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How to recognize talent in children?

How to recognize talent in children?

बालकों में प्रतिभा को कैसे पहचाने?(How to recognize talent in children?)-

How to recognize talent in children?

How to recognize talent in children?

(1.)अक्सर हमारे दिमाग में यह प्रश्न उठता रहता है कि बालको में किस प्रकार की प्रतिभा है तथा उसको कैसे पहचाने? बालक दिन-प्रतिदिन में जो भी क्रिया-प्रतिक्रिया तथा गतिविधियां करता है उसके आधार पर हम उनकी प्रतिभा का पता लगा सकते हैं।
(2.)बालकों की प्रतिभा को पहचानने के लिए माता-पिता,अभिभावकों तथा शिक्षकों का आपस में संवाद अर्थात् वार्तालाप होना आवश्यक है।
(3.)बालक कई प्रकार की रुचियां, जिज्ञासा बार-बार प्रकट करता है उसके आधार पर उसकी प्रतिभा को पहचाना जा सकता है। जैसे वह कोई खेल खेलने के लिए बार-बार आग्रह करता है या नृत्य करने के लिए अथवा गीत या भजन को सुनने के लिए बार-बार जिज्ञासा व रुचि प्रकट करता है तो उसको उस क्षेत्र में आगे बढ़ाया जाना चाहिए।उस क्षेत्र में उसको बार-बार अवसर प्रदान करना चाहिए।
(4.)शिक्षकों से मिलकर यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि वह किस विषय में सबसे अधिक अंक अर्जित करता है तथा किस विषय में उसकी रुचि है।साथ ही विद्यालय में कई ऐसे कार्यक्रम आयोजित होते हैं जैसे वार्षिकोत्सव,गांधी जयंती इत्यादि के जो भी कार्यक्रम आयोजित होते हैं तो बालक उनमें से किस गतिविधि में भाग लेने की रुचि व जिज्ञासा प्रकट करता है।
(5.)कुछ बालक अंतर्मुखी तथा कुछ बालक बहिर्मुखी होते हैं।जो बालक बहिर्मुखी होते हैं वे तो अपनी रुचि व जिज्ञासा प्रगट करते रहते हैं तथा उनके चाल-चलन व व्यवहार से भी प्रकट हो जाता है कि ऐसे बालकों में किस प्रकार की प्रतिभा है।परंतु अंतर्मुखी बालकों की प्रतिभा को पहचानना टेढ़ी खीर है।अंतर्मुखी बालकों की प्रतिभा को पहचानने के लिए एक कुशल गुरु की आवश्यकता होती है अर्थात् माता-पिता व शिक्षकों को मनोविज्ञान,व्यवहारशास्त्र तथा दर्शन का अच्छा ज्ञान होना आवश्यक है।
(6.)अंतर्मुखी बालक अपनी रुचि व जिज्ञासा प्रकट न करें और उनके चाल-चलन तथा व्यवहार से भी आपको उनकी प्रतिभा का पता नहीं चल पा रहा हो तो हमें उनके समक्ष अपनी तरफ से पहल करके पता लगाना चाहिए।जैसे आप उनसे किसी भजन को याद करके सुनाने के लिए कह सकते हैं या उन्हें अपने साथ नृत्य करने के लिए कह सकते हैं।यदि उनमें प्रतिभा होगी तो वह सहर्ष तैयार हो जाएगा और उनके अंदर छुपी हुई प्रतिभा प्रगट हो जाएगी। नृत्य,खेल,संगीत,भजन इत्यादि में उनमें कोई प्रतिभा नहीं है तो पढ़ाई के विषय में उनकी प्रतिभा को ढूंढने का प्रयास करना चाहिए। जैसे गणित में उनकी प्रतिभा है या नहीं इसके लिए घर पर कोई प्रश्न या टेस्ट लेकर परखा जा सकता है।उनको कोई प्रश्नावली समझाकर कुछ भी पूछ कर पता लगाया जा सकता है।एक-दो बार आप अपनी तरफ से पहल करें, बाद में बालक उस क्षेत्र में स्वयं अपनी इच्छा से कुछ भी करने के लिए रुचि जाग्रत करता है तो समझ लें की बालक में उस क्षेत्र में प्रतिभा है।उस क्षेत्र विशेष का पता लगाकर धीरे-धीरे उसको प्रशिक्षित करें,आगे बढ़ाएं और उस क्षेत्र में उनके सामने नए-नए अवसर उनके सामने प्रस्तुत करें ताकि बालक उसमें भाग ले सकें।इस प्रकार उनकी प्रतिभा को निखारा जा सकता है।

(7.)याद रखिए आपकी बालक पर बहुत पैनी नजर रहनी चाहिए।वह किस प्रकार का खान-पान पसंद करता है,किस प्रकार के मित्रों के साथ उठना-बैठना,बातचीत करना,घूमना-फिरना पसंद करता है?किस प्रकार के कार्यक्रमों में मनोरंजन करना पसंद करता है।माता-पिता,अभिभावक,परिवार के सदस्यों व संबंधियों तथा शिक्षकों से किस प्रकार का व्यवहार करता है? इन सब बातों को नोट करके बालक की प्रतिभा को पहचाना जा सकता है। बालक की प्रतिभा को पहचान कर उसको तराशने की आवश्यकता होती है अन्यथा वह प्रतिभा सुप्त ही रह जाती है।हमेशा बालक के साथ सकारात्मक व्यवहार करें जिससे वह अपनी रुचि व जिज्ञासा आपके सामने प्रकट कर सके।

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What are the causes and solutions to JNU violence?

What are the causes and solutions to JNU violence?

1.जेएनयू हिंसा के क्या कारण और समाधान हैं?(What are the causes and solutions to JNU violence?)-

JNU(DELHI),What are the causes and solutions to JNU violence?

JNU(DELHI), What are the causes and solutions to JNU violence?

शिक्षा प्राप्त करने के जो स्थान है उनको कोई जमाने में शिक्षा के मंदिर कहा जाता था परंतु आज के विश्वविद्यालयों तथा विद्यालयों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे यह कोई अखाड़े के मैदान है ।शिक्षा का अर्थ है जो हमें अनुशासन सिखाती है, जो हमें जीवन का मार्ग दिखाती है, सांसारिक कर्तव्यों का पालन करना और आध्यात्मिक मार्ग का दिग्दर्शन कराती है।
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी(दिल्ली), जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय,दिल्ली (दिल्ली),अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी(अलीगढ़ ) जादवपुर विश्वविद्यालय इत्यादि यूनिवर्सिटी तथा इसी प्रकार की अन्य यूनिवर्सिटीज को देखकर ऐसा लगता ही नहीं है कि यह शिक्षा प्राप्त करने के केंद्र हैं।
5 जनवरी ,2020 को जेएनयू कैंपस में छात्रों पर लाठी, डंडों से लैस नकाबपोशों के हमले में कई लोग घायल हो गए।छात्र-छात्राओं तथा टीचर्स को पीटा गया। जेएनयू के तीन हॉस्टलों साबरमती हाॅ्स्टल, पेरियार हाॅस्टल,माही मांडवी हाॅस्टल में तोड़फोड़ की गई ।करीब 2 दर्जन लोग घायल हो गए। निश्चित रूप से हिंसात्मक तरीके से इस प्रकार की कार्यवाही करना निंदनीय है,हम इसकी घोर निंदा करते हैं।
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2.हिंसा के कारण (Due to violence)-

अब हम इस झगड़े के कारण के बारे में बताते हैं कि यह झगड़ा किस प्रकार शुरू हुआ। यहां एक बड़ा सवाल यह है कि जेएनयू के कुछ छात्रों ने अन्य छात्रों को अगले सेमेस्टर में शामिल होने से रोकने की कोशिश क्यों की ?यानि जो छात्र-छात्राएं पढ़ना चाहते थे उनको छात्रों के एक गुट ने रोकने की कोशिश क्यों की। उन्होंने सर्वर को डाउन कर दिया। वाई-फाई का कनेक्शन हटा दिया जबकि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों की फीस जमा करने के लिए तैयार था, ऐसे में इन छात्रों ने उनकी फीस जमा करने से क्यों रोका? झगड़ा यहीं से शुरू हुआ।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने फीस वृद्धि की थी। कुछ छात्रों ने फीस वृद्धि के खिलाफ प्रोटेस्ट करना शुरू कर दिया जबकि अन्य छात्रों को फीस वृद्धि से कोई परेशानी नहीं थी।फीस वृद्धि के मामले में स्पष्ट है कि दो गुट बन गए और भिड़ गए। जब छात्र ही फीस वृद्धि को लेकर दो गुटों में बंट गए तो विश्वविद्यालय प्रशासन को कैसे रोक सकते हैं?
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3.जेएनयू का वर्तमान स्टेटस(Current status of JNU)-

JNU(DELHI),What are the causes and solutions to JNU violence?

JNU(DELHI),What are the causes and solutions to JNU violence?

जेएनयू दक्षिणी दिल्ली में 1019 एकड़ में स्थित है। जेएनयू की जमीन की कीमत सबसे महंगी जमीन की कीमतों में शामिल है।शैक्षणिक संस्थाओं की कीमत का आकलन किया जाए तो ये दस करोड़ रुपए प्रति एकड़ की दर है,इस हिसाब से जेएनयू की जमीन की कीमत 10,000 करोड़ रूपए होती है ।इस एरिया में कमर्शियल रेट की बात करें तो 100 करोड़ रुपए प्रति एकड़ की दर है,इस रेट से जेएनयू की कॉमर्सियल कीमत एक लाख करोड़ रुपए होती है। जेएनयू के छात्र इतनी महंगी जमीन पर तथा सबसे शानदार एरिया में शिक्षा अर्जित करते हैं।केंद्र सरकार का शिक्षा बजट लगभग 90000 करोड रूपए है यानी जेएनयू केंपस की कीमत केंद्र सरकार के बजट की बराबर है।

4.जेएनयू की बर्बादी के कारण(Due to the destruction of JNU)-

इतनी शानदार जगह पर शिक्षा अर्जित करने का मौका मिला हुआ है उसकी बर्बादी की जा रही है‌। इस बर्बादी के कई कारण है ।जेएनयू के आसपास कई राजनीतिक पार्टियों के कार्यालय हैं तथा न्यूज़ चैनल के कई ऑफ़िस भी इन्हीं के आसपास हैं।
जेएनयू पूरे देश में तब हाईलाइट हुआ अफजल गुरु को फांसी हुई थी ।तब भी इन्हीं जेएनयू के मुट्ठी भर छात्रों ने देश विरोधी नारे लगाए थे जिसका बाकायदा जीन्यूज़ चैनल ने एक वीडियो जारी किया था ।उस वीडियो को बाकायदा कोर्ट ने एवीडेंस के रूप में माना था ।इसके पश्चात इस जेएनयू में देश विरोधी मुट्ठी भर छात्र सक्रिय हो गये। उनमें सस्ती राजनीति को पाने की होड़ लग गई। इसके पश्चात इन छात्रों में राजनैतिक भूमि तैयार करने का मकसद शामिल हो गया और इसके जरिए भारत की राजनीति में एंट्री करने का मकसद शामिल हो गया।छात्रों के हित व कल्याण के लिए राजनीति करने तक तो राजनीति ठीक है परंतु छात्रों के हित व कल्याण से प्रसिद्धि देर से मिलती है।इसलिए किसी भी राष्ट्रीय मुद्दे पर हुड़दंग करना,प्रोटेस्ट करना,विश्वविद्यालय या विद्यार्थियों से संबंधित कोई इश्यू न हो तो भी उस पर भी आंदोलन करना। जैसे सीएए और एनआरसी का जेएनयू के विद्यार्थियों से क्या लेना-देना है? परंतु जामिया,जेएनयू व अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने उसमें भी अपनी टांग अड़ाने से बाज नहीं आए। दरअसल अब जेएनयू के छात्रों को प्रसिद्धि पाने और राजनीति में जाने का चस्का लग चुका है। इसको कुछ राजनीतिक पार्टियां व कुछ न्यूज़ चैनल और तथाकथित बुद्धिजीवी समर्थन देते हैं।अब यह केंद्र शिक्षा के केंद्र नहीं बल्कि हिंसा के केंद्र बनते जा रहे हैं ।एक तरह से यह कहा जाए कि उक्त यूनिवर्सिटी एक ज्वालामुखी पर खड़े हैं जो कभी भी फट सकते हैं।अब इनके लिए देश, विश्वविद्यालय के नियम, कानून मायने नहीं रखते हैं बल्कि इनका अपना कानून व नियम है। इन्होंने जेएनयू को आईलैंड में तब्दील कर दिया है।जहां पुलिस,देश व विश्वविद्यालय का कोई नियम,कायदा,कानून नहीं चलता है। ऐसी शानदार यूनिवर्सिटी की विश्व के शिक्षण संस्थाओं में 600 से 800 के बीच नंबर आता है।यहां के शिक्षा के स्तर में गिरावट का यह नमूना है।हर बात पर प्रोटेस्ट करना एक तरह का फैशन बनता जा रहा है।दिल्ली भारत की राजधानी है इसलिए कोई भी बात न्यूज़ की हेडलाइन बन जाती है‌।जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय अब सस्ती राजनीति तथा देश विरोधी ताकतों के केंद्र बनते जा रहे हैं।जेएनयू में कुछ छात्र अपनी राजनीति को चमकाने के लिए प्रवेश करते हैं,वे यहां पढ़ने के लिए नहीं आते हैं ।राजनीति भी ये घटिया स्तर की करते हैं जिससे दुनिया में देश की छवि खराब होती है।
जेएनयू में अधिकांश विद्यार्थी पढ़ाई करना चाहते हैं परंतु कुछ विद्यार्थी किसी न किसी माध्यम से न्यूज़ में बने रहने के लिए इस तरह की नौटंकी आए दिन करते रहते हैं। जेएनयू में हुई हिंसा के लिए बाहरी तत्व भी शामिल हो सकते हैं जबकि जेएनयू में कुछ छात्र देश विरोधी कार्यों में लिप्त हो।ये कहावत है कि घर का भेदी लंका ढहावे।
प्रश्न- जेएनयू, एएमयू और जामिया जैसे विश्वविद्यालयों को अपना पाठ्यक्रम समाप्त करने और परीक्षा आयोजित करने का समय कब मिलता है?
उत्तर-(1.)जेएनयू,एएमयू और जामिया जैसे विश्वविद्यालयों में पढ़ाई नाममात्र की होती है।इन विश्वविद्यालयों में कुछ मुट्ठी भर छात्रों को अपनी राजनीतिक भूमि तैयार करनी होती है।
(2.)जो विद्यार्थी इन विश्वविद्यालयों में प्रोटेस्ट, आंदोलनों को जायज नहीं मानते हैं।वे जब इनको रोकने में असमर्थ रहते हैं तो स्वयं अपने स्तर पर तैयारी करते हैं। जैसे आनलाईन कोर्सेज करते हैं।
(3.)कुछ विद्यार्थी कोचिंग और ट्यूटर की मदद लेते हैं, इसके बावजूद भी काॅलेज की पढ़ाई की पूर्ति नहीं हो सकती है न।
(4.)बहुत से विद्यार्थी अपनी खुद से तैयारी करके एक्जाम देते हैं।
(5.)इस प्रकार की गतिविधियों के कारण ही विश्व में 600 से 800 के बीच इस विश्वविद्यालय की रैंकिंग है।
(6.)इतनी हाइप्रोफाइल फैसिलिटीज होने के बावजूद इतनी नीचे रैंकिंग होने का कारण यही है कि पढ़ाई के बजाय अन्य बातों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।वरना ऐसी फैसिलिटी तो प्रिंसटन यूनिवर्सिटी (अमेरिका) के विद्यार्थियों को भी उपलब्ध नहीं है जिसकी रैंकिंग टाॅप यूनिवर्सिटी में होती है।
प्रश्न- JNU की घटना के बाद आप को क्या लगता है कि छात्र संगठन किस और जा रहे है?
उत्तर-(1.)JNU के विद्यार्थियों की दिशा गलत है।गीता में कहा गया है कि हमारा कर्म करने पर ही अधिकार है।यानी हम सही कर्म करें या गलत उसका परिणाम हमें ही भोगना होगा। हमारी एवज में कर्म का फल ओर कोई नहीं भोग सकता है।
(2.)जैसे यदि किसी व्यक्ति को दस्त लग जाएं तो दस्त उस व्यक्ति को ही जाना पड़ेगा,उस व्यक्ति की एवज में कोई ओर दस्त नहीं जा सकता है। दूसरा व्यक्ति हमें अस्पताल में ले जाकर दिखा सकता है।दवाई दिलवा सकता है। परन्तु दस्त तो उस व्यक्ति को ही जाना पड़ेगा और दस्त जाने के फलस्वरूप जो कष्ट होगा वो भी उस व्यक्ति को ही भोगना पड़ेगा। जेएनयू की भी यही हालत है।
प्रश्न- जेएनयू में हिंसा करने वाले कौन लोग हैं?
उत्तर-(1.)हिंसा करनेवाले लोग चाहे बाहर के हों या जेएनयू कैंपस के उससे क्या फर्क पड़ता है।क्या जेएनयू के छात्र हिंसा करते तो अपराध कम हो जाता अर्थात् क्या जेएनयू के छात्रों को हिंसा करने का सर्टिफिकेट मिला हुआ है।
(2.)गुंडा देशी हो या विदेशी हो दोनों का अपराध तो बराबर है।
(3.)हिंसा करनेवाले कौन थे ये तो जांच होने के बाद ही पता चल पाएगा। कैंपस में हिंसा की जांच की जिम्मेदारी जॉइंट सीपी (वेस्टर्न रेंज) शालिनी सिंह को दी गई है।
प्रश्न- क्या महाविद्यालय में राजनीतिक दल होना सही है?
उत्तर-(1.) छात्र-छात्राओं को अपनी जायज मांग रखने, छात्र-छात्राओं के हित और कल्याण करने हेतु उनकेे नेतृत्व करनेवाले तो होना ही चाहिए।
(2.) राजनीति करना कोई गुनाह नहीं है परन्तु घटिया किस्म की राजनीति करना सही नहीं है।
(3.)किसी भी अच्छी चीज का उपयोग और दुरुपयोग करना हमारे हाथ होता है।गोयले की अंगीठी में हम हाथों को तपाकर सर्दी से बचाव कर सकते हैैं और उसी अंगीठी से दूसरों के घर फूंक सकते हैं।
(4.) जेएनयू के छात्रों के पक्ष में शांतिपूर्ण तरीके से प्रोटेस्ट कर रहे हैं परन्तु वहीं बम्बई में प्रोटेस्ट करनेवाले अपने हाथों में फ्री कश्मीर की तख्तियां लटका रखी थी।इस तरह से प्रोटेस्ट करना गलत है फिर आपमें और जेएनयू में मारपीट करनेवालों में क्या फर्क हुआ अर्थात् कोई फर्क नहीं है।
प्रश्न- दीपिका पादुकोण का जेएनयू जाना कहाँ तक सही था? क्या इससे उनकी आने वाली फिल्म पर कोई असर पड़ेगा?
उत्तर-(1.) सेलीब्रिटी अथवा राजनेता अधिकांशतः अपने नफा-नुकसान को देखकर ही ऐसा करते हैं।
(2.) जेएनयू में हिंसा की चपेट में आए हुए विद्यार्थियों के प्रति संवेदना प्रकट करने जाने में तो कोई बुराई नहीं है।
(3.) ऐसे लोग जो देश विरोधी कार्यो में लिप्त हैं उनके साथ खड़े होना या उनके साथ प्रोटेस्ट में शामिल होना गलत है।
(4.) मुम्बई में कई सेलिब्रिटीज ऐसे प्रोटेस्ट को समर्थन दे रहे थे जिसमें फ्री कश्मीर के पोस्टर लहरा रहे थे जो कि गलत है।
(5.) हमारे विचार से दीपिका पादुकोण की भावना क्या थी?यह तो वही ज्यादा ठीक तरह से बता सकती है परन्तु उनका मैसेज गलत ही गया है और इसका प्रभाव उनकी आनेवाली फिल्म पर भी पड़ सकता है।
प्रश्न- जेएनयू में हुई हिंसा का जिम्मेदार कौन है?
उत्तर-(1.) हमारी शिक्षा प्रणाली,हमारा सिस्टम जिसमें विद्यार्थियों को अनुशासन में रहना नहीं सिखाया जाता है।
(2.)देश के राजनीतिक दल जो विद्यार्थियों को अपनी राजनीतिक भूमि तैयार करने के लिए इस्तेमाल करते हैं।
(3.) वास्तविक रूप से तो जांच के बाद ही पता चल पाएगा कि इस हिंसात्मक गतिविधियों के लिए कौन जिम्मेदार है?
प्रश्न- क्या जेएनयू की घटना के बाद एक छात्र संगठन द्वारा दूसरे छात्र संगठन को बंद करने की मांग करना उचित है?
उत्तर-(1.)हर छात्र संगठन यही चाहता है और यही सिद्ध करने की कोशिश करता है कि छात्र-छात्राओं का सबसे बड़ा हितेषी वही है।
(2.) लोकतांत्रिक व्यवस्था का मतलब तो यह होता है कि एक दूसरे का के विचारों का सम्मान करें यदि सम्मान न भी करें तो अपने काम से काम रखें और एक दूसरे के काम में टांग अड़ाना बन्द करें।
(3.)यदि एक छात्र संगठन यही चाहता है और दूसरा न रहे तो जो छात्र संगठन बचा रहेगा वह भी मोनोपोली करेगा। इसलिए दोनों का रहना आवश्यक है।
(4.)यदि हम यह चाहें कि बुराई बिल्कुल खत्म हो जाए तो हमें अच्छाई के महत्व का पता कैसे चलेगा? दरअसल ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जिन्हें खत्म नहीं किया जा सकता है।
प्रश्न- क्या दीपिका पादुकोण का जेएनयू में जाना भले ही वह आने वाली फिल्म के प्रमोशन के लिए हो जेएनयू में वामपंथियों को समर्थन देना नहीं है?
उत्तर-(1.)दीपिका पादुकोण का मकसद भले ही फिल्म का प्रमोशन हो अर्थात् अपना स्वार्थ सिद्ध करना हो परन्तु वामपंथीयों का भी तो स्वार्थ है। वामपंथ का सूरज डूब रहा है इसलिए किसी न किसी माध्यम से वे भी तो पिक्चर में बना रहना चाहते हैं।
(2.) दोनों का अपना-अपना स्वार्थ है और वो तभी पूरा हो सकता है जब वे एक-दूसरे का समर्थन करें।
प्रश्न- क्या आपको यकीन है कि ABVP के छात्रों ने ही JNU छात्रों पर हमला किया है? क्यों अथवा क्यों नहीं?
उत्तर-(1.)यह बता पाना तो मुश्किल है क्योंकि दोनों ही संगठनों अर्थात्ABVP,JNUSU तथा अन्य विद्यार्थियों को भी हिंसा का शिकार होना पड़ा है।
(2.)हो सकता है कि कोई तीसरा ही पक्ष हो जिसकोJNU में इस तरह की गतिविधियां पसन्द न हो।
प्रश्न- दीपिका पादुकोण के जेएनयू छात्रों के समर्थन में खड़े होने का क्यों विरोध हो रहा है?
उत्तर-(1.) जेएनयू में जाने में तो कोई हर्ज नहीं है। परन्तु जहां पर तथा जिस समय वह वहां थी उस समय और उनके सामने ही फ्री कश्मीर और आजादी के नारे लगाए जा रहे थे।
(2.)उसको ऐसा करने से रोकना चाहिए था यदि वे नहीं मानते तो उसको वहां नहीं रुकना चाहिए था।
(3.) बाद में भी वह ऐसा स्पष्टीकरण दे सकती थी परन्तु अभी तक भी स्पष्टीकरण न आना क्या दर्शाता है?
प्रश्न- जेएनयू में छात्र विरोध प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं?
उत्तर-(1.)बढ़ी हुई फीस को समाप्त करने के लिए प्रोटेस्ट कर रहे हैं।
(2.) प्रोटेस्ट करने तथा पिक्चर में बने रहने के लिए क्योंकि बढ़ी हुई फीस इतनी अधिक नहीं थीं कि उसे न चुका सकते हों।
(3.) विचारधारा के आपस में मेल न होने के कारण अर्थात् सरकार से विपरीत विचारधारा होने के कारण।
प्रश्न- जेएनयू हिंसा में दिल्ली पुलिस को अभी तक कोई ठोस सबूत क्यों हाथ नहीं लग पाया है?
उत्तर-(1.)ज्यादा सही उत्तर तो जेएनयू के छात्र और पुलिस ही दे सकती है।
(2.) हमारे द्वारा दिया गया उत्तर तो अनुमान लगाया उत्तर होगा जो कि हमारे विवेक और न्यूज चैनलों की खबरों के अनुसार होगा वास्तविक तथ्यों के आधार पर नहीं होगा।
(3.)इस प्रकार की जांच में राजनैतिक दबाव भी रहता है और हो सकता है हिंसा करने वाले योजनाबद्ध तरीके से आए हों जिनका पता नहीं चल पा रहा है।
(4.)जांच एजेंसी जांच करने के लिए नए-नए तरीके ढूंढती है तो हिंसा करने वाले भी नए-नए तरीके ढूंढ लेते हैं।
प्रश्न- क्या JNU में हो रहे दंगे आम जनता का रोष है?
उत्तर-(1.) जेएनयू में दंगे दो छात्रों के गुटों का आपसी टकराव है।
(2.) दोनों छात्रों के गुट में एक ABVP जो कि भाजपा समर्थित विचारधारा रखता है, दूसरा गुट JNUSUहै जिसकी वामपंथी विचारधारा है।
(3.)जो विचारधाराओं का टकराव है परन्तु इसमें नुकसान देश को हो रहा है। दोनों ही गुट अपना-अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं।
(4.) दोनों विचारधाराओं में टकराव होना स्वाभाविक है परन्तु ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए जिससे देश की छवि तथा अखंडता को नुक़सान पहुंचता हो।
प्रश्न- JNU हिंसा मामले में दिल्ली पुलिस ने किन किन के दोषी होने की सम्भावना प्रकट की हैं ?
उत्तर-(1.)सही जानकारी और सही तथ्यों तक जांच पड़ताल होने तक हमें धैर्य रखना चाहिए।
(2.) पुलिस जिनको दोषी ठहरा रही है जरुरी नहीं है कि वे दोषी ही हों जब तक कोर्ट तथा कानून दोषी नहीं ठहराता है तब तक उनको दोषी कैसे माना जा सकता है।
(3.) किसी भी मामले में हमें अपनी न्याय प्रक्रिया पर भरोसा रखना चाहिए, उतावलेपन तथा जल्दबाजी के बजाय शांतिपूर्वक हमें धैर्यपूर्वक जांच होने तक इन्तजार रखना चाहिए।
(4.) पुलिस ने तो छात्र संघ अध्यक्ष आइशी घोष(छात्र संगठन JNUSU की प्रमुख) के साथ अन्य 9–10 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है और रोज नए-नए नाम सामने आ रहे हैं। इसलिए हमें इंतजार करना चाहिए।
प्रश्न- क्या जेएनयू में पढ़ने वाले छात्र आतंकवादी हैं?
उत्तर-(1.): किसी विचारधारा से सहमत नहीं होना अथवा हमारे से विपरीत विचारधारा रखने वाले को आतंकवादी नहीं कहा जा सकता है।
(2.) आतंकवादी घोषित करने का काम न्याय प्रणाली व कानून का है हमारा काम नहीं है ।
(3.)यदि किसी व्यक्ति में हमें आतंकवादी जैसे गुण दिखाई देते हैं तो हमें एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते इसकी इनफॉर्म पुलिस को देनी चाहिए ।हमें किसी व्यक्ति को आतंकवादी प्रमाणित करने अथवा घोषित करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है ।
(4.)हमारा केवल इतना ही अधिकार है कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्र विरोधी कार्यवाही मे लिप्त है तो उसकी इंफॉर्मेशन पुलिस तक पहुंचा दें अथवा किसी उचित प्लेटफार्म पर उस सूचना को पहुंचाएं।
(5.)ज्यादा ही गंभीर मामला है इंटेलिजेंस ब्यूरो को भी सूचना दी जा सकती है परंतु इसका निर्णय लेने का हमें कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
प्रश्न- क्या‌ छपाक' फिल्म को बॉयकॉट करना उचित है?
उत्तर(1.)आपके और हमारे द्वारा छपाक फिल्म को बाॉयकाॅट करने से क्या होगा?
(2.)वामपंथी विचारधारा वाले लोगों और अन्य लोग जो फ्री कश्मीर जैसे नारे लगाते हैं वे समर्थन करेंगे तो फिल्म हिट नहीं होगी तो चलेगी तो जरूर।
(3.)इस देश में वामपंथी विचारधारा और फ्री कश्मीर जैसी विचारधारा रखने वाले लोगों की संख्या भी कम नहीं है ।दरअसल इस देश में देशहित को ध्यान में न रखकर दलहित,राजनीति व अपने स्वार्थ को प्राथमिकता दी जाती है। इसलिए इस तरह की विचारधारा को बदलने के लिए समाज की मानसिकता को बदलना होगा और समाज की मानसिकता तब ही बदल सकती है जबकि शिक्षा व ज्ञान शिक्षा राष्ट्रप्रेम को बढ़ावा देने वाली होगी तभी इस देश की दशा और दिशा दोनों परिवर्तित होगी।
 प्रश्न- क्या अब सरकार कोJNU जैसी शिक्षा संस्थाओं में सरकारी ऐड बन्द कर देनी चाहिये क्योंकि कोई भी टैक्स पेयर अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई इन छात्रों के वेश में पल रहे गुंडो के ऊपर खर्च करना नहीं चाहेगा?
उत्तर-(1.)गरीब,असक्त और असमर्थ लोगों को अनुदान तथा सहायता देनी ही चाहिए उसमें कोई बुराई नहीं है , कुछ जेएनयू के ऐसे विद्यार्थी हैं जिनको सहायता की आवश्यकता है। जेएनयू कुछ मुट्ठी भर छात्रों की वजह से बदनाम हो रहा है।
(2.) जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों को शहर से दूर किसी ऐसी जगह शिफ्ट करना चाहिए जो राजनीतिक वातावरण से दूर हो।
(3.) प्रोफेसर तथा लेक्चरर्स का स्थानान्तरण दूसरे विश्वविद्यालय में करते रहना चाहिए।
(4.) शिक्षा प्रणाली में भौतिक शिक्षा के साथ-साथ चारित्रिक व नैतिक शिक्षा को भी जोड़ना चाहिए।
(5.) दरअसल जेएनयू ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि हमारे कुछ राजनीतिक दल भी ऐसे हैं जिनकी सहायता से ये मुट्ठी भर विद्यार्थी जेएनयू में ऐसी हरकतें करते हैं। ऐसे राजनीतिक दलो को सोच समझकर वोट देना चाहिए।
(6.) सबसे बड़ी ऐड(ad)तो यह है कि जनता ऐसे लोगों को चुनाव में जीताती है इसलिए ऐसे लोगों को वोट नहीं देना चाहिए।
प्रश्न- जेएनयू के छात्र ज्ञान और नए भविष्य को तलाशने की बजाए छोटी राजनीति में क्यों उलझ रहे हैं?
उत्तर-(1.)राजनीतिक भूमि तथा राजनीति में एंट्री करने का चस्का लग जाता है तो ऐसा ही होता है।
(2.) ईमानदारी से तथा सही तरीके से प्रसिद्धि पाने में वक्त लगता है परन्तु ओछी तथा छोटी राजनीति से जल्दी से जल्दी हाईलाइट हुआ जा सकता है।
(3.) युवा काल में जोश तो होता है परंतु होश नहीं होता है इसलिए इस अवस्था में भटकने के ज्यादा मौक़े होते हैं।
(4.) युवाओं के चरित्र निर्माण करने में माता-पिता तथा शिक्षकों को सजग,सतर्क रहने की आवश्यकता है।
प्रश्न- JNU के छात्र अपने वॉइस चांसलर के विरुद्ध क्यों हैं?
उत्तर-(1.)जेएनयू में वामपंथी विचारधारा के विद्यार्थी पढ़ते हैं और वामपंथी छात्र संघ संगठन JNUSU की अध्यक्ष आइशा घोष वर्तमान में छात्रसंघ अध्यक्ष है।
(2.)JNUSU छात्र संघ संगठन, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से संबंध है, जबकि जेएनयू में एबीवीपी भारतीय जनता पार्टी से संबंध रखती है।
(3.) केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने के बाद जेएनयू में वाइस चांसलर को 2016 में एस. जगदीश कुमार को नियुक्त किया गया है, छात्र संघ संगठन JNUSU तथा छात्र संघ की अध्यक्ष आइशा घोष उन्हें पसंद नहीं करती है। इसका मतलब यह नहीं है कि जेएनयू के छात्र वाइस चांसलर को पसंद नहीं करते हैं ।
(4.) विपरीत विचारधारा रखने वाले जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष आइशा घोष तथाJNUSU इसलिए वाईस चांसलर का विरोध करते हैं।
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5.निष्कर्ष(Conclusion)-

इस देश में भिन्न-भिन्न विचारधारा के लोग रहते हैं,हमारी विचारधारा से कितनी भी अलग विचारधारा वाले लोग हो लेकिन सभी समस्याओं का समाधान वार्ता,मिलजुल कर बैठने,आपस में संवाद करने से हो सकता है।सभी मानवीय समस्याओं का समाधान शांतिपूर्ण तरीके और देश की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए खोजे जाने चाहिए।हमारे विचार से इसका समाधान यह हो सकता है-
(1.)तात्कालिक समाधान-
(अ)जो भी छात्र देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त हैं उन्हें विश्वविद्यालय से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए।
(ब)जेएनयू में कुछ समय के लिए छात्र संगठनों के चुनाव स्थगित कर देना चाहिए।हम स्थाई रूप से चुनाव स्थगित करने के पक्षधर इसलिए नहीं है क्योंकि भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था है।लोकतंत्र में राजनीतिक दल भाग लेते हैं, यदि शिक्षण संस्थानों से राजनीतिक लीडर तैयार नहीं होंगे तो यह गलत होगा क्योंकि एक तरह से यह राजनीति की प्रयोगशाला है।बहुत से राजनीतिक लीडर्स इन्ही यूनिवर्सिटी में तैयार हुए है।एस जयशंकर प्रसाद,विदेश मंत्री, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण
(2)दीर्घकालीन समाधान
(अ)जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों को शहर से बिल्कुल बाहर की तरफ बसाया जाए।
(ब)विश्वविद्यालय में कोई भी नीतिगत निर्णय लेने के लिए एक कमेटी का गठन किया जाए जिसमें छात्र संघ अध्यक्ष, जो छात्रसंघ अध्यक्ष चुनाव में दूसरे स्थान पर रहा वह छात्र, विश्वविद्यालय के कुलपति,प्रोफेसर,विश्वविद्यालय प्रशासन का कर्मचारी शामिल हो।
(स) भारतीय शिक्षा में चारित्रिक व नैतिक शिक्षा का समावेश हो।
(द) छात्रों और छात्राओं के लिए अलग-अलग शिक्षण संस्थानों की स्थापना हो।
अन्त में हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि ये हमारे अपने विचार हैं। आपको इससे सहमत होने या न सहमत होने का पूरा अधिकार है। हमने हमारी मोटी बुद्धि के अनुसार  यह आर्टिकल लिखा है इसमें किसी भी व्यक्ति की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का हमारा कोई मकसद नहीं है।हम तो यह चाहते हैं कि इन शिक्षण संस्थाओं में इस प्रकार की समस्याओं का कोई ठोस समाधान निकले।

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What is Education and Theism

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शिक्षा और आस्तिकता क्या है?(What is Education and Theism)-
(1.)परमात्मा तथा परमात्मा के विधि विधान को स्वीकारना आस्तिकता है. परमात्मा सत्प्रवृत्तियों का समूह अर्थात् कल्याणकारी, दयालु, न्यायकारी, चैतन्य, सर्वज्ञ इत्यादि शक्ति का समूह है. परमात्मा को सर्वव्यापी तथा उसके कर्मफल विधान पर विश्वास करना. उसे विश्व-व्यवस्था का अनिवार्य अंग मानते हुए अन्तरात्मा में अनुभूति करके उसका सानिध्य प्राप्त करना.
(2.)शिक्षा द्वारा बालकों को प्रारम्भ से ही परमात्मा के प्रति आस्थावान बनाने और अन्तर्बोध करने व कराने हेतु उन्हें प्रेरित करना और सहयोग करना.
(3.)आस्थावान बनने का हमारे आध्यात्मिक जगत् में तो लाभ है ही परन्तु सांसारिक जगत में भी उसका लाभ है. आस्थावान होने से हम अशुभ कार्य नहीं करते हैं तथा हमें आत्मिक संतोष प्राप्त होता है. शुभ कार्य करने हेतु हमारे आत्मिक बल में वृद्धि होती है.
(4.)अध्ययन करने में उच्चाटन नहीं होता है अर्थात् मन चलायमान नहीं होता है क्योंकि आस्तिकता का अर्थ ही यह है कि हम ध्यान तथा एकाग्रता के साथ उसकी उपासना करते हैं. ध्यान और एकाग्रता बालकों के अध्ययन में लाभदायक है.
(5.) ध्यान (Meditation)-

What is Education and Theism

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प्रतिदिन बालकों को ध्यान और एकाग्रता का अभ्यास कराने से एकाग्रता सधने लगती है. बालकों का अध्ययन करते समय मन चलायमान नहीं होता है जिससे पढ़ा हुआ ठीक से याद रहता है. ध्यान करने के लिए मन में अच्छे विचार करते रहना चाहिए. यदि अशुभ विचार आए तो उन्हें कम्पनी नहीं देनी चाहिए. रोज मन को आज्ञाचक्र (भ्रूमध्य) में एकाग्र करने का प्रयास करना चाहिए. वहाँ प्रकाशरूप ज्योति की कल्पना करनी चाहिए. प्रारम्भ में मन इधर उधर भटकता है परन्तु सतत अभ्यास और धैर्यपूर्वक करते रहने से एकाग्रता सधने लगती है.दूसरा तरीका यह है कि सुबह नित्य कर्मों से निवृत्त होकर मेट या चटाई पर सुखासन में बैठ जाएं।पश्चात आंखें बन्द करके दीपक की ज्योति का ध्यान करना चाहिए। निरन्तर सतत अभ्यास करने से एकाग्रता सधने लगती है। तीसरा तरीका तरीका यह है कि हमेशा अपने कार्य में व्यस्त रहने का अभ्यास करें, फालतू में अपने समय को नष्ट न करें क्योंकि ज्योही मन को स्वतन्त्र छोड़ते हैं त्योंही मन इधर-उधर भटकता है और हमारी एकाग्रता भंग हो जाती है।चौथा तरीक़ा है कि कुछ समय एकांत में रहने का अभ्यास करें, ध्यान रहें अकेलेपन और एकांत में अन्तर होता है। अकेलेपन का अर्थ है कि आपके पास कोई भी नहीं परन्तु आपका मन इधर-उधर भटकता रहता है और ऐसे अकेलेपन का कोई फायदा नहीं है। एकान्त का अर्थ है कि आप मन में कोई भी विचार नहीं आने देते हैं, विचारों का प्रवाह रुक जाता है। यदि एकाग्रता का अभ्यास करने पर भी मन इधर-उधर भटकता है तो धैर्य रखें, धीरे-धीरे सफलता मिलने लगती है। धैर्य नहीं होगा तो ध्यान टिक नहीं पाएगा। धैर्य न होने से हम काम अथवा ध्यान को बीच में छोड़ देंगे। ध्यान ही क्या संसार का कोई भी कार्य ध्यान के बिना पूरा नहीं होता है इसलिए ध्यान करने के लिए धैर्य धारण करना जरूरी है।
हमारा ध्यान भंग क्यों होता है,हमारा मन क्यों भटकता है।मन के भटकाने का कार्य करता है,हमारा अन्तर्मन। हमारे अन्तर्मन में संस्कार तथा किए गए कर्मों का अभ्यास अर्थात् आदतें संचित रहती है और उसी से मन निर्देशित होता है। इसलिए उन आदतों व संस्कारों को हटाकर नए एकाग्रता अर्थात् ध्यान रुपी संस्कारों का निर्माण करना होता है। पुराने संस्कार जो मन को भटकाने का काम करते हैं वे नए संस्कारों का विरोध करते हैं इसलिए तत्काल सफलता नहीं मिलती है।


(6.)शिक्षा तथा आवश्यकता का आपस में गहरा संबंध है ।सच्ची शिक्षा वही है जो मनुष्य को आस्तिक बनाती है। अपने कर्म करने में श्रद्धा उत्पन्न करती है ।बालक को शुरू से ही इस प्रकार की शिक्षा दी जानी चाहिए जिससे उसे धर्म, नैतिकता ,सदाचार इत्यादि गुणों को धारण करने की प्रेरणा मिले। 
(7.) आस्तिकता भी शिक्षा को प्रभावित करती हैं। आस्तिकता से बालकों का वैचारिक, बौद्धिक, मानसिक विकास होता है मानसिक विकास होता है तथा आचरण पवित्र बनता जाता है। शिक्षा के द्वारा भी बालकों का सर्वांगीण विकास होता है अर्थात शिक्षा का मूल उद्देश्य है बालकों का मानसिक, बौद्धिक, चारित्रिक व शारीरिक विकास करना। आस्तिकता से शिक्षा के इन उद्देश्यों की पूर्ति होती है‌।
(8.) शिक्षा व आस्तिकता का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है।इसका अर्थ यह नहीं है कि शिक्षा व आस्तिकता पर्यायवाची हैं। इनमें मूलभूत अन्तर होते हुए भी दोनों का उद्देश्य व्यापक रूप से समान है। शिक्षा के द्वारा जीवन में आस्तिकता आती है और वही सच्ची शिक्षा है।इसी प्रकार आस्तिकता से शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त किया जाता है।
(9.)सच्ची शिक्षा से नास्तिकता आ ही नहीं सकती है।सच्ची शिक्षा बालकों को जीवन में कर्म के प्रति आस्था उत्पन्न करती है‌। बालकों में शिक्षा के द्वारा आस्तिकता उत्पन्न करनी चाहिए जिससे जीवन और जगत के महत्वपूर्ण कार्यों को पूर्ण श्रद्धा व विश्वास के साथ कर सके। 
(10.)आज की शिक्षा प्रणाली में केवल भौतिक शिक्षा प्रदान करने को ही सच्ची शिक्षा मान लिया गया है जिससे आज का मानव अशांत, उच्छृंखल, बैचेन,उखड़ा-उखड़ा दिखाई देता है। भौतिक सुख समृद्धि होते हुए भी खुश व सुखी नहीं है क्योंकि उसे आस्तिकता की शिक्षा दी ही नहीं गई है या कह लीजिए दी ही नहीं जाती है।

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What should be the nature of Indian education?

What should be the nature of Indian education?

भारतीय शिक्षा का स्वरूप कैसा हो ?(What should be the nature of Indian education?)

What should be the nature of Indian education?
What should be the nature of Indian education?

1.प्रगति का आधार, स्वरुप और लक्ष्य(Progress Basis, Form and Goal) -

(1.)धन की आवश्यकता सर्वत्र समझी जाती है परन्तु यह मान्यता आंशिक रूप से सत्य है. प्रगति का महत्वपूर्ण पक्ष है दृष्टिकोण और चरित्र, इसी अर्थ में व्यक्ति सुसम्पन्न और सुसंस्कृत समझा जाना चाहिए.
(2)इस कथन से किसी को विरोध नहीं है कि पेट भरने पर ही मनुष्य कुछ कर सकने में समर्थ होता है. इसके लिए मनुष्य का पुरुषार्थ ही नहीं, स्वभाव भी ऐसा होना चाहिए जिससे निर्वाह की साधन सामग्री उपार्जित हो सके. इसे दैवी अनुकम्पा, सम्पन्नों की सहायता या सरकारी योजना के सहारे भी नहीं किया जा सकता है. भोजन तो अपने ही मुँह से चबाना पड़ेगा. उसे अपने ही पेट द्वारा पचाना पड़ेगा. दूसरो की सहायता एक सीमा तक ही सरलता उत्पन्न कर सकती है. चलना तो अपने ही पैरों के सहारे होगा. दूसरों के कंधों पर सवारी गाँठने की योजना सदा सफल नहीं होती है.
(3)अपने पैरों पर खड़ा होने का अर्थ है अपने मनोबल को समर्थ बनाना. इस आधार को आर्थिक प्रगति से बढ़कर न सही उसके समतुल्य तो मानना होगा. इसमें प्रथम व द्वितीय के पचड़े में न पड़कर इस प्रकार सोचा जा सकता कि दोनों एक दूसरे पर निर्भर है. एक दूसरे के पूरक है. तात्पर्य यह है कि चारित्रिक विकास के बिना भौतिक प्रगति दिन में सपने देखने जैसा है.
(4.)भौतिक शिक्षा में साधन लक्ष्य बन जाता है और आध्यात्मिक शिक्षा में साधन, साधन ही रहते हैं और लक्ष्य ही लक्ष्य रहते हैं. यदि आवश्यकता पड़े एवं कोई अन्य विकल्प शेष न रहे तो सच्ची शिक्षा साधनों का परित्याग कर सकती है लेकिन लक्ष्य का नहीं.
(5.)शिक्षा का सीधा अर्थ सुसंस्कारिता का प्रशिक्षण है. इसे नैतिकता, सामाजिकता, सज्जनता, प्रामाणिकता आदि किसी भी नाम से पुकारा जा सकता है.

2.आत्मिक प्रगति के लिए उत्कृष्ट शिक्षा की आवश्यकता (Excellent education required for spiritual progress)-

(1.)अनेक लोग कबीर, दादू, नानक, तुकाराम, रैदास, नरसी यहाँ तक कि सुकरात, मुहम्मद और ईसा जैसे महात्माओं एवं महापुरुषों का उदाहरण देकर कहते हैं कि यह लोग शिक्षित न होने पर भी पूर्ण ज्ञानवान तथा आध्यात्मिक सत्पुरुष थे. इनका सम्पूर्ण जीवन निष्पाप रहा और निश्चय ही इन्होंने आत्मा को बन्धन मुक्त कर मोक्ष पद पाया है. इससे सिद्ध होता है कि निष्पाप जीवन के लिए शिक्षा अनिवार्य नहीं है. ऐसा कहने वाले यह भूल जाते हैं कि अनायास ज्ञान प्राप्त करने वाले महापुरुष अपने पूर्वजन्म के संस्कार लेकर आते हैं.

3.शिक्षा ऐसी हो जो समस्याएं सुलझाए(Education should solve problems)-

(1.)अध्यापकों से उनके कार्य के बारे में पूछा जाता है तो वे कहते हैं 'पढ़ाते हैं' इस पढ़ाने की व्यक्ति और समाज के लिए कितनी उपयोगिता है? केवल लिखने पढ़ने, साहित्य सीख लेने से जीवन की समस्याओं को सुलझाने में कितना योगदान मिल सकता है?
(2.)दैनिक जीवन की वस्तुओं का उत्पादन और उपयोग - उपभोग करने की कला मानव जीवन की ऐसी आवश्यकता है जो हर एक को सीखनी चाहिए. पढ़ाई में उसका समुचित स्थान होना चाहिए. व्यक्तित्व विकास में जिन सद्गुणों की आवश्यकता है उनका महत्त्व, स्वरुप और प्रयोग सिखाना अध्यापकों का उद्देश्य होना चाहिए. समाज की सुव्यवस्था के लिए व्यक्ति और समूह के पारस्परिक सम्बन्ध क्या हों? दोनों एक-दूसरे के पूरक बनकर कैसे रहे? इस प्रश्न को मात्र समाज विज्ञान की पुस्तकों द्वारा नहीं सुलझाया जा सकता, बच्चों को इस सम्बन्ध में व्यावहारिक ज्ञान सिखलाना होगा.
(3.)असली पढ़ाई वह है जो अभ्यास से अनुभव में आती है. जीवन क्षेत्र में उतरने पर प्रस्तुत आवश्यकताओं की पूर्ति और समस्याओं के समाधान का व्यावहारिक ज्ञान ही कारगर साबित हो सकता है.

4.जीवन का स्वरुप और उपयोग सिखा सकने वाली शिक्षा चाहिए(Need education that can teach the form and use of life)-

(1.)शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए यथार्थता का ज्ञान. दुनिया वैसी नहीं है जैसी कि हमें दिखाई देती है या बताई जाती है. व्यक्ति और समाज की समस्याएं वही नहीं है जिनकी चर्चा की जाती रही है. यथार्थता की तली तक पहुँचने के लिए किस प्रकार की गोताखोरी की जानी चाहिए? इसी कला को सिखाना शिक्षा का उद्देश्य है. भ्रान्तियों, विकृतियों और कुरीतियों के बन्धन से छुटकारा पाकर स्वतन्त्र चिन्तन की क्षमता प्राप्त करने और जीवन व विश्व का यथार्थ स्वरूप समझ सकने के योग्य तीक्ष्ण दृष्टि प्राप्त करना इसी का नाम मुक्ति है.
(2.)सच्चे शिक्षक वे हैं, सच्चे अभिभावक और हितैषी वे हैं, जो अपने प्रभाव और ज्ञान का उपयोग अपने प्रभाव क्षेत्र में स्वतंत्र चेतना विकसित करने के लिए करते हैं यदि कहीं कोई सच्चे अर्थ में 'विद्यालय' जीवित हो तो उसका लक्ष्य भी शिक्षार्थियों में स्वतंत्र चेतना का विकास करना ही होगा.

5.शिक्षा का स्वरुप निखरे और उद्देश्य स्पष्ट हो(.To evolve the nature of education and the purpose should be clear) -

(1.)रेखागणित, बीजगणित आदि में प्रवीणता प्राप्त करने का कठोर परिश्रम उन्हें करना चाहिए जिन्होंने अपना कार्यक्षेत्र उस प्रकार का चुना हो. रटने में घोर परिश्रम करने, उपयोगी प्रतीत न होने पर मन न लगने, फेल न होने और उससे बचने के लिए निरर्थक तरीकों से पास होने का प्रयत्न चलने के प्रधान कारणों में से एक यह है कि अपरिपक्व बुद्धि के बालक भी यह नहीं समझ पाते कि इस सब की खातिर कब, किस निमित्त आवश्यकता पड़ेगी.
6.आम आदमी को परिष्कृत कर सकने वाली शिक्षा चाहिए(Public education can be refined) -
(1.)साक्षरता अनिवार्य है. उसके बिना विद्याध्ययन का विचार-प्रेषण का क्रम ही नहीं बनता. पैर न हो तो चलना कैसा? अशिक्षितों के लिए इतना ही सम्भव है कि पूछने बताने के आधार पर समीपवर्ती लोगों से औंधा-सीधा हस्तगत हो सके, उसी से काम चलाएं.
(2.)अध्ययन का विषय कुछ भी क्यों न हो? उससे जानकारियां जो भी मिलती हो पर देखने की बात यह है कि व्यक्ति का रुझान किस ओर है? यदि पाठ्य सामग्री में श्रेष्ठता अपनाने के लिए उत्साह उत्पन्न करने की क्षमता विद्यमान है तो ही उसे स्वीकार्य किया जाना चाहिए.

7.शिक्षा के साथ उद्देश्य भी जुड़ा रहे(Objectives should also be associated with education) -

(1.)बच्चे के विद्यालय जाने पर अभिभावक को अध्यापक से मिलते रहना चाहिए तथा समय समय पर समुचित सुधार की सलाह देनी चाहिए. उसे सदैव इसकी जानकारी रखनी चाहिए कि विद्यालय में क्या पढ़ाया जा रहा है तथा लड़का कैसी प्रगति कर रहा है? समय समय पर अध्यापक से मिलकर बच्चे की प्रगति के सम्बन्ध में चर्चा करते रहना चाहिए. ऐसा करने से बच्चे की प्रगति अबाधगति से होती रहेगी बच्चा पढ़ाई में रुचि भी लेता रहेगा.
(2.)विद्यालय में मिले गृह कार्य की पूर्ति के लिए बच्चे को प्रोत्साहित करते रहना चाहिए, बच्चे भी स्वाभाविक ही अपनी सफलता चाहते हैं. अब बच्चे विद्यालय से अरुचि प्रकट करे तो अभिभावक को बच्चों के अध्यापक से मिलना चाहिए तथा विचार विमर्श करके समाधान निकाल लेना चाहिए.
(3.)बच्चे प्रशंसा, सम्मान तथा स्नेह के भूखे हैं. अतः उनकी भूलों पर उन्हें बेवकूफ़ नहीं कहा जाना चाहिए, डाँट-फटकार कर भयभीत नहीं करना चाहिए. बल्कि सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार से उसे आगे बढ़ाना चाहिए. प्रारम्भिक कक्षा में बच्चों की क्षमता एवं अभिरुचि के अनुकूल पाठों का समावेश लाभप्रद होगा.
(4.)बच्चे के समक्ष विद्यालय की आलोचना नहीं करनी चाहिए क्योंकि इसका बच्चों के कोमल मानस पटल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. बच्चों के उत्तर सीधे एवं सरल रूप में देना उचित है.

8.शिक्षा में सार्थकता भी हो(Education should be meaningful) -

(1.)शिक्षा का महत्त्व स्वीकार करने के साथ साथ यह भी मानकर चलना चाहिए कि उसका मूलभूत उद्देश्य चिन्तन, चरित्र, व्यवहार एवं लोक परिचय के सम्बन्ध में उपयोगी जानकारियाँ प्राप्त करना है.
(2.)आजीविका के लिए कृषि, व्यवसाय, शिल्पकला आदि की शिक्षा अलग से मिलनी चाहिए. वह ज्ञान सम्वर्द्धन के साथ साथ चलता रहे तो भी हर्ज नहीं. किन्तु स्वयं शिक्षा को आजीविका का विशेषतया नौकरी का माध्यम मानकर चलना आदि से अंत तक गलत है.
(3.)शिक्षा के क्षेत्र में चीन व क्यूबा का प्रयास बड़े महत्त्व का है. सामान्य विषयों के साथ साथ यहाँ आरम्भिक विद्यालय के बालक बगीचा में श्रम करते, विद्यालय भवन की साज सज्जा करते तथा सामान्य फर्नीचर व घरेलू सामग्रियों का निर्माण करने में संलग्न होते हैं. ये बच्चे अपनी छुट्टियों के समय कृषि क्षेत्र में जाकर कार्य करते तथा साथ साथ ग्रामीण प्रौढ़ों को शिक्षित करने का प्रयास चलाते हैं. शिक्षकगण भी फसल उत्पादन में भाग लेते हैं तथा कुशल किसान व बढ़ई आदि विद्यालय क्षेत्र में जाकर विद्यार्थियों को प्रशिक्षित करते हैं.
(4.)शिक्षक अपनी रुचि अथवा सनक के अनुसार ही न चले बल्कि बच्चों की वास्तविक आवश्यकताओं का ध्यान रखें.

9. प्रशिक्षण का क्रम आजीवन चलता रहे(The sequence of training should go on for a lifetime)-

(1.)शिक्षा एक ऐसा साँचा है जिसमें विद्यार्थी की गीली मिट्टी को किसी भी आकृति में ढाला जा सकता है। माता-पिता यह कार्य नहीं कर सकते क्योंकि वे विशिष्ट पद्धति में प्रवीण-पारंगत नहीं होते हैं। वह कार्य विशेषज्ञों का है। इसलिए उस प्रयोजन के लिए प्राचीनकाल की तरह अभी भी अध्यापकों का, शिक्षण संस्थाओं का ही आश्रय लेना पड़ता है।
(2.)आगे बढ़ने के लिए बदली परिस्थितियों में बहुत कुछ नया सीखना पड़ता है। नई आकांक्षाएं नया मार्ग खोजती है और नए साधन माँगती है। इसके लिए पूर्व संचय कम करना पड़ता है और पिछली - पिछड़ी स्थिति में जितने से काम चलता रहा है उसकी अपेक्षा अधिक उच्चस्तरीय तलाश करना पड़ता है। मानवी प्रगति के साथ-साथ तदनुरूप प्रशिक्षण की आवश्यकता भी बढ़ती रहेगी। अस्तु, शिक्षा को जीवन सहचरी माना जाना चाहिए और उसे नित्यकर्म की तरह दिनचर्या का एक अविच्छिन्न अंग समझते हुए तदनुरूप प्रबन्ध करना चाहिए।
(3.)बालकों को जो बनाना है, वही उन्हें पढ़ाना चाहिए। वयस्कों को जिस लक्ष्य तक पहुँचाना हो, उसके अनुसार अध्ययन क्रम निर्धारित करना चाहिए। अन्यान्य विषयों की जानकारी प्राप्त करते चलने में हर्ज नहीं पर चिन्तन को दिशा देनेवाला सुनियोजित निर्धारण होना ही चाहिए।

10.शिक्षा अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप हो(Education should suit your needs) -

(1.)शिक्षकों के लिए इतना ही पर्याप्त न हो कि वे अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण कराते रहें। उन्हें अधिक वेतन पाने, अधिक ट्यूशन बटोरने की ही फिक्र में ही डूबे न रहना चाहिए वरन् यह भी अनुभव करना चाहिए कि वे उस नई पीढ़ी के निर्माता हैं जिसे अगले दिनों देश की बागडोर सँभालनी है। इसके लिए उन्हें पढ़ाने की कला में ही निष्णात नहीं होना चाहिए वरन् इस तथ्य पर भी ध्यान रखना चाहिए कि विद्यालय के वातावरण में उस सुसंस्कारिता का भरपूर समावेश हो जो कच्ची आयु के बालकों का स्वभाव एवं व्यक्तित्व उत्कृष्ट बनाने के लिए आवश्यक है।
(2.)विदेशों में क्या होता है? इसके लिए आँखें बन्द करके अन्धानुकरण करने की आवश्यकता नहीं। उसके पीछे अपने कई परिस्थितियों और  संस्कृति का भी समावेश होना चाहिए।

11.शिक्षा ऐसी हो जो काम आए(Education should be useful)-

(1.)सरकारी शिक्षण पद्धति जैसी भी कुछ चल रही है,, उसमें समयानुरूप परिवर्तन की बात उन राजनेताओं पर छोड़ देना चाहिए जो उस तन्त्र को चलाते और पाठ्य-पुस्तकों का निर्धारण करते हैं। सर्वसाधारण के लिए उस परिवर्तन का आन्दोलन खड़ा करने की अपेक्षा यह अच्छा है कि जिस प्रकार की उपयुक्तता, आवश्यकता समझी जाती है, उसे स्वयं कार्यान्वित करने के लिए यथासम्भव कदम उठाएँ।
(2.)रचनात्मक कार्यक्रम खड़े करने की अपनी विशेषता है। उसके पीछे कुछ कर गुजरने वाले कर्मठों की क्षमता निखरती है और आत्मविश्वास बढ़ता है। जबकि नुक्ता-चीनी करते रहने और दोष निकालते रहने वालों को झंझट खड़े करने के अतिरिक्त कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण जैसा हाथ नहीं लगता।
(3.)अब हर साल स्कूल-काॅलेजों से इतने विद्यार्थी निकलते हैं कि उन सबकी इच्छा के अनुरूप नौकरी मिलना असम्भव हो गया है। पारिवारिक परम्परा के कृषि, शिल्प, व्यवसाय उन्हें सुहाते नहीं हैं। श्रम भी अधिक करना पड़ता है और जिस साहबी ठाठ-बाट की हवा, पढ़ाई के दिनों में लगी उसकी पूर्ति का भी कोई तुक नहीं बैठता है। उनके अनुरूप काम नहीं मिलता। काम के अनुरूप वे फिट नहीं बैठते हैं। ऐसी दशा में बेकारी के असमंजस भरे दिन उन्हें गुजारने पड़ते हैं। इन विपन्न दिनों में वे अपराधी प्रवृत्तियाँ अपनाने से लेकर जो कुछ भला-बुरा सूझता है, कर गुजरते हैं।
(4.)काॅलेज की पढ़ाई पूरी करने में प्रायः 14 वर्ष लगते हैं। खाने, पहनने, जेब खर्च जोड़ा जाए तो ढाई हजार प्रतिवर्ष के हिसाब से 35 हजार बैठते हैं। खर्च होनेवाली राशि का ब्याज जोड़ा जाए तो वह सत्तर हजार होती है। उसे डिपोजिट में जमा कर दिया जाता तो प्रायः 800 रुपया मासिक सौ पीढ़ी तक मिलती रहती और जब चाहा जाता, वह धन लौटाया जा सकता था। इतने लम्बे समय सिरखाऊ श्रम और वजनदार धन लगाने के उपरान्त भी बेकारी, कुढ़न और पश्चाताप ही हाथ लगे तो समझना चाहिए कि कहीं कोई बड़ी भूल हो गई। कुछ नहीं तो इसके बदले जीवनोपयोगी ज्ञान और प्रतिभाशाली व्यक्तित्व तो हाथ लगना ही चाहिये। इस दृष्टि से भी उपलब्ध शिक्षा आवारा जैसी प्रतीत होती है।
(5.)वर्तमान स्थितियों में बच्चों को सरकारी नौकरियों की दृष्टि से पढ़ाना सर्वथा अदूरदर्शिता है। अगले दिन शिल्प उद्योग और व्यावसायिक शिक्षा के हैं, उसी दिशा में सोचने और गुजारा चलाने की बात सोचनी चाहिए। सबसे बड़ी बात है, बच्चों को व्यवहारकुशल एवं प्रतिभावान व्यक्तित्त्व विनिर्मित करने की। इसके लिए समानान्तर विद्यालयों का ढाँचा खड़ा करना ही बुद्धिमतापूर्ण हो सकता है जो इन्हें खड़ा कर सकेंगे, वे एक बड़ा मिल खोलने या चलाने से अधिक यशस्वी होंगे।
(6.)सरकारी पढ़ाई में सबसे बड़ा दोष यह है कि निरर्थक विषयों की तोता रटन्त करनी पड़ती है। उस श्रम के भविष्य में कुछ काम न आने की बात सोचकर शिक्षार्थी ऊबते और खुरापातों की ओर मन चलाते हैं। यदि काम में आनेवाले और जीवन को प्रगतिशील बनाने वाले विषय पढ़ाने पड़ें, तो उनमें रुचि बढ़ेगी और मस्तिष्कीय विकास को सहज ही असाधारण लाभ मिलेगा, सरकारी प्रमाण-पत्रों का बाजार रेट अब निरन्तर गिरता जा रहा है। उसकी ओर से हाथ खींचकर काम आनेवाली शिक्षा पर ध्यान दिया जाए तो पढ़ाई छोड़ने के बाद किसी को पछताने या असमंजस में पड़ने की आवश्यकता न पड़ेगी।
(7.)लड़कों की भाँति लड़कियों के लिए भी समानान्तर शिक्षा नितान्त आवश्यक है। सरकारी स्कूलों में उच्च प्राथमिक कक्षा तक लड़के लड़की साथ पढ़ें। इसके उपरान्त उनके भावी जीवन को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रम निर्धारित किया जाए और ऐसे ही वातावरण में उन्हें पढ़ने का प्रबन्ध किया जाए। लड़कों को समाज सम्पर्क रखने के लिए व्यवहारकुशलता और आजीविका उपार्जन के लिए आरम्भ से ही अपना ध्यान मोड़ने और तदनुरूप पढ़ने में श्रम, समय और धन लगाना चाहिए। लड़कियों का कार्यक्षेत्र परीवार संचालन है। ये विवाहित-अविवाहित जिस भी स्थिति में रहें, उन्हें परिवार संस्था की सुयोग्य संचालिका-शिक्षिका बनना चाहिए। सरकारी नौकरियों में भी उन्हें अन्धी दौड़ में नहीं पड़ना चाहिए। बच्चों व घर को अस्त-व्यस्त करके ही महिलाएं नौकरी कर सकती हैं। फिर अफसरों के उचित-अनुचित दबाव न मानने पर ऐसी जगह ट्रान्सफर पर जाना पड़ता है, जहाँ जिन्दगी दूभर हो जाती है। यदि उनको अपनी स्किल तथा प्रतिभा को तराशना है तो आजकल आनलाईन बहुत से कार्य हैं जिनको घर बैठे ही कर सकती है जैसे ब्लाग में लिखना, यूट्यूब पर वीडियो डालना, ई-बुक लिखना, मार्केटिंग इत्यादि का कार्य किया जा सकता है।

12.सुशिक्षित की सही पहचान(Correct identification of well-educated)-

व्यक्ति सुशिक्षित है इस बात की परख करनी है तो हमें निम्न तथ्यों को ध्यान में रखना होगा
(1.)क्या वह जो कुछ बोलता या लिखता है, वह सुनिश्चित और लगाव-लपेट रहित, स्पष्ट होता है।
(2.)उसने जो कुछ पढ़ा है, उससे कुछ आदर्श और आस्थाएं जीवन में उतरी या नहीं यदि उतरी तो क्या उसमें इतना साहस है कि वह उनके लिए कैसे भी बुरे समाज से लड़ना पड़े?
(3.)समाज सुधार की प्रक्रिया में क्या वह इस तरह की ईमानदारी, सद्भाव और सहिष्णुता व्यक्त कर सकता है जैसे एक माँ अपने प्रिय बेटे के लिए?
(4.)इतने पर भी वह निराश नहीं? बुरी से बुरी परिस्थितियों में यदि वह आशावादी है तो निस्संदेह वह सुशिक्षित कहलाने का पात्र है।
(5.)एक समय था जब हमारे बुजुर्ग मार्गदर्शन, नीतिज्ञ और उदात्त चरित्र वाले होते थे। उन्होंने धर्म मर्यादाएं, सामाजिक अनुशासन, परम्पराएँ और रीति-रिवाज इस ढंग से बना दिए थे कि आनेवाली पीढ़ी उनका अनुसरण करने मात्र से ऐसे आदर्श तथा आस्थापूर्ण जीवन ग्रहण कर लिया करती थी। व्यक्ति गीली मिट्टी है तो बुजुर्ग साँचे। साँचे में जैसे मिट्टी डाल दी जाती थी व्यक्ति का स्वरूप वैसा ही निखर आता था। आज वह परिस्थितियाँ बदल गई है। आदर्श और श्रद्धा के लिए इन दिनों जीवन में कोई स्थान नहीं रहा। उनके लिए लड़ने की हिम्मत की बात तो सोची भी नहीं जा सकती। बड़ों के जीवन में कोई क्रमबद्धता न होने का परीणाम यह है कि पीढ़ियाँ उच्छृंखल और अनुशासनहीन हो चली। ऐसी स्थिति में सुशिक्षित कहलाने का अधिकार उसे मिलेगा जो वर्तमान के विचार जंजाल में से आदर्श और आस्थाएं स्वयं ढूँढें और चुने। अपने विवेक की रक्षा के लिए उसे अपने माता-पिता से भी लड़ने में नहीं हिककिचाना चाहिए।

13.शिक्षा के सन्दर्भ में उपेक्षा क्यों बरतें(Why be neglectful in the context of education)-

(1.)सार्थक शिक्षा लेनी है तो उन प्रसंगों को छोड़ना पड़ेगा जो स्कूल छोड़ने के बाद जीवन में कभी काम नहीं ही नहीं आते। इस संशय में काम की बातें छूट जाती है और निरर्थक कूड़ा सिर पर लद जाता है। निरर्थक इसलिए कि उससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। यहाँ तक कि आजीविका का प्रश्न भी हल नहीं होता। ऐसी स्थिति में बच्चों की शिक्षा के सम्बन्ध में नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है।
(2.)शिक्षण की ओर दो दृष्टियों से देखना चाहिए। आध्यात्मिक जीवन की दृष्टि से और हमारे चारों ओर की दृष्टि से, शिक्षण से आत्मोन्नति भी होनी चाहिए और वह परिस्थिति के अनुरूप होना चाहिए।

14.आज की शिक्षा सैद्धान्तिक है(Today's education is theoretical)-

(1.)बेकार शिक्षित क्या करें? यह बड़ी टेढ़ी समस्या है। बाजार में कोई टके सेर नहीं पूछता। किसी दुकान पर जाते हैं तो मुट्ठी भर पैसे मिलते हैं जिससे जीवन का ठीक से गुजारा भी नहीं हो सकता है और बात-बात पर झिड़की सुननी पड़ती है। अतः उनसे निभ सकना बहुत कठिन है। एक जगह छोड़कर दूसरी जगह तलाश करते हैं, दूसरी जगह छोड़कर तीसरी जगह। कहीं भी उचित सम्मान और उचित पैसे मिलने का सिलसिला बैठता नहीं। ऐसी स्थिति में वे गलत ढंग से कमाने की बात सोचते हैं।
(2.)चोरी-उठाईगीरी में जब वह पकड़ा जाता है तो ऐसा कोई नहीं कहता कि यह मजबूरी में करना पड़ा। हरामखोरी का इल्ज़ाम लगता है। बाहर के और घर के समान रुप से कोसते और लानत मलानत देते हैं।
(3.)आधुनिक शिक्षा के बहुत ऊँचे फल सोचनेवाले स्वप्नों की दुनिया में रहते हैं। सौ में से अस्सी को नौकरी नहीं मिलती है। नौकरी के अतिरिक्त यह शिक्षा और किसी काम आती नहीं है। इसे पढ़कर कोई धन्धा व्यवसाय करना नहीं चाहता है। आदते ऐसी पड़ जाती हैं जिससे वह घर वालों के व्यवसाय में नहीं लग सके।
(4.)थोड़ी बहुत टूटी-फूटी अंग्रेजी को सीखकर घरवालों को मूर्ख समझते हैं। मानो उनको अंग्रेजी आती है तो बहुत बड़े जानकार और बाजीगर हो गए हैं। अपना अहंकार और दूसरों के प्रति तिरस्कार का भाव बढ़ता है।

15.प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति(.The Ancient Indian System of Education)-

विचार का चिराग बुझ जाने से आचार अन्धा हो गया है। मेरे नजदीक विचार या बुद्धि की जितनी कीमत हैं, उतनी तीनों लोकों में नहीं।

16.प्राचीन और आधुनिक शिक्षा(Ancient and modern education)

(1.)अध्यापक लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि उनके विद्यार्थी अच्छे नम्बरों से पास हो जाएं ताकि वे अच्छे अध्यापक गिने जाएं और पुरस्कार तथा वेतन अच्छा मिले। वे इस बात की आवश्यकता समझते ही नहीं हैं कि विद्यार्थी के व्यक्तिगत गुण, कर्म, स्वभाव का निरीक्षण करें और उसे उचित दिशा में विकसित करने का प्रयत्न करें। विद्यार्थी चाहे जैसे दोषों, दुर्गुणों में फँसा रहे, अध्यापक का उसमें कोई सरोकार नहीं।
(2.)वर्तमान शिक्षा एकांगी है। वास्तविक शिक्षा वह है जिससे मनुष्य का उत्थान, विकास और आध्यात्मिक उन्नति हो सके, जिससे मनुष्य का शरीर स्वस्थ, मन निर्मल हो, वह प्रपंचरहित, परोपकारी, बुद्धिमान तथा एक योग्य नागरिक बने वही सच्ची शिक्षा कही जा सकती है।
(3.)आज आध्यात्मिक शिक्षा भी मनुष्य को पूर्ण आचरणयुक्त ज्ञान कराने में असमर्थ हो रही है। जो कुछ भी अध्यात्म के नाम पर अथवा धर्म-कर्म कराने वाली शिक्षा दी जाती है, वह भी एक यन्त्रवत क्रिया मात्र ही रह जाती है क्योंकि शिक्षक अध्यात्म, कर्मकांड के रहस्य को शिक्षार्थी के अन्तर में नहीं उतार पाते हैं। उधर शिक्षार्थी भी अधूरे ज्ञान एवं उपेक्षित मन से अपूर्ण बातें ही सीखते जाते हैं।
(4.)मानव जीवन के उत्थान में वही शिक्षा समर्थ है जो उसके विवेक, पुरुषार्थ, सेवा, कृतज्ञता इत्यादि भावनाओं को विकसित करे।

17.वर्तमान शिक्षा सैद्धान्तिक, व्यावहारिक नहीं(Current education theory, not practical)-

(1.)यह शिक्षा अपने पाँवों पर खड़ा होना नहीं सिखाती है। सिखाती है पंगु होना। नौकरी करना ही हर कोई चाहता है। उसमें न श्रम करना पड़ता है, न जोखिम उठानी पड़ती है। दोष नौकरी चाहने वालों का है इस शिक्षा का है, शिक्षा पद्धति का है जो ऊँचे-ऊँचे सपने दिखाती है परन्तु जिसकी नींव बिल्कुल खोखली है। जैसे गोबर के ढेर के चारों ओर घी का लेपन कर दिया गया हो।
(2.)शिक्षा पाने के पीछे लक्ष्य तो केवल नौकरी तथा डिग्री हासिल करने का था। जबकि शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए स्वावलंबी, ज्ञानवान, चरित्रवान, व्यक्तित्व इत्यादि से सम्पन्न बनना और देश, समाज व परिवार के लिए उपयोगी नागरिक बनना। जिसका इस टकसाली शिक्षा में अभाव ही है।
(3.)शिक्षा के अन्तर्गत शारिरिक स्वास्थ्य सम्बन्धी समुचित ज्ञान तथा व्यवहार का समावेश इस शिक्षा पद्धति में लगभग नहीं किया गया है।
(4.)स्वास्थ्य सम्बन्धी समुचित शिक्षा तथा लोक व्यवहार का ज्ञान न होने से हमारे युवा विद्यार्थी प्राकृतिक रूप से स्वस्थ रहने की कला में बिना पढ़ें-लिखों के समकक्ष ही ठहरते हैं।
(5.)नैतिक शिक्षा का उचित समावेश भी पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया गया है। अनैतिकता से व्यक्ति व समाज को क्या लाभ होता है तथा इसके अभाव में क्या व्यक्तिगत तथा सामाजिक हानियाँ होती है?

18.आधुनिक शिक्षण की समस्याएँ(Problems of modern learning)-

भूदान आन्दोलन के प्रवर्तक आचार्य विनोबा भावे ने'जीवनी' की प्रधान तीन बातों में (1.)भक्ति (2.)उद्योग (3.)हम जो जानते हैं उसे दूसरों को सिखाना, बताना। इन तीन बातों पर बहुत जोर दिया है।

19.भारतीय शिक्षा में आवश्यक परिवर्तन(Essential Changes in Indian Education)-

भारत में नैतिक, आत्मिक और धार्मिक शिक्षण से अटूट सम्बन्ध सदैव से रहा है, आज के युवक और अध्यापक वर्ग के भावों में भी क्रान्ति लाने का कोई साधन है तो वह नैतिक शिक्षा है।

20 युवाओं को सम्पूर्ण शिक्षा दी जाए(Provide complete education to the youth)-

भारत के भावी निर्माता आधुनिक आचार्यों के ग्रन्थों का अध्ययन करें, वे संसारभर के परम बुद्धिमान लोगों से ज्ञान सीखें, वे धर्म की ओर अनुभव व तर्क से प्रामाणिक मत और व्यक्तित्व के आधुनिक ढंग से बढ़ें और इस तरह अपने लिए दृढ़ तथा मौलिक आधार स्थिर करें।

21.शिक्षा का उद्देश्य और स्तर श्रेष्ठ हो(The aim and level of education should be excellent)-

(1.)शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है वह ज्ञान जो व्यक्तिगत, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक समस्या का स्वरूप और समाधान कर सकने में समर्थ हो।

22.वर्तमान शिक्षा पद्धति में क्या सुधार हो?(What should be the improvement in the current education system?)-

(1.)सादा जीवन, उच्च विचार के हर पहलू को शामिल किया जाना चाहिए। इस आधार को मजबूत करने के लिए तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण का समावेश होना चाहिए।
(2.)शिक्षा के स्तर में गिरावट का एक प्रमुख कारण परीक्षा पद्धति की विकृति भी है, परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त करने वालो को श्रेय मिलता है। अतः बौद्धिक क्षमता बढ़ाने के बजाय विद्यार्थी किसी न किसी तरह अधिक अंक प्राप्त करना अपना ध्येय बना लेते हैं।
(3.)परीक्षा में नकल करना, अनुचित साधनों का प्रयोग करने में मात्र विद्यार्थियों को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता।इसमें वह परीक्षा-पद्धति भी दोषी है जिसमें वार्षिक परीक्षा के नम्बरों पर ही सबकुछ निर्भर रहता है। होना तो यह चाहिए कि मासिक या साप्ताहिक परीक्षा हुआ करें और उसमें प्रश्न-पत्रों के उत्तर ही नहीं वरन् विद्यार्थी की समझ, प्रतिभा एवं शिक्षा का उद्देश्य पूरा करने के लिए अपनाई गई दिलचस्पी या मेहनत का उल्लेख हो। यह जाँच पड़ताल क्लास टीचर ही न करें वरन् इसमें अन्य कक्षाओं या स्कूलों के अध्यापकों का भी सहयोग लिया जाए।
(4.)आजकल तो विद्या और नौकरी पर्यायवाची शब्द बन गए हैं। ऐसी हालत में प्रत्येक मनुष्य स्वार्थ साधन में तल्लीन रहेगा, इसके सिवाय उससे ओर किस बात की आशा की जा सकती है? ऐसा व्यक्ति समाज के कल्याण की ओर क्या ध्यान दे सकता है?

(5.)शारीरिक शिक्षा(physical education)-

इसका ध्येय शरीर की सुव्यवस्था और रक्षा होना चाहिए। इसमें बतलाया जाए कि हम कब, कितना खाएँ, कब कितना सोवें, कब और कितना तथा किस प्रकार अपना मनोरंजन करें, कब कितना और किस प्रकार व्यायाम करें। मनोरंजन तथा व्यायाम की शिक्षा व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों रूपों में दी जानी चाहिए ताकि हमारे भीतर सहयोग की भावना का विकास हो और हम समाज में मिलकर काम करना सीखें।

मानसिक शिक्षा(Mental education)-

इसका उद्देश्य है हमारे दिमाग का उचित रीति से विकास होना। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम केवल अपनी पाठ्यपुस्तकों तथा अन्य पुस्तकों को भली प्रकार समझकर याद कर सकें वरन् इसका उद्देश्य यह है कि हम अपने शरीर-रक्षा की विधि को जानकर उसके अनुसार आचरण करें, हममें सेवा भाव उत्पन्न हों, हमारे हृदय में बन्धुभाव जागृत हो, हम नई बात जानने को उत्सुक हों और निरन्तर अपनी ज्ञान-वृद्धि करते रहें, हममें कार्यक्षमता आए और हममें भले-बुरे का विवेक उत्पन्न हो।

आध्यात्मिक शिक्षा(Spiritual education) -

इसका उद्देश्य है कि हममें सम्मान तथा आदर का भाव उत्पन्न हो, अपने आस-पास वालों के प्रति बन्धुत्व की भावना का उदय हो और दया तथा करुणा के भावों की वृद्धि हो।

23.वर्तमान शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन हो(There should be a radical change in current education)-

(1.)शिक्षा से समाज में रहने, विचार करने, भले-बुरे की परख, आचार-विचार की क्षमता का विकास होता है। ऐसी व्यावहारिक शिक्षा समाज से मिलती है, विद्यालयी शिक्षा पुस्तकों और शिक्षकों के माध्यम से अर्जित करनी पड़ती है। दोनों ही शिक्षाएँ मनुष्य के ज्ञान व अनुभव को परिमार्जित करती, कार्यक्षमता, योग्यता, कुशलता में वृद्धि करती है।
(2.)शिक्षा के तीन प्रमुख लक्ष्य बताएं गए हैं
(क) स्वावलम्बन (ख) व्यक्तित्त्व का निर्माण (ग) सामाजिक सद्भावना का विकास
(3.)स्वावलम्बन ही पर्याप्त नहीं है, व्यक्तित्त्व की श्रेष्ठता एवं अनुभव भी तो आवश्यक है। वह न हुआ तो युवक के भटकाव की पूरी-पूरी गुंजाइश रहेगी।
विद्ववता की तो हर कहीं प्रशंसा एवं पूजा होती है पर चरित्र की नहीं। होना यह चाहिए कि विद्वता वह अभिनन्दित हो जो नीतिमत्ता की पक्षधर हो। विद्वानों एवं चरित्रवानों में से चयन की बात आए कि किसको सम्मान दिया जाए तो प्राथमिकता चरित्रवानों को मिलनी चाहिए।

24.शिक्षा पद्धति का स्वरुप(Form of education)-

(1.)आज हमारे शिक्षा संस्थानों का सारा प्रयास अपने विद्यार्थियों को ज्ञान के सीमित स्वरुप से परिचित कर देना ही है और व्यक्ति को कार्यकुशल और सहजीवी बनाने का नहीं है। अतः मैं समझता हूँ कि अन्य सुधारों के साथ-साथ हमारी शिक्षा व्यवस्था में उसके उद्देश्यों में सन्तुलन स्थापित करने की आवश्यकता है।
(2.)हमारी शिक्षा-संस्थानों में कार्यकुशलता पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए और उसमें व्यावसायिक शिक्षा प्रदान करने का प्रबन्ध हो।
(3.)परीक्षा प्रणाली में बदलाव किया जाए। देखभाल और पूछताछ काम की, योग्यता की, प्रतिभा की होगी और यह सब मौखिक होगा।

25.शिक्षा की कमजोरी दूर हो(Overcome the weakness of education)-

ऊपर बताएं गई बातों का पालन करने पर भी एक आवश्यकता बनी रहती है कि पढ़ाई के विषयों के अतिरिक्त, जो जानने समझने को शेष रह गया है, उसे निजी प्रयत्न से उपलब्ध करते रहा जाए। जिस क्षेत्र में प्रवीणता बढ़ानी है, उसके लिए अध्ययनशील बनकर रहा जाए। स्वाध्याय जीवन का एक अंग बनकर रहना चाहिए ताकि आयु के साथ-साथ ज्ञान-सम्पदा भी बढ़ती रहे।

26. व्यावहारिक शिक्षा की आवश्यकता(Practical education required)-

(1.)पहले तो यह सूझता था कि काॅलेज की डिग्री इस हाथ और अफसरों की नियुक्ति दूसरे हाथ। पर ऊँट को जब टेडे बबूल के नीचे होकर निकलना पड़ता है तब पता चलता है कि जो सोचा गया था, उसमें शेखचिल्ली जैसी उड़ानों की भरमार थी।
(2.)हमें अपने बच्चों को पढ़ाते समय आकाश में नहीं उड़ना चाहिए वरन् जमीन पर चलना चाहिए जो सर्वसाधारण के लिए सम्भव है।
(3.)शिक्षा के लिए कोई निन्दा नहीं करेगा पर उसके लिए आँख मूँदकर भेड़चाल नहीं चलनी चाहिए।

27. अनौपचारिक शिक्षा की आवश्यकता(Need for informal education)-

(1.)स्कूली शिक्षा के अतिरिक्त अनौपचारिक शिक्षा भी अनिवार्य है। भाषण कला, अन्त्याक्षरी, नाटक, हँसी-मजाक आदि के कार्यक्रम भी स्काउटिंग आदि के साथ सम्मिलित रखे जा सकते हैं। फर्स्टएड, स्काउटिंग आदि के निर्धारित पाठ्यक्रम भी हैं। उनकी परीक्षाएं भी होती है। इस मनोरंजक, ज्ञानवर्धक पाठ्यक्रम में धार्मिक शिक्षा, नैतिक शिक्षा, शिष्टाचार आदि बदल-बदल कर सिखाए जाएं। खेल-कूद होते रहे तो भिन्नताएं बनी रहने के कारण मनोरंजन भी होता रहेगा।
(2.)हर क्षेत्र में ऐसे उद्योग विद्यालय होने चाहिए जिनमें सैद्धान्तिक सीमित और व्यावहारिक ज्ञान अधिक दिया जाए। शिक्षार्थी सीखने के साथ-साथ श्रम भी करे और उत्पादन भी।
(3.)सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सरकार का आश्रय लेना अथवा ताकना गलत है। वह जो कर रही है, इसके लिए बजट कम पड़ता है फिर यदि वह और अधिक व्यय करे तो कर्मचारियों, अफसरों का व्यय ओर बढ़ेगा जो जनता को नए टैक्सों के रूप में चुकाना पड़ेगा।
(4.)व्यवसाय के उतार-चढ़ावों को आरम्भ से ही सीखते रहने पर उसकी चतुरता हस्तगत हो जाती है कि तात्कालिक सफलता आरम्भ से ही मिलने लगे। काम आरम्भ करने के साधन भी घर में ही मिल जाते हैं। नए सिरे से काम शुरू करने वालों की तरह ओर कुछ नया जुटाना नहीं पड़ता है। इसीलिए अच्छा हो कि पैतृक व्यवसाय को बढ़ाकर भाई-भाईयों को साथ नहीं तो समीप रहने और सुख-दुःख में सहभागी बनने का अवसर तो मिलता ही रहे।
(5.)अनौपचारिक शिक्षा से लोगों को जगाना सम्भव है। शिक्षा को जीवन से सीधे जुड़ी हुई होना चाहिए। जीवन समुद्र की तरह है। उसकी सतह छोटी है। खाना, कमाना, हँसना, रोना जैसे क्रियाकलापों की हलचल मात्र जीवन नहीं है। शरीर और परिवार मात्र तक ही सीमित नहीं है। जीवन की तह में अनेक प्रकार के सुख, दुख, आनन्द, चिन्तन, आकर्षण, विग्रह, उद्वेग, अवरोध, भ्रम, भय भरे पड़े हैं। उसमें परस्पर विरोधी धाराएँ बहती हैं जो एक दूसरे से टकराती भी हैं और एक दूसरे को उदरस्थ भी करती हैं। विस्फोट, कम्प और तूफान भी आते हैं और कई बार ऐसे अप्रत्याशित शक्ति चक्र उफन पड़ते हैं जिनसे सागर ही नहीं धरती भी प्रभावित होती है। इसकी तुच्छता इतनी नहीं है जितनी कि आमतौर से समझी जाती है। (6.)शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए - यथार्थता का ज्ञान। दुनिया वैसी नहीं है जैसी कि हमें दिखाई देती है या बताई जाती है। व्यक्ति और समाज की समस्याएं वही नहीं है जिनकी चर्चा की जाती रहती है। यथार्थता की तली तक पहुँचने के लिए किस प्रकार की गोताखोरी की जानी चाहिए, इसी कला को सिखाना शिक्षा का उद्देश्य है।
(7.)शिक्षा का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए विद्यार्थी में वह साहस विकसित करना पड़ेगा कि वह विवेक और तथ्य का सहारा लेकर यथार्थता की तह तक पहुँच सके। दादी क्या कहेगी? लोग क्या कहेंगे? पुस्तकों में क्या लिखा है? शिक्षकों ने क्या समझाया है? लोग क्या सोचते हैं और क्या करते हैं? इन सब जंजालों के आवरण चीरकर जो लोग सत्य को समझने ओर स्वीकार करने को तत्पर हो सकें, ऐसी ऋतम्भरा प्रज्ञा को सोने से जगाकर सक्रिय जागरण में लगाना ही शिक्षा का मूलभूत उद्देश्य है।

28.शिक्षा संस्कार तथा आत्मनिर्भरता से युक्त हो(Educated with education and self-reliance)-

(1.)इन दिनों स्कूलों में मात्र सामान्य ज्ञान की शिक्षा दी जाती है, जीवन दर्शन और व्यवहार को एक प्रकार से पृथक ही कर दिया गया है। इस अपूर्णता के कारण शिक्षण-पद्धति एकांगी रह गई है और विद्यार्थियों के लिए वह अनुदान दे नहीं पा रही है, जो उसे देना चाहिए था।
(2.)जब 80%आवश्यकताएं बिना सरकार पर आश्रित रहे हम स्वयं पूरी करते हैं तो शिक्षा क्षेत्र में पाइ जानेवाली दो कमियों को हम स्वयं ही अपने बलबूते पूरी क्यों न करें? दो खामियों में से एक है संस्कार दूसरी है आत्मनिर्भरता। ये दोनों ही ऐसे प्रसंग हैं जिनके अभाव में शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
(3.)आत्मनिर्भरता शिक्षा की अनिवार्य शर्त है
केवल मानसिक श्रम करने तथा सिनेमा और फैशन परस्ती के शिकार ये शिक्षित युवक शारीरिक श्रम करना पसंद नहीं करते और न समय बन्धन का मूल्य ही समझ पाते हैं ।
(4.)इन सब का एक ही कारण है कि शिक्षा के साथ-साथ आत्मनिर्भरता को जोड़ कर नहीं रखा गया है। यदि शिक्षा के साथ आत्म-निर्भरता जोड़कर रखा गया होता तो न तो शिक्षित युवक नौकरी के लिए मारा-मारा फिरता ,न उसके अभिभावक कुछ पाने की आशा करते,न सरकार का स्कूलों- कालेजों पर खर्च किया धन बेकारी बढ़ाने में लगता। शिक्षा पाकर के युवक निकलता और वह परिश्रमी तथा अनुभवी होता तो आज इतने बेकार न होते ।
(5.)सरकार से यह आशा करना कि वह शिक्षा के साथ आत्मनिर्भरता को जोड़ें ,रखी तो जा सकती है, पर राजनीति की शिकार शिक्षा ज्यों कि त्यों चल रही है।
(6.) आत्मनिर्भरता को मोटे अर्थों में कमाने में प्रयुक्त किया जाता है पर आत्मनिर्भरता केवल कमाने तक ही सीमित नहीं है। अपने उपार्जन और व्यय का समन्वय स्थापित करना। तो बालक सीधे-सादे कपड़े पहनेगा, सादा जीवन उच्च विचार रखेगा।घर के कामों व पिता के व्यवसाय में सहयोग देता हुआ शिक्षा पाएगा।वह प्रत्यक्ष में कोई रुपया पैसा कमाते हुए भी आत्मनिर्भरता को कुछ अर्थों में पूरा करता है। उसे धन की आवश्यकता के बारे में ज्ञान होता है।

29.संस्कार का शिक्षण भी अनिवार्य(Rite teaching is also mandatory)-

(1.) अपने देश की दान-पुण्य भावना भी विचित्र है। उसमें देवी-देवताओं को प्रसन्न करके,उनसे मनोकामना पूर्ण कराने की ललक जुड़ी रहने से धार्मिक कर्मकांड तो लोग कर लेते हैं ,यश लिप्सा के लिए मंदिर ,धर्मशाला आदि भी बना देते हैं पर जिन कार्यों में सस्ती वाहवाई लूटने का अंहकार पूरा न होता हो उन रचनात्मक कामों के लिए आर्थिक सहायता नियमित रूप से देते रहना किसी बिरले से ही संभव है।ऐसी स्थिति में दान पर निर्भर रहकर कार्य करने की अपेक्षा यही व्यावहारिक हैं कि अध्यापकों को विद्या ऋण चुकाने का कर्त्तव्य बोध कराया जाए। अध्यापक कोई भी शिक्षित व्यक्ति हो सकता है।
(2.)इस स्थिति से भी सभीअवगत हैं कि मात्र स्कूली पढ़ाई के बलबूते सरकारी परीक्षाओं में भी अच्छे नम्बरों से पास नहीं हुआ जा सकता। इसके लिए घर पर निजी पढ़ाई की व्यवस्था करना आवश्यक है। जो कमी स्कूलों में रह जाती है,उसकी पूर्ति के लिए घर पर कुछ व्यवस्था बनाईं जाना जरूरी है। सम्पन्न लोग तो महंगे ट्यूशन भी लगा सकते हैं।पर जिन्हें रोज कुआं खोदना और रोज पानी पीना पड़ता है ,उनके लिए अपने कई बच्चों के लिए ट्यूशन रखना एक प्रकार से असंभव ही है ।न कर पाने पर बच्चों का भविष्य अंधकार बनता है ।इस कमी की पूर्ति के लिए कोचिंग क्लासेज की आवश्यकता होती है ।
(3.)घर आने पर बच्चे खेलने-कूदने में, इधर-उधर के कामों में लग जाते हैं। पढ़ने में मन नहीं लगता। इसलिए होमवर्क वाली बात अधूरी ही रह जाती है ।यदि उन्हें निशुल्क इन पाठशालाओं में ट्यूशन जैसा कुछ पढ़ने को मिले तो बच्चे भी प्रसन्नता पूर्वक उनमें सम्मिलित होने का उत्साह व्यक्त करेंगे और अभिभावक भी उन पर दबाव देकर भेजेंगे। अध्यापकों का प्रबंध विद्या ऋण चुकाने का पुण्य मिलने के नाम पर ही अर्जित करना चाहिए ।यह कठिन लगता भर है वस्तुतः वह वैसा है नहीं‌। परमार्थ बुद्धि का सर्वथा लोप नहीं हुआ है ।वह गलत दिशा में भटक भर गई है। यदि प्रयत्न किया जाए तो उसे परमार्थ प्रयोजनों के लिए आसानी से मोड़ा जा सकता है और प्रौढ़ पाठशालाओं के समरूप बाल संस्कार शालाओं का दुहरा कार्यक्रम हर गांव में ,हर क्षेत्र में आसानी से चलाया जा सकता है।

30. शिक्षा पद्धति ही नहीं समग्र जीवन बदले(Change not only in education but overall life)-

(1.)महिला ने शिक्षकों को समझने का प्रयास किया कि बालक जोर जबरदस्ती की चीज नहीं। दबाव और अनुचित दण्ड उनके स्वाभाविक विकास को रोक देता है। शिक्षकों और माता-पिता की नासमझी के कारण बाल मन में अनेकों ग्रंथियां पड़ जाती है जो उसके भावी जीवन, स्वभाव, चरित्र, संकल्प शक्ति या कार्यपद्धति आदि तमाम बातों पर स्थाई प्रभाव डालती है ।इन सब को समझते हुए मनमानी पाबंदियों के गहरे में बांध देना अथवा उन पर अपनी शक्ति का परीक्षण करना किसी तरह ठीक नहीं ।इसे अनाधिकार चेष्टा ही कहा जाएगा। बच्चे का अपना निजी अस्तित्व और प्रथम व्यक्तित्व है। एक छोटी सी उसकी अलग दुनिया है जिसमें विचरण करना ,अपनी कल्पनाओं का विकास करना उसका अधिकार है ।इन सारी बातों को समझते हुए अच्छा यह है कि हम उनके साथ एक माली की तरह व्यवहार करें।
(2.) यह महिला थी मारिया मांटेसरी ।जीवन के बदलते क्षणों में जिनका संकल्प नहीं बदला ।अपने अडिग संकल्प के बल पर पश्चिमी जगत को बाल शिक्षा का महत्व सुझा सकी। यह समझा सकी की पढ़ाई लिखाई गौण है ।शिक्षा की बुनियाद संस्कार है ।इसे किसी दंड ,भय,लोभ से प्रेरित न होकर आत्म संतोष से प्रेरित होना चाहिए। शिक्षक की योग्यता है -धैर्य और कार्य है -बालक की गतिविधियों का सूक्ष्म अध्ययन कर उसके आंतरिक गुणों को उभारना। मांटेसरी नाम से प्रचलित यह पद्धति अपने आप में समूचा मार्गदर्शन है ।

31.समानांतर शिक्षा हम स्वयं खड़ी करें(Parallel education)-

बहीखाता, इनकम टैक्स ,सेल टैक्स ,रेलवे बुकिंग ,टिकट में उलट-पुलट, कानूनों की सामान्य जानकारी ,पुलिस से संबंधित जानकारियां ,बैंक परिचय, सहकारी समिति, उत्तराधिकार ,बंटवारा आदि अनेकों जानकारियां ऐसी है जो अपने पड़ोसियों के काम आती है इनका बौद्धिक ज्ञान कक्षा में सम्मिलित रखा जाए। सामाजिक कुरितियों की रोकथाम, समाज में उपयोगी प्रथाओं का प्रचलन, पंचायतें, चुनाव कानून , अदालतों के साथ आए दिन काम पड़ने वाली बातें आदि बहुत-सी ऐसी बातें हैं जो दैनिक जीवन में काम आती हैं। जिनकी जानकारी न होने के कारण लोगों को ढेरों परेशानियां भुगतनी पड़ती हैं।

32.शिक्षा सार्थक हो(Education be meaningful)-

(1.)संसार का ज्ञान पुस्तकों में भरा पड़ा है, उसमें से यत्किंचित तो पारस्परिक वार्तालाप तथा निजी अनुभव से भी प्राप्त हो जाता है, लेकिन शेष के लिए अध्ययन, अध्यापन पर निर्भर करता है।
(2.) मनुष्य की दैनिक आवश्यकताओं में शारीरिक मानसिक,पारिवारिक, सामाजिक ,आर्थिक ,धार्मिक समस्याएं आती है। आजीविका के लिए स्कूल छोड़ते ही उसे चिन्ता करनी पड़ती है ।पढ़ाते समय घरवाले भी यह सोचते हैं कि पढ़ाई पूरी करते ही बच्चा कुछ कमाने-धमाने लगेगा किन्तु उपर्युक्त शिक्षा की समस्याओं में से जब एक का भी जानकार नहीं होता तो सभी को निराशा होती हैं कि पढ़ने में जो इतना समय,श्रम एवं धन खर्च हुआ वह किस कामआया ?

33.शिक्षा सार्थक व समग्र कैसे बने?(Education be meaningful)

(1.)बड़े हो जाने पर आदत पड़ जाती हैं ,पूर्वाग्रह बढ़ जाते हैं ।इसलिए उस दिशा में उनका सुधार परिष्कार कठिन हो जाता है।
(2.)स्वास्थ्य संरक्षण, मानसिक संतुलन ,पारिवारिक तालमेल,आर्थिक व्यवस्था,सम्पर्क क्षेत्र का सोमनस्य, पारस्परिक व्यवहार,शिष्टाचार जैसे अनेक विषय ऐसे हैं जिनसे आए दिन निपटना पड़ता है ।यदि उनकी बारीकियों को समझा जा सकें और उतार-चढ़ावों से तालमेल बिठाया जा सके तो व्यक्ति प्रसन्न रह सकता है ,प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।
(3.) अपनी देश में स्थिति ऐसी नहीं है कि हर व्यक्ति अपनी आवश्यकता की सभी पुस्तकें खरीद सके और हर शिक्षित अपने घर में एक घरेलू पुस्तकालय बना सके।
(4.)इसके दो कारण हैं -एक तो अध्ययन में रुचि न होना, दूसरा अधिक महंगाई के कारण उपयोगी साहित्य की अनेकानेक पुस्तकें खरीद न पाना। इनमें भी अभिरुचि प्रधान कारण है।

34.महत्त्व समझा और समझाया जाए(Importance should be understood and explained.)-

(1.) कुछ करने के लिए कष्ट सहने और पुरुषार्थरत होने की प्रेरणा तभी मिलती है,जब उसे करने में लाभ दीख पड़े।
(2.)अबोधबालक सांप या आग को चमकदार खिलौना मानकर पकड़ने का प्रयत्न करते हैं ,पर बड़ों को क्या कहा जाए?जो मात्र वर्तमान के आकर्षण को ही देखते और उनकी भावी प्रतिक्रिया का अनुमान लगाने में अक्षम बने रहते हैं।
(3.)जिस युग में हमें रहना पड़ रहा है ,उसकी समस्याओं, आवश्यकताओं और समाधानों को समझने के लिए शिक्षा की एक प्रकार से अनिवार्य आवश्यकता हो गई है, इतनी अनिवार्य की उस से इनकार किया ही नहीं जा सकता।

35.संतान को क्यों पढ़ाएं?क्या पढ़ाएं?(Why teach children? What to teach?)-

आत्मरक्षा की आवश्यकता शांति और प्रगति से भी पहले बन गई है ।शांति से रहने वालों को जीवित रहने नहीं दिया जाता। ऐसे विलक्षण युग में शिक्षा का कवच पहनकर ही निर्वाह हो सकता है।

36.बच्चों शिक्षा ही नहीं सुसंस्कार भी दें(Children should not only be educated but also give good news)-

(1.)बच्चों को उनका स्वाभिमान जगाने के लिए नाम के साथ जी लगाने की परंपरा डालनी चाहिए ।रसिक जी, ललित जी आदि कहकर ही उन्हें संबोधित करना चाहिए।
(2.) पुस्तके पढ़ाने के समय उन्हें प्रश्न पूछने और उत्तर देने का अवसर देना चाहिए ताकि वे बाहरी ज्ञान भी प्राप्त करते रहें और सामान्य ज्ञान की जानकारी मिलने से बुद्धि का विकास भी हो और मनोरंजन भी। सफाई के साथ शिष्टाचार का और पढ़ाई के साथ अनेक विषयों के साथ सामान्य ज्ञान का अभ्यास कराया जाना चाहिए ।
(3.)जो अभिभावक अपने बच्चों को बहुत होशियार बनाना चाहते हैं -जल्दी ऊंची तैयारी करना चाहते हैं- स्कूल ट्यूशन, स्वयं पढ़ाना इस प्रकार तीन गुना दबाव डालते हैं ,उसका प्रतिफल यह होता है कि बच्चों का व्यक्तित्व और मस्तिष्क दबने-भिंचने लगता है और जो स्वाभाविक ,मानसिक विकास होना चाहिए ,उसमें बाधा पड़ती है।
(4.)धर्म का अर्थ सज्जनता ,समाजनिष्ठा एवं नीतिमत्ता ही है,पर आज तो वह भी सांप्रदायिक रीति-रिवाजों में सीमित होकर रह गया है।
(5.) गुरुजनों का कर्तव्य है कि इसआयु (किशोर )के बालकों के लिए एक आंख प्यार की और दूसरी सुधार की रखी जाए।प्यार की इसलिए कि उनके साथ आत्मीयता, घनिष्ठता बनी रहे।पराएपन जैसा विरोधाभास उत्पन्न न होने पाए और  टेढ़ी आंख इसलिए कि उनके दोष-दुर्गुणों पर नियन्त्रण स्थापित किया जा सके।
(6.) कोई ऐसा कड़ा दण्ड नहीं दिया जा सकता, जिससे उनका भविष्य बिगड़े और बदनामी हो। ऐसी दशा में अध्यापकों और अभिभावकों को मिल-जुलकर ही रास्ता निकालना चाहिए ।दोनों के बीच पारस्परिक परामर्श होता रहे और ऐसा रास्ता निकलता रहे कि लड़के बागी न होने पाए।
(7.) शिष्टाचार में कुछ बातें विशेष रूप से ध्यान रखने की है कि बड़े अपनों से छोटों का नाम लेते समय नाम के साथ जी'लगावें किन्तु छोटे बड़ों के नाम न लेकर रिश्ते के साथ सम्बोधन करें
(8.) बड़े, छोटों को तुम कह सकते हैं किंतु छोटे बड़ों के नाम न लेकर रिश्ते के साथ सम्बोधन करें।
(9.)बड़े छोटों से तुम कह सकते हैं किंतु छोटों को बड़े के लिए 'आप' का प्रयोग करते हुए वार्तालाप करना चाहिए।
(10.) हाई स्कूल, कॉलेज आदि में अलग-अलग शिक्षण रहे तो ठीक है क्योंकि तब तक के किशोर आयु के हो चुके होते हैं।
(11.)यदि कुछ हारी बीमारी जैसी बात हो तो कक्षा समाप्त होने के उपरान्त उसके घर सहानुभूति प्रकट करने , हिम्मत बंधाने और कुछ काम अपने योग्य हो तो उसकी बात पूछने के लिए उसके घर जाना चाहिए ।इससे आत्मीयता एवं घनिष्ठता बढ़ती है।

37.शिक्षा का अभियान चलाएं(Run an education campaign)-

(1.)शिक्षा की कमी यदि नौकरी में तरक्की नहीं हो सकती तो खेती के कार्यों में भी अच्छी तरक्की नहीं हो सकती तो खेती के कार्यों में भी अशिक्षितों का विकास नहीं हो सकता। इसलिए प्रत्येक अभिभावक को नौकरी वाला भ्रम निकालकर बच्चों को उदारतापूर्वक कष्ट सहकर भी पढ़ाना चाहिए ।बच्चों को एक बार खेलकूद के साधनों से वंचित रखा जा सकता है,पर उन्हें शिक्षा से वंचित रखना एक तरह से उनके साथ अन्याय करना ही है ।
(2.)कभी-कभी पति के न रहने पर बच्चे उच्छृंखल या कुमार्गगामी हों जाते हैं और वे अपनी माता को छोड़ देते हैं ऐसी अवस्था में उनका विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है।

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What is Demerit and solution of Current Indian Education System

1.वर्तमान शिक्षा प्रणाली के दोष एवं समाधान((What is Demerit and solution of Current Indian Education System?)-

What is Demerit and solution of Current Indian Education System
What is Demerit and solution of Current Indian Education System
भारत के स्वतंत्रता प्राप्ति को लगभग 70 वर्ष हो चुके हैं परन्तु शिक्षा प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता थी परन्तु भारत की सरकारों तथा शिक्षाविदों द्वारा इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया गया है. आज के लोकतांत्रिक भारत देश में लोकप्रिय होना तथा वोट प्राप्त करके सत्ता में बने रहना मुख्य उद्देश्य रह गया है जबकि शिक्षा व्यक्ति, समाज व देश की नींव है तथा नींव ही कमजोर होगी विद्यार्थियों तथा देश का भविष्य क्या होगा यह अनुमान लगाया जा सकता है. देश के राजनीतिज्ञों तथा शिक्षाविदों को इस शिक्षा पर ध्यान देने की आवश्यकता ही नहीं है. लोक लुभावन मुद्दों पर ध्यान देना एकमात्र मकसद रह गया है. हमारे नवयुवक विदेशों में शिक्षा प्राप्त करना गौरव समझते हैं. कोई समय था लोग विदेशों से भारत में शिक्षा प्राप्त करने के लिए नालन्दा, तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों में आते थे. इसी कारण भारत विश्वगुरु रहा है परन्तु आज की शिक्षा प्रणाली को देखकर ऐसा आभास ही नहीं होता है. आज भी शिक्षा के क्षेत्र में जो निर्णय लिये जाते हैं उनमें शिक्षाविदों का सुझाव, परामर्श पर निर्णय लिये जाते जो विदेशों में पढ़े लिखे हैं जिन्हें ठीक से भारतीय संस्कृति का ज्ञान भी नहीं है. विदेशी विद्वानों तथा विदेशों में पढ़े लिखे शिक्षाविदों को आमन्त्रित करना तथा परामर्श लेना, विश्वबन्धुत्व की भावना रखना तथा अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग लेना अच्छी बात है परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि हमारे देश की मिट्टी से जुड़े हुए जो शिक्षा शास्त्री है उनकी बुद्धि को गिरवी रख दिया जाये.
एक बात ओर आज व्यवसाय के रुप में शिक्षा क्षेत्र का चुनाव तब किया जाता है जबकि अन्य किसी क्षेत्र में जाने के रास्ते बंद हो गया हो.प्राथमिकता डाॅक्टर, इंजीनियर, बैंकों तथा सिविल सेवाओं I. A. S, RASजैसी सेवाओं को दिया जाता है. शिक्षक को समाज में सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता है बल्कि एक मुफ्तखोर की नजर से देखा जाता है. यह स्थिति हमने ही बनाई है वरना क्या कारण है कि शिक्षा के लिए अच्छी प्रतिभाओं का चयन करने के बावजूद सरकारी स्कूलों का परिणाम खराब रहता है. निजी स्कूलों का परीक्षा परिणाम तो अच्छा रहता ही है परन्तु निजी स्कूल से निकलने वाले बच्चे अनुशासित भी रहते हैं. 90%सरकारी स्कूलों की स्थिति बूचड़खानों जैसी हो गई. आखिर सोचनेवाली बात है कि एक गरीब से गरीब अभिभावक भी अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं हालांकि इसका तात्पर्य यह नहीं है कि निजी स्कूलों में बच्चों को नैतिक, आध्यात्मिक शिक्षा दी जाती है, इसमें जिम्मेदार हम सब ही एक अकेले स्कूल ही जिम्मेदार नहीं हैं. हमें यह स्थिति बदलनी होगी तथा समाज तथा देश को यह दिखाना होगा कि शिक्षक का बच्चों के भविष्य तथा एक अच्छा नागरिक बनाने में कितना योगदान होता है. ऐसा हम तभी कर शिक्षार्थीयों के प्रति समर्पित होकर, उनकी समस्याओं का समाधान करेगें. ऐसा केवल एक विषय का ज्ञाता बनने से काम चलने वाला नहीं है.अपने विषय के साथ अन्य विषयों का सामान्य ज्ञान तथा आध्यात्मिक ज्ञान में भी पारंगत होना होगा. उनका शारीरिक, मानसिक, चारित्रिक तथा आध्यात्मिक विकास की हमारी जिम्मेदारी है भले हमें सामाजिक संगठनों तथा सरकारों से सहायता मिले अथवा न मिले.

2.दोष(Demerit):-

(1.)वर्तमान शिक्षा प्रणाली में विद्यार्थियों के चिंतन, मनन, नैतिकता व चारित्रिक विकास पर ध्यान नहीं दिया जाता है.
समाधान :- वर्तमान शिक्षा प्रणाली में नैतिक तथा चारित्रिक विकास को पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया गया है. बालक के चिंतन, मनन का विकास तभी सम्भव है जब पाठ्यक्रम में आध्यात्मिक, नैतिक व चारित्रिक बातों को शामिल किया जाये तथा उनको आचरण में उतारने पर बल दिया जाये. माता-पिता तथा अध्यापकों को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है. यह तभी संभव है जब माता-पिता स्वयं भी इनको अपने जीवन में अपनाये, उनकी कथनी और करनी में कोई अन्तर न हो. बालक देखकर व अनुकरण से ज्यादा सीखता है. माता-पिता का यह दायित्व है कि वे अपने घर में इस तरह का वातावरण रखे जिससे बच्चों का नैतिक व चारित्रिक विकास हो, स्वयं दुर्व्यसनों से दूर रहे तथा अपना चरित्र शुद्ध व पवित्र रखें जिससे बच्चों पर दुष्प्रभाव न पड़े. अध्यापकों का विशेष उत्तरदायित्व है कि वे अपने आचरण को श्रेष्ठ, तप व समर्पण से युक्त रखे. वस्तुतः विद्यार्थी देखा-देखी ज्यादा सीखते हैं.
आजकल का वातावरण तथा संगति ऐसी हो गई है कि बच्चे आधुनिक सुख सुविधाओं में रहना चाहते हैं. भौतिकता तथा विज्ञान के नये नये आविष्कारों से आज युवा ही नहीं हर वर्ग चकाचौंध है क्या माता-पिता, क्या अध्यापक तथा क्या ही विद्यार्थी चारों ओर नैतिकता तथा चरित्र का पतन होता जा रहा है. आशा की किरण यही है कि उनमें कुछ शिक्षण संस्थान, ऋषि-मुनियों तथा साधु सन्तों द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों में बहुत पवित्र, भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत वातावरण उपलब्ध है तथा वे विद्यार्थियों में गुणात्मक परिवर्तन की नींव रख रहे हैं. परन्तु ऐसे विद्यार्थियों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है जो फिल्में, टी, वी, व सोशल मीडिया पर गन्दी, बेकार तथा बच्चों के कोमल दिमाग को पूर्व में परिपक्व करनेवाली अश्लील वीडियो को देखकर तथा उससे प्रेरित होकर रंगीन सपने देखते हैं. ऐसे युवा जब डिग्री लेकर वास्तविक जीवन में प्रवेश करते हैं तो जीवन की वास्तविक सच्चाइयों से सामना होने पर घबरा जाते हैं, उन्हें अपना जीवन अंधकारमय नजर आता है तथा वे अनैतिक रास्ता अपना लेते हैं. उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं देता है तथा न कुछ सोच पाते हैं कि वे क्या करे क्या न करें. ऐसी स्थिति में माता-पिता तथा अध्यापकों का दायित्व बढ़ जाता है तथा विद्यार्थियों को उनके मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है. परन्तु अभिभावक तथा अध्यापक उचित मार्गदर्शन तभी कर पायेंगे जब उनका आचरण पवित्र, शुद्ध होगा तथा सांसारिक समस्याओं का मुकाबला करने तथा उनका समाधान करने का उनको अनुभव होगा.
(2.)सुख-सुविधाएं, तकनीकी व वैज्ञानिक विकास के बावजूद तथा शिक्षण सुविधाएं कोचिंग की सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद विद्यार्थियों का उचित विकास क्यों नहीं हो रहा है?

3.समाधान (Solution):- 

वर्तमान शिक्षा प्रणाली परीक्षा केन्द्रित है जबकि प्राचीन शिक्षा प्रणाली ज्ञान केन्द्रित थी.सैद्धान्तिक तौर वर्तमान शिक्षा प्रणाली बाल केन्द्रित शिक्षा है परन्तु व्यावहारिक धरातल पर प्रत्येक बच्चे पर ध्यान नहीं दिया जाता है. इस प्रणाली में बच्चे की सोचने समझने की योग्यता का परीक्षण नहीं होता है. बच्चों के सामने नई नई समस्याएं आती हैं तो वे उसे सुलझा नहीं पाते हैं. बच्चों पर एक ही बात का दबाव रहता है कि उन्हें प्रथम तथा सबसे अव्वल आना है. अभिभावकों तथा अध्यापकों का एक ही लक्ष्य होता है कि परीक्षा परिणाम अच्छा कैसे रहे. अच्छे माता-पिता, अच्छे अध्यापक, अच्छे विद्यालय वे ही माने जाते हैं जिनके बच्चों को का परीक्षा परिणाम उत्तम रहता है. इस प्रतिस्पर्धा में बच्चों का शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक विकास गौण हो जाता है. परिणामस्वरूप विद्यार्थियों के मानसिक, चिन्तन का विकास करने बजाय रटने की प्रवृत्ति बढ़ती है. अतः पाठ्यक्रम, पुस्तकें, गाइडे सभी परीक्षा केन्द्रित हो गई है जिससे विद्यार्थियों के विकास बहुत घातक प्रभाव पड़ता है. ज्योंही परीक्षा निकट आती है विद्यार्थियों को रात-दिन पाठ्य पुस्तकें, नोट्स तथा गाइड़ो का पाठ करना, उनको रटना शुरु करा दिया जाता है. बच्चों के शारीरिक तथा मानसिक विकास नहीं हो पाता है. अतः बच्चे येन केन प्रकारेण अर्थात् नकल करके अनुचित साधनों का प्रयोग करके परीक्षा में सफल होने का प्रयास करते हैं. इस प्रकार विद्यार्थियों के मानसिक विकास का मापदंड परीक्षाफल हो गया है जिससे उनका शारीरिक, मानसिक, चारित्रिक विकास नहीं हो पाता है. ऐसी स्थिति में आध्यात्मिक विकास की बात तो सोची ही नहीं जा सकती है.

इस स्थिति को बदलना होगा बच्चों पर परीक्षा के नाम पर अनावश्यक दबाव न डालें. उनको किसी प्रकार की शारीरिक, मानसिक समस्या है तथा पढ़ाई सम्बन्धी कोई समस्या है तो उसको सुलझाने में मदद करे. परीक्षा के नाम पर अनावश्यक न तो स्वयं तथा न ही अध्यापकों पर अनावश्यक दबाव डाले. सोशल मीडिया तथा टी. वी वगैरह पर मन पर दुष्प्रभाव डालने सामग्री पर भी निगरानी रखे. उनके मित्रों का भी ध्यान रखें कोई बुरी संगति दिखाई दे प्रेम से उसे समझा दे तथा उनकी हानियों से अवगत कराये. तात्पर्य यह है कि उनके साथ मित्रवत व्यवहार करे. दिनचर्या व्यवस्थित करने में सहयोग करे. पाठ्यक्रम के अलावा भी व्यावहारिक बाते, नीति, सदाचार की बातें कहानियों के माध्यम से बताये. स्वयं भी उनके साथ बैठकर अध्ययन करने की प्रवृत्ति डाले.
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what is unemployment and solution in current education?

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वर्तमान शिक्षा प्रणाली में बेरोजगारी की समस्या एवं समाधान(.what is unemployment and solution in current education)-
.what is unemployment and solution in current education

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(1.)शिक्षा की जो व्यापक परिभाषा है उसके अनुसार तो शिक्षित व्यक्ति बेरोजगार हो ही नहीं सकता है. परन्तु वर्तमान में भारत में जो शिक्षा प्रणाली प्रचलित है उसके कारण बेरोजगारी की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है.ऐ

(2.)वर्तमान शिक्षा युवाओं को साक्षर करती है जिसमें युवाओं का सर्वांगीण विकास नहीं होता है. जब तक युवाओं को विवेकवान, योग्य तथा पात्र नहीं किया जायेगा यह समस्या दिनोंदिन बढ़ती जायेगी.

(3.)वर्तमान शिक्षा प्रणाली से विद्यार्थी को मात्र डिग्री मिलती है और डिग्री प्राप्त करके उसमें अहंकार उत्पन्न हो जाता है जिससे वह परिश्रम करने से जी चुराता है, कोई छोटा मोटा व्यवसाय करना नहीं चाहता है. डिग्री प्राप्त करके सरकारी नौकरी प्राप्त करना चाहता है क्योंकि सरकारी नौकरी प्राप्त करने के पीछे सेवा करने की भावना नहीं होती है बल्कि उसके पीछे भावना है कि कम से कम काम करो, मन करे तो काम करो अन्यथा मत करो अर्थात् जिम्मेदारी बिल्कुल नहीं कोई रोकनेवाला, टोकनेवाला नहीं, कोई निरीक्षण करने वाला नहीं. वेतनमान इतना कि आराम से जिन्दगी कट जाती है, इसके अतिरिक्त समय समय पर मँहगाई भत्ता, पेंशन, ग्रेच्युअटी की सुविधा,कई प्रकार के समय समय पर अवकाश लेने की सुविधा. ये सब चीजें युवाओं को आकर्षित करती है. भ्रष्टाचार के रूप में ऊपर इन्कम हो जाती है वो अलग यानी पाँचो ऊँगली घी में.

what is unemployment and solution in current education
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(4.)जब युवाओं का शिक्षा अर्जित करने के पीछे मकसद ही यही है कि पढ़ लिखने के बाद नौकरी प्राप्त करना. इसलिए डिग्री लेने के बाद जब नौकरी नहीं मिलती है तो युवाओं का सरकार से असंतोष ही इस बात को लेकर है कि उनके लिए सरकार नौकरी की व्यवस्था नहीं कर रही है. अब सरकार सभी युवाओं को नौकरी तो दे नहीं सकती है, मात्र 10-15%को ही नौकरी दे सकती है. तात्पर्य यही है कि युवा पढ़ लिखकर परिश्रम का कार्य नहीं करना चाहता है.
(5.)दूूसरा कारण है जनसंख्या का विस्फोट. भारत में जनसंख्या गुणोत्तर रुप से बढ़ती जा रही है.
(6.)तीसरा कारण है मशीनों के आविष्कार के कारण छोटे छोटे कुटीर उद्योग नष्ट होते जा रहे हैं.
(7.)चौथा कारण है कि कम्प्यूटर के कारण बीस-पचास व्यक्तियों का कार्य एक व्यक्ति ही कर सकता है.
समाधान :-(1.) मशीनों तथा कम्प्यूटरों का प्रयोग होने के बावजूद यदि युवावर्ग को सैद्धांतिक के साथ साथ व्यावहारिक शिक्षा भी दी जाये तो इसका समाधान हो सकता है. इसके लिए शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन करना होगा. आजादी मिलते ही शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन करना आसान था. अब 70वर्ष व्यतीत होने के पश्चात शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन करना आसान कार्य नहीं है परन्तु असम्भव भी नहीं है. यदि सरकार धीरे धीरे शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन करे तो दीर्घकाल में जाकर यह समस्या हल हो सकती है अन्यथा मौजूदा व्यवस्था से तो हालात ओर बिगड़ेंगे.
(2.)दूसरा समाधान यह है कि माता-पिता बचपन से ही अपने बच्चों को कोई भी हुनर सीखाना प्रारम्भ करे तो शिक्षा पूर्ण होते ही बेरोजगारी की समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा.
(3.)तीसरा समाधान यह है कि यदि युवावर्ग पुरुषार्थी हो, परिश्रमी हो तो अध्ययन के साथ साथ कोई भी छोटा मोटा कार्य जैसे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना, कोचिंग में पढ़ाने का कार्य, अखबार वितरण करना या अन्य कोई छोटा मोटा कार्य करना प्रारंभ करे. अर्थात् पार्टटाइम थोड़ी बहुत कला भी कला सीखनी चाहिए.


(4.)चौथा समाधान यह है कि युवावर्ग फैशनपरस्ती से दूर रहे, फिजूलखर्ची करने के बजाय बचपन से ही जो पाकेटमनी के रुपये मिले उनकी बचत करना प्रारंभ कर दे तो स्कूल, कालेज की शिक्षा समाप्त होते ही उस बचत की धनराशि से कोई भी छोटा मोटा कार्य करना प्रारंभ कर दे.
इस प्रकार युवावर्ग सरकारी नौकरी न मिलने की शिकायत छोड़कर अपना समय कठोर पुरुषार्थ, समझदारी व सुदृढ़ संकल्प को बढ़ाने के लिए करे तो बेरोजगारी की समस्या का सामना कर ही नहीं सकता है.

(5.)आजकल आनलाईन भी घर बैठे व्यवसाय कर सकता है कहीं बाहर जाने की जरूरत ही नहीं है परन्तु यह तभी संभव है जबकि आप सैद्धान्तिक शिक्षा के साथ-साथ व्यावहारिक शिक्षा भी अर्जित करते हैं और इसके लिए आपको खुद या माता-पिता को ही अध्ययन में पार्टटाइम के रूप कोई भी जाॅब अर्थात् हुनर सीखना होगा। आनलाईन में ब्लाॅग लेखन, यूट्यूब पर वीडियो अपलोड करना, आनलाईन मार्केटिंग करना। इस प्रकार ढेरों ऐसे आनलाईन के जाॅब जिनको विद्यार्थी काल से ही सीख सकते हैं। कोई भी कार्य छोटा कोई नहीं होता है, आपको अपनी रुचि और जिज्ञासा को पहचानकर तराशने की जरूरत है। आपमें रुचि, जिज्ञासा व कठोर परिश्रम करने का जुनून होना चाहिए। मार्केट का रोमर न देखकर यह देखना चाहिए कि आपको महारत किस कार्य में है क्योंकि पत्थर में भी पेड़ उग जाते हैं। 
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