google-site-verification=V6YanA96_ADZE68DvR41njjZ1M_MY-sMoo56G9Jd2Mk Satyam Education: How Do Teachers Currently Play Their Role

How Do Teachers Currently Play Their Role

How Do Teachers Currently Play Their Role

1. शिक्षकों का धर्मसंकट
(1.)प्राचीनकाल में गुरुकुल में जिस प्रकार की शिक्षा व्यवस्था थी तथा वर्तमान में जिस प्रकार की शिक्षा व्यवस्था है, इन दोनों व्यवस्थाओं में काफी लम्बा अन्तराल आ गया है. समयान्तराल के कारण शिक्षा का स्वरुप बिल्कुल बदल गया है. ऐसी स्थिति में प्राचीनकाल की व्यवस्था को ज्यों की त्यों लागू करना बहुत मुश्किल है. दूसरा प्राचीनकाल की परिस्थितियाँ तथा समस्याएं अलग प्रकार की थी. तीसरे प्राचीनकाल में शिक्षा पर शासन का नियंत्रण नहीं था. इस कारण प्राचीनकाल में शिक्षा पद्धति को लागू करने में इतनी कठिनाईयां व जटिलता नहीं थी परन्तु शिक्षा की विषयवस्तु अर्थात् पाठ्यक्रम बहुत कठिन था.कठोर तप व साधना के कारण वैसी शिक्षा अर्जित करना सम्भव था.
(2.)वर्तमान युग में शिक्षा पद्धति व पाठ्यक्रम को परिवर्तित करने में परिस्थितियां और कठिनाईयां बहुत अधिक है. परन्तु वर्तमान पाठ्यक्रम व शिक्षा पद्धति प्राचीन काल की तुलना में सरल है. विद्यार्थी गाइड, नोट्स को कुछ समय में रट कर आसानी से पास (pass) हो जाता है. जबकि प्राचीनकाल में सैद्धांतिक के बजाय व्यावहारिक पक्ष पर अधिक बल दिया जाता था, वर्तमान समय में केवल सैद्धांतिक पक्ष पर अधिक बल दिया जाता है.
(3.)अब शिक्षकों के सामने पहली समस्या तो यह है कि जिन चारित्रिक मूल्यों एवं संस्कारों का समावेश विद्यार्थियों में किया जाना है उसके लिए पाठ्यक्रम में कोई स्थान नहीं है ऐसी स्थिति में शासन की तरफ से उनको कोई स्वीकृति व सहयोग प्राप्त नहीं हो सकता है. दूसरी कठिनाई यह है कि विभिन्न बालकों का स्तर अलग-अलग प्रकार का होता है तथा उनमें अलग-अलग प्रकार के दुर्गुण तथा पूर्वाग्रह होते हैं जिनकों छोड़ने के लिए वे तैयार नहीं होते हैं और बलपूर्वक उनसे व्यवहार किया नहीं जा सकता है. तीसरी  समस्या यह है कि बहुत से शिक्षक स्वयं दुर्गुणों तथा पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं और वे अपनी स्थिति को सही मानते हैं. यदि कोई उन्हें समझाने तथा सुधार करने के लिए कहे भी तो उसे वे स्वीकार नहीं करते हैं.

How Do Teachers Currently Play Their Role

How Do Teachers Currently Play Their Role

(4.)उपर्युक्त समस्याओं का समाधान यह हो सकता है कि शिक्षकों को उनके प्रशिक्षण काल में सत्प्रवृतियों की सार्थकता शिक्षा शास्त्री बताएं एवं समझाएं. जिन शिक्षकों का चरित्र उज्ज्वल है यदि वे सद्गुणों की सार्थकता समझते हैं तो जितना उनसे बन पड़ता है उतना बालकों के साथ घनिष्ठता रखते हुए आत्मीयता के साथ उनको सदमार्ग पर लाने की कोशिश करें. दुसरा अभिभावकों को भी बालकों को सद्गुण संस्कारों का बीजारोपण करने के लिए प्रेरित करें. तीसरा समाज में या अन्य संगठनों के द्वारा शिक्षकों को आमन्त्रित किया जाने पर अपना दृष्टिकोण वहाँ भी रखें तथा उनको इसके लिए वातावरण बनाने हेतु तैयार करें. इस प्रकार शिक्षक तथा शिक्षा संस्थान सुसंस्कारों, सत्प्रवृतियों को किसी न किसी सीमा तक अमल करके सफल हो सकता है. इसके लिए विवेक, धैर्य की आवश्यकता होती है जो शिक्षक धैर्य नहीं रखेंगे वे सामने आनेवाली परेशानियों से छुटकारा पाने के लिए इस कार्य को बीच में ही छोड़ देंगे और यह कार्य प्रतीक पूजा बनकर रह जाएगा.
निष्कर्ष :- वर्तमान युग भौतिक तथा बुद्धिवाद का युग है ऐसे वातावरण में नई पीढ़ी में नई संस्कृति ने जड़े जमा ली है. आज के अनास्था, अनैतिकता वाले वातावरण में चरित्र, अनुशासन, विवेक, ईमान, कर्मठता को अपनाने में रुचि नहीं रह गई है. इसलिए व्यक्ति, परिवार, समाज व देश के सामने अनेक संकट व समस्याएं खड़ी हो गई है, इसका समाधान करने के लिए शिक्षक, शिक्षा संस्थानों, जनसाधारण को अपना दृष्टिकोण एवं क्रियाकलाप को बदलना ही होगा.

2.विद्यार्थियों की सफलता-असफलता में शिक्षकों की भूमिका(The role of teachers in the success and failure of students)-

(1.)कक्षा में सभी विद्यार्थियों को शिक्षक द्वारा समान पाठ्यक्रम समान रूप से पढ़ाया जाता है परन्तु कुछ विद्यार्थी मन लगाकर न पढ़ने के कारण असफल हो जाते हैं जबकि अन्य विद्यार्थी मन लगाकर पढ़ने के कारण अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होते हैं. परन्तु छोटों की गलतियां होने पर भी बड़ों को ही दोषी माना जाता है. जैसे एक छोटी गाड़ी व बड़ी गाड़ी टकरा जाती है तो दोष बड़ी गाड़ी का ही माना जाता है. उसी प्रकार शिक्षकों को इसलिए दोषी समझा जाता है कि विषय को रुचि पूर्वक नहीं पढ़ाया गया तथा विद्यार्थी में कहाँ कमी रह गई इसका पूर्वानुमान नहीं लगाकर, उस कमी को दूर नहीं किया गया. इस प्रकार विद्यार्थियों की सफलता असफलता में शिक्षकों को समान रूप से दोषी समझा जाता है.
(2.)शिक्षक और शिक्षार्थी के मध्य मधुर एवं आत्मीय सम्बन्ध हो तो परीक्षा तथा जीवन में सफलता मिलने पर यश तथा व असफलता मिलने पर अपयश उनको ही मिलेगा. शिक्षार्थी यदि उद्दंड होता है, लड़ाई झगड़ा करता है तो शिक्षकों को खरी खोटी सुननी पड़ती है. यदि शिक्षक सावधानी बरतें तो शिक्षार्थी में सुधार किया जा सकता है तथा उत्साहजनक सफलता सहज ही उपलब्ध हो सकती है. शिक्षक, शिक्षार्थी को अपने बालकों की तरह समझे, व्यवहार करे, हित-अहित का ध्यान रखें तो अपयश से बचा जा सकता है.
(3.)अभिभावक तो लाड़ प्यार तथा घर गृहस्थी व आर्थिक समस्याओं का समाधान करने में लगे रहते हैं इसलिए जितना अभिभावक करते हैं उतने से ही संतोष कर लेना चाहिए. बालकों के माता-पिता, अभिभावकों को समझाने पर भी वे बालकों पर ध्यान नहीं दे रहे हों तो यह समझकर अपना कर्तव्य पालन करना चाहिए जैसे किसी व्यक्ति का एक हाथ कट गया हो तो वह एक हाथ से ही काम चलाता है.
(4.)विद्यार्थियों को गलतियों पर डाँट -डपटकर, पिटाई करके, अपशब्द या गाली गलौज करके सुधारने से प्रतिरोध, विवाद होता है तथा स्थिति ओर बिगड़ती है व शिक्षकों को विद्रोह प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है. यह सब पुरातन काल में चलता था जब शिक्षार्थियों को ताड़ना देकर समझाया जाता था अब समय तथा परिस्थितियां बदल गई है इसलिए प्रेमपूर्वक ही समझाना चाहिए.
(5.)शिक्षार्थी को पाठ्यक्रम को पढ़ाने लिखाने में कमी भी रह गई हो बालक जानते समझते हैं वे कुँजियों, गाइड़ों की मदद से पास हो जाते हैं. यदि पास नहीं भी होते हैं तो इसमें इतनी हानि नहीं है पर यदि बालकों में सदाचार, लोक व्यवहार, सामाजिकता, सद्गुण, सहयोग जैसे गुणों की कमी रह जाती है तो वह जीवनभर अपने आसपास के लोगों को, मिलने जुलने वालों को सताता व उलझता रहता है. न वह स्वयं शान्तिपूर्ण तरीके रहता है और न दूसरों को शान्तिपूर्ण तरीके से रहने देता है. इसलिए शिक्षार्थियों के गुण, कर्म, स्वभाव को समझते हुए उपर्युक्त गुणों का समावेश कर देने पर परिवार, समाज व देश के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है. शिक्षार्थियों को सत्प्रवृतियों को अपनाने का लाभ और न अपनाने पर हानियां बतायी जाए जिससे उनका जीवन सुखद व शान्तिपूर्ण हो सके

0 Comments:

Please do not enter any spam link in the comment box.