इनमें से अभिभावक शिक्षण कला में प्रवीण नहीं होते हैं ऐसी दशा में संस्कारित किस प्रकार किया जाए इससे अनजान रहने के कारण उनका इतना उत्तरदायित्व नहीं है परन्तु शिक्षक इस कर्त्तव्य से बच नहीं सकते हैं.
Who is Responsible For Education,Are Teachers Responsible

Who is Responsible For Education || Are Teachers Responsible

(2.)यदि शिक्षक यह कहकर मुक्त होना चाहे कि उनकी जिम्मेदारी मात्र पाठ्यक्रम पूर्ण करवाना है और इसी का वेतन मिलता है।पहली बात तो यह है कि पाठ्यक्रम को पूर्ण करने के अनेक साधन विकसित हो गए हैं तो अभिभावक बालकों को केवल पाठ्यक्रम पूर्ण कराने के लिए उनके पास ही क्यों भेजेंगे? दूसरी बात यह है कि ऐसी स्थिति में अभिभावकों, बालकों से यश और सम्मान नहीं मिल सकता है. तीसरी बात यह है कि उन्हें आत्मिक संतोष भी नहीं मिलेगा.
(3.)धर्मोपदेशकों, समाजसुधारकों, चिन्तकों, राजनीतिज्ञों, साहित्यकारों, कलाकारों, सुसम्पन्नों के सम्पर्क में थोड़ी देर के लिए सम्पर्क में आते हैं उतने समय में वे उनमें तीव्र उत्तेजना पैदा कर सकते हैं जो पर्याप्त नहीं है. जैसे किसी पौधे को लगाने पर एक बार पानी देने से वह विकसित नहीं होता है बल्कि उसको विकसित करने के लिए नियमित रूप से पानी देना होता है और उसकी नियमित रूप से देखभाल भी करनी होती है. इसलिए बालकों को सुसंस्कारवान, प्रतिभावान, तेजस्वी, प्रखर बनाने का कार्य वही कर सकता है जो उनके नियमित रूप से सम्पर्क में हो और इस कला को जानता हो. ऐसा व्यक्तित्व शिक्षक ही है, उसी से यह आशा की जा सकती है.
(4.)बालकों में प्रतिभा तथा संस्कारों को उभारने की जिम्मेदारी कानूनी रूप से तथा वेतनमान की शर्तों में शिक्षक की जिम्मेदारी न होने पर बाध्य तो नहीं किया जा सकता. परन्तु शिक्षक पद की गरिमा व नैतिकता के आधार पर यदि वे इस जिम्मेदारी को नहीं उठाते हैं तो समाज, अभिभावक व बालक उन्हें क्षमा नहीं करेगा और न वे सम्मान के पात्र ही होंगे.
(5.)वर्तमान शिक्षा पद्धति में सामान्यतः यही परिपाटी चल रही है कि शिक्षक मात्र पाठ्यक्रम पूरा कराके यह सन्तोष कर लेते हैं और यह सन्तोष कर लेते हैं कि उन्हें वेतन पाठ्यक्रम पूरा कराने का मिलता है इसलिए अतिरिक्त उत्तरदायित्व वे क्यों वहन करें? बालकों के जीवन निर्माण करने का उन्होंने अकेले ठेका नहीं ले रखा है और न अकेले इसके लिए जिम्मेदार हैं. इस प्रकार जब शिक्षा को मात्र व्यावसायिक दृष्टिकोण से देखा व समझा जाता हो तो देश के भविष्य की कल्पना की जा सकती है कि क्या होगी?

निष्कर्ष :- प्रश्न मानवीय मूल्यों के संरक्षण तथा उन्नत करने का है, उसे हल करना ही होगा. जैसा कि उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि शिक्षक के अलावा अन्य कोई व्यक्ति इस जिम्मेदारी को वहन नहीं कर सकता है. इसलिए इच्छा व अनिच्छा से लोक कल्याण व व्यापक दृष्टिकोण रखते हुए यह उत्तरदायित्व शिक्षकों को ही वहन करना होगा भले ही संवैधानिक, कानूनी रूप से वे बाध्य न हो परन्तु नैतिक दृष्टिकोण से वे इसके लिए जिम्मेदार समझे जाएंगे. इसका अन्य कोई विकल्प है भी नहीं. यदि इस उत्तरदायित्व को नहीं निभाया तो लोग उन्हें क्षमा नहीं करेंगे.
Read more

Education and Coaching Centre

Education and Coaching Centre

शिक्षा और कोचिंग सेंटर(Education and Coaching Centre)-

कोचिंग (Coaching) अंग्रेजी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है प्रशिक्षण, पढ़ाना, शिक्षा देना.
दूसरी ओर शिक्षा का अर्थ है सीखना, सीखाना.
(1.) इस प्रकार कोचिंग तथा शिक्षा दोनों समान अर्थ रखते हैं. व्यापक रूप में शिक्षा तथा कोचिंग का उद्देश्य है कि छात्रों का सर्वांगीण विकास (मानसिक, चारित्रिक, शारीरिक व आध्यात्मिक) अर्थात् शिक्षा छात्रों में जीवन के सुधार के लिए विवेक को जागृत करे जिससे छात्रों के चिन्तन, चरित्र तथा व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन हो. चिन्तन, चरित्र तथा व्यवहार में परिवर्तन से छात्र ओर अधिक प्रतिभाशाली, कर्त्तव्यनिष्ठ तथा व्यक्तित्व सम्पन्न हो.
(2.)संकुचित अर्थ है कि छात्रों तथा परीक्षार्थियों को नियंत्रित वातावरण में निश्चित ज्ञान को एक समय विशेष की अवधि में देने का प्रयास करना.
Education and Coaching Centre

Education and Coaching Centre

(3.)शिक्षा के सम्बन्ध में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब विद्यालय शिक्षा के लिए उपयुक्त स्थान है तो फिर कोचिंग की क्या आवश्यकता है? विद्यालय में शिक्षा अर्जित करना समुचित और पर्याप्त नहीं है. उसमें जो कमी रह जाती है उसकी पूर्ति तथा ओर अच्छा करने के लिए कोचिंग की आवश्यकता है. दूसरा कारण यह है कि प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कराने के लिए भी कोचिंग की आवश्यकता होती है.
(4.)कोचिंग की दूसरी आवश्यकता इसलिए भी है कि घर पर अध्ययन का नियमित वातावरण नहीं है इसलिए बच्चों के अतिरिक्त समय का सदुपयोग नहीं हो पाता है.
(5.)तीसरा कारण है कि स्कूलों में पढ़ाई होती है, पढ़ाई के पश्चात अभ्यास करना भी आवश्यक होता है.
(6)परन्तु कोचिंग संस्थानों का केवल यह कर्त्तव्य ही नहीं है वरना विद्यालय तथा कोचिंग संस्थान में फर्क ही क्या रह जायेगा? आखिर सोचनेवाली बात यह है कि विद्यार्थी या परीक्षार्थी परीक्षा देने के बाद स्वाध्यायी क्यों नहीं होते हैं. इसका उत्तर यह है कि वर्तमान शिक्षा बोझिल है यानि यह शिक्षा छात्रों के व्यावहारिक जीवन में बहुत ही कम काम आती है जिससे छात्र येन केन प्रकारेण परीक्षा उत्तीर्ण करना ही अपना ध्येय हो समझता है.
(7..)कोचिंग संस्थानों को केवल परीक्षा केन्द्रित दृष्टिकोण ही न रखकर, उनकी स्वाध्याय में रूचि जाग्रत करने का प्रयास भी करना चाहिए. इसके लिए कोचिंग के साथ साथ पुस्तकालय व वाचनालय की व्यवस्था भी हो बहुत अच्छा होगा.
(8.)कोचिंग में ऐसे कर्मठ तथा समर्पण युक्त शिक्षक हो जो इस संसार रूपी कीचड़ में फँसे हुए को घसीटकर किनारे तक ला सके और ऐसा करना पुण्य कार्य ही है. शिक्षक को यह सोचकर कार्य करना चाहिए कि वे दूसरे के घर का नहीं बल्कि स्वयं के घर का कचरा ही साफ कर रहे हैं.
(9.)अभिभावक यह सोचते हैं कि जब विद्यालय की फीस चुकाने में मुश्किल होती है तो कोचिंग की फीस से भार दुगुना हो जाता है. ऐसी स्थिति में निर्धन छात्र किस प्रकार कोचिंग की फीस चुका सकते हैं. अव्वल तो जिन कोचिंग सेंटर का मात्र व्यावसायिक दृष्टिकोण है उनमें भेजना उचित नहीं है परन्तु कई कोचिंग सेंटर ऐसे भी है व्यावसायिक दृष्टिकोण के साथ परमार्थ का नजरिया भी रखते हैं तथा जिनकी फीस भी हम वहन कर सकते हैं.
(10.)कोचिंग की फीस को एक दूसरे नजरिए से देखे तो कई कार्य ऐसे हैं जो हम स्वेच्छापूर्वक करते हैं तथा उसमें धन भी खर्च करते हैं जैसे दान-पुण्य, तीर्थयात्रा, त्यौहार, बच्चों का पालन पोषण, सेवा सहायता, इनका तो न मालूम किस योनि में फल मिलेगा. परन्तु विद्या दान का तो मनुष्य योनि में ही फल मिलेगा, यह कम बात है क्या.
(11.)यदि किसी व्यक्ति के मस्तिष्क में यह प्रश्न उठता हो कि शिक्षा को इतना महत्त्व क्यों दिया जाये कि बच्चों को विद्यालय, कोचिंग सेंटर तथा पुस्तकालय में पढ़ने हेतु प्रेरित किया जाये. प्रत्येक माता पिता को अपने बच्चों नौकरी का सपना न रखकर तथा कष्ट सहनकर भी पढ़ाना चाहिए, बच्चों को एक बार खेलकूद से वंचित रखा जा सकता है परन्तु उन्हें शिक्षा न दिलाना उनके साथ अन्याय करना ही है.

 शिक्षा की आवश्यकता पर नीति में कहा है कि -
पठतो नास्ति मूर्खत्व जपतो नास्ति पातकम्|
जाग्रस्तु भयं नास्ति कलहो नास्ति मौनिन:||
अर्थात् जो निरंतर अध्ययनशील होता है उसमें मूर्खता नहीं रहती है. जो बराबर जप करता रहता है उसमें कोई पातक नहीं रह सकता. जो जागता रहता है उसे किसी का भी भय नहीं हो सकता. जो मौन धारण करने वाला होता है, उससे किसी का भी कलह नहीं होता है.
(12.)समाज में बिना पढ़े लिखे या कम पढ़े को कोई नहीं पूछता. हर कोई उसका तिरस्कार करते हैं. गँवार और मूर्ख समझकर उससे कोई बात नहीं करना चाहता. ऐसे व्यक्ति से कोई सलाह या सुझाव नहीं लेना चाहता है. सार्वजनिक संस्थाओं में अशिक्षित को कोई पद नहीं मिलता. समाज में आदर व सम्मान के पात्र वे ही व्यक्ति होते हैं जो सुशिक्षित और सुसंस्कृत है और जिन्हें देश-विदेश की गतिविधियों का ज्ञान है.
(13.)जो लोग शिक्षा का महत्त्व नहीं समझते हैं वे शिक्षा लाभदायक होते हुए भी अनदेखी करते हैं.शिक्षा का महत्त्व वे लोग नहीं समझ पाते हैं जो मनुष्य को मात्र शरीर समझते हैं तथा पेट भरने से संतुष्ट हो जाते हैं. यदि हम धन का महत्त्व समझते हैं क्योंकि धन से सुख-सुविधा के साधन खरीद सकते हैं इसलिए लोग धन कमाने के लिए कठिन परिश्रम करते हैं. कुछ लोग तो धन कमाने में नीति अनीति का भी विचार नहीं करते हैं. इसी शिक्षा का महत्त्व हम समझे तो शिक्षा तो मुक्तिदायिनी है.
(14.)हमें यह मनुष्य जीवन बड़ी मुश्किल से तथा परमात्मा की कृपा से मिला है. हमारा जीवन यापन समाज के सहयोग से होता है. परन्तु हमारे सौभाग्य का उदय तब होता है जब हम सार्थक विद्या अर्जित करते हैं तथा आत्मा पर से अज्ञान का पर्दा हट जाता है. लेकिन साक्षर होने से सार्थक विद्या अर्जित नहीं होती है.
(15.)धर्म, अध्यात्म, ज्ञान तथा शिक्षा अर्जित करने का अर्थ अगर यह मान लेते हैं कि पूजा-पाठ करना, स्वर्ग प्राप्ति, देवी-देवताओं से उचित-अनुचित मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है तो यही समझा जाना चाहिए कि धर्म, अध्यात्म इत्यादि को ठीक से समझा ही नहीं है.
(16.)साधु-वेश में कई व्यक्ति इस तरह घुस गये हैं जो मौज मस्ती का निर्वाह करना तथा बिना सेवा-साधनों के ही सम्मान पाते रहते हैं. सामान्य व्यक्ति इनकी पहचान नहीं कर पाता है. जब तक हमारा विवेक जाग्रत नहीं होता है, अज्ञान नहीं हटता है तो ऐसे लोगों के गिरफ्त में आ ही जायेंगे.
(17.)कोचिंग सेन्टरों की भी यही हालात है हर जगह कुकुरमुक्तों की तरह कोचिंग सेन्टरों की स्थापना की जा रही है, इनमें से अधिकांश सेन्टरों की यही हालत है कि उनका मात्र दृष्टिकोण व्यावसायिक होता है. जो छात्र छात्रा तथा अभिभावक इन सेंटरों का बाहरी आकर्षण, भौतिक सुख सुविधाओं तथा उनके आकर्षण को ही देखते हैं वे ठगे जाते हैं.
(18.)सामान्यजन में ऐसी दूरदर्शिता नहीं पाई जाती है कि अच्छे तथा परमार्थ की भावना रखने वाले कोचिंग सेंटर की पहचान कर सकें. वे तात्कालिक लाभ देखते हुए दूरगामी हानि उठाने को मजबूर हो जाते हैं. लुटेरों, चतुरों तथा अनाचारियों की पहचान करना है तो अपने आपको प्रज्ञावान, प्रतिभा सम्पन्न तथा विवेकवान बनाना होगा. वातावरण ऐसा ही है कि जब प्रबुद्ध व्यक्ति ही ठगे जाते हैं तो सामान्यजन कहां लगते हैं. अतः फूँक फूँक कदम रखने की आवश्यकता है. इस प्रकार कदम कदम शिक्षा की आवश्यकता है.
अपनी बात :-प्राचीन काल में गुरुकुल शिक्षा के केन्द्र थे जो नि:शुल्क शिक्षा प्रदान करते थे. वर्तमान काल में प्राचीन काल के बजाय हर बात में, हर क्षेत्र में बहुत परिवर्तन हो गया है. शिक्षा का व्यावसायिकरण हो गया है. वर्तमान में कोचिंग सेंटर तथा विद्यालय शिक्षा के केन्द्र हो गए हैं. व्यावसायिक दृष्टिकोण रखने में बुराई नहीं है परन्तु दूसरों को नुकसान पहुँचाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना गलत है. यदि परीक्षार्थियों का हित करके अपने जीविकोपार्जन हेतु व्यावसायिक दृष्टिकोण रखा जाये तो बुराई नहीं है. यह उनका कर्त्तव्य भी है. परीक्षार्थियों का हित करने मतलब है उनको जीवन की समस्याओं का समाधान करने वाली शिक्षा प्रदान करना. परन्तु शिक्षा भी पात्र व्यक्ति को ही दी जाती है वर्ना उनके जीवन में विवेक, विनय इत्यादि गुणों का समावेश नहीं हुआ तो ऐसा शिक्षित व्यक्ति अशिक्षित से ज्यादा स्वयं तथा दूसरों के लिए हानिकारक है.
Read more

Golden Tips And Useful Tips For Students

Golden Tips And Useful Tips For Students

1.विद्यार्थियों हेतु स्वर्ण सूत्र(Golden Tips for Students)-

(1.)सुबह सवेरे जब भी अध्ययन करना शुरू करें तो प्रफुल्लित, तरोताजा तथा एकाग्रचित होकर अध्ययन प्रारम्भ करें.
(2.)मन में प्रसन्नता का भाव रखें, दु:ख व पीड़ा को पास न फटकने दें. दु:ख व पीड़ा प्रगति व उन्नति के अवरोधक है.
(3.)युवाकाल तप, साधना व कठोर परिश्रम करने का है अतः सुविधाभोगी प्रवृत्ति न रखें.
(4.)आपके अन्दर प्रसुप्त अनन्त क्षमताएं हैं जो स्वत: ही प्रकट नहीं होगी बल्कि आपको संकल्प शक्ति तथा संघर्ष बल पर प्रकट करनी होगी.

Golden Tips And Useful Tips For Students

Golden Tips And Useful Tips For Students

(5.)हमारे अन्दर अपार सम्भावनाएं तथा योग्यताएं छिपी हुई है जो विपत्ति तथा कठिनाइयों से निखरती है. अतः कठिनाइयों से मुँह नहीं मोड़े बल्कि मन से स्वागत करें.
(6.)करोड़ो व्यक्ति जन्म लेते हैं और मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं परन्तु उन्हीं का जीवन सार्थक होता है जिनको आत्मज्ञान हुआ है अर्थात् अपने आप को पहचाना है. ऐसे व्यक्ति अपनी योग्यता को भीतर ही रखकर समाप्त नहीं हो गए हैं.
(7.)दुर्व्यसनों से अच्छे से अच्छे व्यक्ति का पतन हो जाता है.
(8.)अशुभ कर्म का बीज पहले विचार बनता है फिर कर्म बनता है तथा कर्म से आदत व संस्कार का निर्माण होता है.
(9.)शुभ, कल्याणकारी तथा हितकारी विचारों से व्यक्तित्व निखरता है.
(10.)आत्मविश्वास, आत्मज्ञान और आत्मसंयम से व्यक्ति पूर्णता को प्राप्त होता है.
(11.)चरित्र का निर्माण एक कठोर तप व साधना है. विद्यार्थी काल इसको आचरण में उतारने का सबसे उत्तम समय है.
(12.)अपनी समस्याओं, कठिनाइयों को अपने माता-पिता व अभिभावक के साथ साझा करे.
(13.)अपनी आवश्यकताओं को न्यूनतम रखें तथा फैशन परस्ती से दूर रहें.
(14.)दूसरों की न तो निंदा करें और न ही दूसरों की निन्दा सुनने में रस लें.
(15.)गोल गोल व मीठी मीठी बात करनेवालों से सावधान रहें.
(16.)किसी का भी अपमान न करें.
(17.)यह ध्यान रखें कि स्वयं के कारण कोई दु:खी व कष्ट का अनुभव न करें.
(18.)यदि किसी के प्रति गलतफहमी है तो आपस में विचार विमर्श करके गलतफहमी को दूर करें.
(19.)यदि किसी से गल्ती हो जाये तो यह सोचकर भूल जाये क्योंकि गलती करना मानवीय प्रकृति है.
(20.)प्रतिदिन कुछ न कुछ नया सीखना चाहिए. हम रात को ऐसे ही न सो जाये जैसे पिछले दिन सोये थे.
(21.)चिंता के बजाय चिंतन करे.
(22.)समय अमूल्य हैं, बीता हुआ समय वापिस नहीं पाया जा सकता है अतः समय की कद्र करें.
(23.)किसी का सहयोग करने पर उसका गुणगान करते न फिरे.
(24.)दूसरो को सहयोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए न करें.
(25.)किसी भी कार्य को करने में अपना सौ प्रतिशत देने का प्रयत्न करें.


2.विद्यार्थियों हेतु उपयोगी सूत्र(Useful Tips For Students)-

(1.)हँसी-मजाक वही उचित है जो दूसरों के दिल को खुश कर दे. ऐसी हँसी-मजाक करना उचित नहीं है जो किसी को ठेस पहुँचा दे.
(2.)अपने साथियों की भावनाओं का ध्यान रखें.
(3.)न तो ज्यादा चुप रहे और न ज्यादा बोलें.
(4.)यदि आपके साथी कोई अच्छा कार्य करते हैं तो उसकी प्रशंसा करें.
(5.)आज का काम आज ही निपटा दे, उसे अगले दिन के लिए टालना उचित नहीं है.
(6.)किसी का कोई उपकार किया हो तो उसे प्रत्युपकार की आशा न रखें.
(7.)कुछ भी बोलने से पहले ठीक तरह से उस पर सोच विचार कर लें.
(8.)मन में बुरे विचारों को प्रश्रय न दें. हालांकि यह कार्य है तो कठिन लेकिन निरन्तर अभ्यास से यह सम्भव है.
(9.)कुछ समय मनोरंजन के लिए भी निकालें जिससे आप पर तनाव हावी न हो सके.
(10.)यदि साथियों से वाद-विवाद हो जाए तो उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाएं.
(11.)यदि आगे बढ़ना चाहते हैं तो झूठ, पाखंड से बचें. अपनी अन्तरात्मा का शोधन करते रहें.
(12.)अपना कौन है? पराया कौन है? इसकी परख करते रहें.
(13.)मन में हमेशा पवित्र, शुद्ध विचारों को ही कम्पनी दें. अशुभ विचारों को दूर भगा दे.
(14.)पुरुषार्थी व्यक्ति को मदद परमात्मा करता है अतः हमेशा पुरुषार्थ करते रहें.
(15.)सदाचार एकाएक व्यवहार में नहीं आता है धीरे-धीरे अभ्यास करने तथा धैर्य धारण करने से हमारा आचरण सदाचार युक्त होता जायेगा.
(16.)आध्यात्मिकता को अपनायें तथा अनासक्त कर्मयोग को समझकर उसके अनुसार आचरण करने का प्रयास करे. हालांकि यह कार्य है तो कठिन लेकिन लगातार प्रयास करने एकदिन सफलता अवश्य मिल ही जायेगी.
(17.)शिक्षा, सत्संग, स्वाध्याय को अपने जीवन का अंग बनाये.
(18.)धर्म का पालन करें. धर्म का अर्थ सम्प्रदाय से नहीं है बल्कि इस लोक तथा परलोक (आगामी जीवन) में सुख मिले वह धर्म है.


(19.)संकट तथा हानि उठाने के बाद व्यक्ति ओर अधिक विनम्र हो जाता है.
(20.)प्रशंसा के द्वारा शत्रु को भी मित्र बनाया जा सकता है.
(21.)अपना ध्यान हमेशा अपने लक्ष्य पर रखें.

(22.)दुर्जनों से दूर ही रहें. दुर्जनों से न तो दोस्ती अच्छी है और न दुश्मनी अच्छी है क्योंकि कोयले को हाथ में ले लें तो हाथ काला कर देता है तथा अग्निरुप हो तो हाथ जला देता है.
Read more

What Is The Tips of Continuous Learning

What Is The Tips of Continuous Learning

सतत अध्ययन आवश्यक

What Is The Tips of Continuous Learning

What Is The Tips of Continuous Learning

(1.)सांसारिक तथा आत्मिक उन्नति के लिए मनुष्य को सतत अध्ययन करते रहना आवश्यक है. यदि मनुष्य चाहे वह अध्यापक , वकील, डाॅक्टर या अन्य किसी व्यवसाय में हो यदि वह निरन्तर अध्ययन करता है जो नये नये ज्ञान का अर्जन करता रहता है तो ऐसे व्यक्ति के पास ज्ञान का भण्डार हो जाता है परन्तु अर्जित ज्ञान को व्यवहार में उपयोग करना आवश्यक है तभी वह फलदायी होता है.
(2.)संसार के श्रेष्ठ महापुरुषों ने सतत अध्ययन करके उच्चतम स्थान प्राप्त किया है चाहे वे समाज सुधारक, धर्मोपदेशक, दार्शनिक, वैज्ञानिक हो या अन्य. वे निरन्तर स्वाध्याय करते रहे हैं, वे अपने ज्ञान को अपडेट रखते हैं, प्रतिदिन कुछ नया ज्ञान अर्जित करते हैं. यदि हममें भी ज्ञान के प्रति तीव्र लगन और उत्साह हो तथा प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करें अर्थात् फालतू समय नष्ट न करें तो हम स्वयं अपनी उन्नति देखकर आश्चर्य चकित रह जाएगें.
(3.)वर्तमान युग में हर क्षेत्र में ज्ञान का विस्फोट हो रहा है यह सब मनुष्य की बुद्धि के बल पर ही सम्भव हो रहा है. नये-नये अनुसंधान, खोजे तथा तकनीकी का इस्तेमाल हो रहा है. पुरातन ज्ञान में जो उपयोगी है उसको ग्रहण करना तथा नवीन ज्ञान में भी उसी ज्ञान को ग्रहण करना जो हमारे लिए उपयोगी है क्योंकि सम्पूर्ण पुरातन तथा नवीन ज्ञान जरूरी नहीं कि हमारे लिए उपयोगी, हितकारी व कल्याणकारी हो.

(4.)जो मनुष्य साक्षर नहीं वे भी अपने ज्ञान में वृद्धि कर सकते हैं. भारतीय संस्कृति में ज्ञान प्राप्ति के लिए श्रवण (सुनकर), मनन (चिन्तन, विचार करके) तथा निधिध्यासन (आत्मानुभूति, अनुभव करके) प्राप्त करने के साधन बताए गए हैं. अतः उपदेशक, महात्माओं एवं विद्वानों से सत्संग करके, उनकी बातों को श्रवण करके भी बुद्धि एवं ज्ञान को बढ़ाया जा सकता.
तात्पर्य यही है कि अध्ययन एवं स्वाध्याय मनुष्य को नई विचारधारा से जोड़ने, पारंगत होने एवं अपने सद्ज्ञान में वृद्धि के लिए आवश्यक है. इसके आधार पर हम अपनी सांसारिक एवं आध्यात्मिक समस्याओं का समाधान प्राप्त कर सकते हैं.

Read more

How to Educate Women

How to Educate Women

नारी शिक्षा(Women Education)-

(1.)माँ को बालक बालिका का प्रथम गुरु कहा जाता है यह ठीक भी है क्योंकि बालिका बालक के जन्म के बाद माँ ही पालन पोषण करती है. माता ही उसे बोलना, चलना तथा आचार-व्यवहार सीखाती है. भारतीय परिवारों में नारी ही घर गृहस्थी का कार्यभार सम्हालती है. अतः सुशिक्षित नारी की दशा में बालक बालिका का उचित विकास हो सकता है.
(2.)भारतीय संविधान में पुरुष और नारी को समान दर्जा दिया गया है. परन्तु व्यवहार में भारतीय समाज तथा परिवार पुरुष प्रधान है ऐसी स्थिति में नारी को बराबर का दर्जा अभी प्राप्त करना है.
(3.)गृहस्थी को सुचारु रूप से चलाने के लिए नारी का शिक्षित व सुसंस्कृत होना आवश्यक है. जो नारी निरक्षर रहेगी उसके द्वारा ज्ञान प्राप्त करना, पुस्तकें पढ़ना तो असम्भव है ही परन्तु गृहस्थी में उसके क्या क्या दायित्व है यह भी ठीक से नहीं समझ सकेगी. उन महिलाओं की बात अलग है जिनके परिवार में वातावरण, व्यवहार तथा संस्कार उपलब्ध है, उससे बहुत कुछ सीख लेती है।ऐसी नारियां अपने पूर्व जन्म के उत्तम संस्कार लेकर आती है जो साक्षर न होने के बावजूद उत्तम संस्कार रखती है, परन्तु ऐसी नारियां बहुत कम होती है.मनोविज्ञान के अनुसार व्यक्ति पर वंशानुगत तथा अर्जित दोनों प्रकार के संस्कारों का प्रभाव पड़ता है. सामान्यतः बहुत कम व्यक्तियों के उत्तम संस्कार होते हैं ऐसी स्थिति में व्यक्ति को संस्कार अर्जित करने होते हैं इसलिए शिक्षित होना आवश्यक है.
How to Educate Women

How to Educate Women

(4.)जो नारियां शिक्षा ग्रहण करने में रूचि नहीं लेती है या जिनके अभिभावक लड़कियों की शिक्षा पर ध्यान नहीं देते हैं वे नारियां पिछड़ी हुई रह जाती है. इस प्रकार की लड़कियां जैसे तैसे अपने जीवन को बोझ की तरह ढोकर जैसे आयी थी वैसे ही मृत्यु के मुँह में चली जाती है.
(5.)नारी को शिक्षा का अवसर दिया जाये तो ज्ञान व बुद्धि में वह भी आगे बढ़ सकती है. वैदिक काल में स्त्रियों व पुरुषों में भेद नहीं किया जाता था. उस काल में गार्गी, मैत्रेयी, घोषा, लोपामुद्रा, विश्वारा, अपाला आदि विदुषी नारियों ने नारी जाति का गौरव बढ़ाया है. महाकवि कालिदास की पत्नी विद्योत्तमा विदुषी महिला थी उसने अनेक विद्वानों को शास्त्रार्थ में हराया था. शिवाजी, महाराणा प्रताप जैसे महापुरुषों को आगे बढ़ाने के पीछे नारी का ही योगदान था.



(6.)आधुनिक भारतीय संविधान में नारी को समानता का अधिकार देने तथा लोकतंत्र की जड़े मजबूत होने से नारी शिक्षा में काफी वृद्धि हुई है. परन्तु इसका एक काला पक्ष भी है शिक्षा को कई लड़कियां शादी का पासपोर्ट समझती है. जबकि शिक्षा शादी का पासपोर्ट नहीं बल्कि आत्मोन्नति, संस्कार, बुद्धि विकास, जीवन को उन्नत करने व समस्याओं का समाधान करने की कला सीखने का साधन है, इस प्रकार के वैचारिक दृष्टिकोण से ही उनके लिए शिक्षा लाभदायक होती है.
(7.)नारी शिक्षा शहरों में द्रुतगति से वृद्धि हुई है परन्तु गाँवों में आज भी लड़कियों के लिए पृथक विद्यालय, महाविद्यालयों की कमी है जिससे उन्हें सह शिक्षा का विकल्प चुनना पड़ता है. जहाँ लड़कियों के लिए विद्यालय, महाविद्यालय है वहां महिला अध्यापिकाओं, प्राध्यापिकाओं की कमी है. इसलिए भारतीय सामान्य जनता स्त्रियों की शिक्षा के लिए मुश्किल से ही सहमत होती है.
(7.)वस्तुतः लड़कियों को शिक्षा देने में सबसे बड़ी बाधा चरित्र को पवित्र बनाए रखने की है वर्तमान शिक्षा प्रणाली में चरित्र, नैतिकता, परोपकार, दया, त्याग और प्रेम जैसे सद्गुणों का विकास करने की शिक्षा नहीं दी जाती है, ऐसी स्थिति में लड़के एवं लड़कियां सह शिक्षा के कारण एक दूसरे के सम्पर्क में आते हैं. साथी छात्रों व छात्राओं में विचार एवं धारणाओं के आधार पर मित्रता हो जाती है और शारीरिक सम्बन्ध भी हो जाते हैं. यह आवश्यक नहीं कि जिससे मित्रता हो उससे शादी भी हो. दूसरी बात जो समय शिक्षा अर्जित करने का है उसमें उन्मुक्त यौन सम्बन्ध बनाना गलत है. तीसरा कारण यह है कि लड़के लड़कियों में पारिवारिक दायित्व निभाने की परिपक्वता नहीं होती है.
(8.)सहशिक्षा के सम्बन्ध के बारे में कुछ विचारकों का यह तर्क होता है कि "छात्र-छात्राओं को मिलने-जुलने, विचारों के आदान प्रदान से छात्राएं छात्रों को तथा छात्र छात्राओं को भलीभांति समझ सके और आगे के जीवन के लिए अपने आपसी व्यवहार की तैयारी कर सके जो अच्छा ही है" :ऊपरी तौर पर यह विचार सुलझा हुआ और संतोषप्रद लगता है परन्तु भिन्न लिंगीय सम्बन्ध शैक्षिक स्तर तक ही सीमित नहीं रहते हैं बल्कि उनका आगे भी विस्तार हो जाता है जिसका प्रभाव आचार व्यवहार एवं सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है. पाश्चात्य देशों में उन्मुक्त यौन सम्बन्धों को खुली छूट मिली हुई है जिससे उनका वैवाहिक जीवन सुखद नहीं होता है और वे कई बार शादी करते हैं जिससे बच्चों के जीवन पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता है.
(9.)वर्तमान शिक्षा प्राप्त करने के बाद लड़कियों को अध्यापक तथा अभिभावकों का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं है.जीवन के सभी फैसले स्वयं लेने लगते हैं जबकि उनमें इतनी मानसिक परिपक्वता नहीं होती है. जीवन के सम्बन्धित फैसले में अध्यापक, अभिभावकों व छात्रों, छात्राओं के सामूहिक फैसले लेने के आधार पर लिये जाने चाहिए. यह इसलिए आवश्यक है कि पाठ्यक्रम में चारित्रिक, नैतिक सम्मिलित न होने के कारण उनमें मानसिक परिपक्वता नहीं आती है.
(10.)वर्तमान शिक्षा मात्र अर्थोपार्जन, जीविकोपार्जन को बढ़ावा देती है परन्तु यह शिक्षा अर्जित करके युवावर्ग नैतिक तथा आचार-व्यवहार के प्रति निष्ठावान नहीं है जिससे वर्तमान भारतीय छात्र छात्राएं अनुत्तरदायी, असंयमित तथा अनुशासनहीन होते जा रहे हैं. अतः लड़कियों को ऐसे वातावरण में सहशिक्षा देना नैतिक पतन को आमन्त्रित करना है.
अपनी बात :- अतः लड़कियों की शिक्षा के लिए पृथक् से विद्यालय तथा महाविद्यालय, कोचिंग संस्थान की व्यवस्था करने के लिए सरकार का मुह ताकने के बजाय जन सहयोग लेना चाहिए. ऐसे संस्थाओं में नैतिक व चारित्रिक शिक्षा का समावेश करना चाहिए तथा अभिभावकों को भी उत्तर दायित्व लेना चाहिए. उनको भी बच्चों को नैतिक मूल्यों का विकास करना चाहिए तभी सच्चे अर्थों में शिक्षा देना सार्थक होगा अन्यथा अहंकार को पोषित करने, व्यक्तिवाद व असंयमित जीवनशैली को बढ़ावा देने वाली शिक्षा देना नहीं बल्कि साक्षर करना ही है.
Read more