google-site-verification=V6YanA96_ADZE68DvR41njjZ1M_MY-sMoo56G9Jd2Mk Satyam Education: How to Educate Women

How to Educate Women

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नारी शिक्षा(Women Education)-

(1.)माँ को बालक बालिका का प्रथम गुरु कहा जाता है यह ठीक भी है क्योंकि बालिका बालक के जन्म के बाद माँ ही पालन पोषण करती है. माता ही उसे बोलना, चलना तथा आचार-व्यवहार सीखाती है. भारतीय परिवारों में नारी ही घर गृहस्थी का कार्यभार सम्हालती है. अतः सुशिक्षित नारी की दशा में बालक बालिका का उचित विकास हो सकता है.
(2.)भारतीय संविधान में पुरुष और नारी को समान दर्जा दिया गया है. परन्तु व्यवहार में भारतीय समाज तथा परिवार पुरुष प्रधान है ऐसी स्थिति में नारी को बराबर का दर्जा अभी प्राप्त करना है.
(3.)गृहस्थी को सुचारु रूप से चलाने के लिए नारी का शिक्षित व सुसंस्कृत होना आवश्यक है. जो नारी निरक्षर रहेगी उसके द्वारा ज्ञान प्राप्त करना, पुस्तकें पढ़ना तो असम्भव है ही परन्तु गृहस्थी में उसके क्या क्या दायित्व है यह भी ठीक से नहीं समझ सकेगी. उन महिलाओं की बात अलग है जिनके परिवार में वातावरण, व्यवहार तथा संस्कार उपलब्ध है, उससे बहुत कुछ सीख लेती है।ऐसी नारियां अपने पूर्व जन्म के उत्तम संस्कार लेकर आती है जो साक्षर न होने के बावजूद उत्तम संस्कार रखती है, परन्तु ऐसी नारियां बहुत कम होती है.मनोविज्ञान के अनुसार व्यक्ति पर वंशानुगत तथा अर्जित दोनों प्रकार के संस्कारों का प्रभाव पड़ता है. सामान्यतः बहुत कम व्यक्तियों के उत्तम संस्कार होते हैं ऐसी स्थिति में व्यक्ति को संस्कार अर्जित करने होते हैं इसलिए शिक्षित होना आवश्यक है.
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(4.)जो नारियां शिक्षा ग्रहण करने में रूचि नहीं लेती है या जिनके अभिभावक लड़कियों की शिक्षा पर ध्यान नहीं देते हैं वे नारियां पिछड़ी हुई रह जाती है. इस प्रकार की लड़कियां जैसे तैसे अपने जीवन को बोझ की तरह ढोकर जैसे आयी थी वैसे ही मृत्यु के मुँह में चली जाती है.
(5.)नारी को शिक्षा का अवसर दिया जाये तो ज्ञान व बुद्धि में वह भी आगे बढ़ सकती है. वैदिक काल में स्त्रियों व पुरुषों में भेद नहीं किया जाता था. उस काल में गार्गी, मैत्रेयी, घोषा, लोपामुद्रा, विश्वारा, अपाला आदि विदुषी नारियों ने नारी जाति का गौरव बढ़ाया है. महाकवि कालिदास की पत्नी विद्योत्तमा विदुषी महिला थी उसने अनेक विद्वानों को शास्त्रार्थ में हराया था. शिवाजी, महाराणा प्रताप जैसे महापुरुषों को आगे बढ़ाने के पीछे नारी का ही योगदान था.



(6.)आधुनिक भारतीय संविधान में नारी को समानता का अधिकार देने तथा लोकतंत्र की जड़े मजबूत होने से नारी शिक्षा में काफी वृद्धि हुई है. परन्तु इसका एक काला पक्ष भी है शिक्षा को कई लड़कियां शादी का पासपोर्ट समझती है. जबकि शिक्षा शादी का पासपोर्ट नहीं बल्कि आत्मोन्नति, संस्कार, बुद्धि विकास, जीवन को उन्नत करने व समस्याओं का समाधान करने की कला सीखने का साधन है, इस प्रकार के वैचारिक दृष्टिकोण से ही उनके लिए शिक्षा लाभदायक होती है.
(7.)नारी शिक्षा शहरों में द्रुतगति से वृद्धि हुई है परन्तु गाँवों में आज भी लड़कियों के लिए पृथक विद्यालय, महाविद्यालयों की कमी है जिससे उन्हें सह शिक्षा का विकल्प चुनना पड़ता है. जहाँ लड़कियों के लिए विद्यालय, महाविद्यालय है वहां महिला अध्यापिकाओं, प्राध्यापिकाओं की कमी है. इसलिए भारतीय सामान्य जनता स्त्रियों की शिक्षा के लिए मुश्किल से ही सहमत होती है.
(7.)वस्तुतः लड़कियों को शिक्षा देने में सबसे बड़ी बाधा चरित्र को पवित्र बनाए रखने की है वर्तमान शिक्षा प्रणाली में चरित्र, नैतिकता, परोपकार, दया, त्याग और प्रेम जैसे सद्गुणों का विकास करने की शिक्षा नहीं दी जाती है, ऐसी स्थिति में लड़के एवं लड़कियां सह शिक्षा के कारण एक दूसरे के सम्पर्क में आते हैं. साथी छात्रों व छात्राओं में विचार एवं धारणाओं के आधार पर मित्रता हो जाती है और शारीरिक सम्बन्ध भी हो जाते हैं. यह आवश्यक नहीं कि जिससे मित्रता हो उससे शादी भी हो. दूसरी बात जो समय शिक्षा अर्जित करने का है उसमें उन्मुक्त यौन सम्बन्ध बनाना गलत है. तीसरा कारण यह है कि लड़के लड़कियों में पारिवारिक दायित्व निभाने की परिपक्वता नहीं होती है.
(8.)सहशिक्षा के सम्बन्ध के बारे में कुछ विचारकों का यह तर्क होता है कि "छात्र-छात्राओं को मिलने-जुलने, विचारों के आदान प्रदान से छात्राएं छात्रों को तथा छात्र छात्राओं को भलीभांति समझ सके और आगे के जीवन के लिए अपने आपसी व्यवहार की तैयारी कर सके जो अच्छा ही है" :ऊपरी तौर पर यह विचार सुलझा हुआ और संतोषप्रद लगता है परन्तु भिन्न लिंगीय सम्बन्ध शैक्षिक स्तर तक ही सीमित नहीं रहते हैं बल्कि उनका आगे भी विस्तार हो जाता है जिसका प्रभाव आचार व्यवहार एवं सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है. पाश्चात्य देशों में उन्मुक्त यौन सम्बन्धों को खुली छूट मिली हुई है जिससे उनका वैवाहिक जीवन सुखद नहीं होता है और वे कई बार शादी करते हैं जिससे बच्चों के जीवन पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता है.
(9.)वर्तमान शिक्षा प्राप्त करने के बाद लड़कियों को अध्यापक तथा अभिभावकों का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं है.जीवन के सभी फैसले स्वयं लेने लगते हैं जबकि उनमें इतनी मानसिक परिपक्वता नहीं होती है. जीवन के सम्बन्धित फैसले में अध्यापक, अभिभावकों व छात्रों, छात्राओं के सामूहिक फैसले लेने के आधार पर लिये जाने चाहिए. यह इसलिए आवश्यक है कि पाठ्यक्रम में चारित्रिक, नैतिक सम्मिलित न होने के कारण उनमें मानसिक परिपक्वता नहीं आती है.
(10.)वर्तमान शिक्षा मात्र अर्थोपार्जन, जीविकोपार्जन को बढ़ावा देती है परन्तु यह शिक्षा अर्जित करके युवावर्ग नैतिक तथा आचार-व्यवहार के प्रति निष्ठावान नहीं है जिससे वर्तमान भारतीय छात्र छात्राएं अनुत्तरदायी, असंयमित तथा अनुशासनहीन होते जा रहे हैं. अतः लड़कियों को ऐसे वातावरण में सहशिक्षा देना नैतिक पतन को आमन्त्रित करना है.
अपनी बात :- अतः लड़कियों की शिक्षा के लिए पृथक् से विद्यालय तथा महाविद्यालय, कोचिंग संस्थान की व्यवस्था करने के लिए सरकार का मुह ताकने के बजाय जन सहयोग लेना चाहिए. ऐसे संस्थाओं में नैतिक व चारित्रिक शिक्षा का समावेश करना चाहिए तथा अभिभावकों को भी उत्तर दायित्व लेना चाहिए. उनको भी बच्चों को नैतिक मूल्यों का विकास करना चाहिए तभी सच्चे अर्थों में शिक्षा देना सार्थक होगा अन्यथा अहंकार को पोषित करने, व्यक्तिवाद व असंयमित जीवनशैली को बढ़ावा देने वाली शिक्षा देना नहीं बल्कि साक्षर करना ही है.

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