google-site-verification=V6YanA96_ADZE68DvR41njjZ1M_MY-sMoo56G9Jd2Mk Satyam Education: How To Respect Our Parents And Elders

How To Respect Our Parents And Elders

 कैसे हमारे माता पिता और बड़ों का सम्मान करें(How To Respect Our Parents And Elders )- 

(1.)बड़ो को नित्य प्रणाम करना एक ऐसी अच्छी आदत है जिसका प्रभाव उसी प्रकार होता है जिस प्रकार पूर्णिमा का चन्द्रमा अँधेरी रात में शोभायमान होता है. अभिवादन करने से बालकों का व्यवहार नम्रता और शील युक्त होता जाता है. क्योंकि झुकने से व्यक्ति के अन्दर का अहंकार मिटता जाता है.
(2.)शास्त्रों में कहा गया है कि नित्य बड़ों को प्रणाम करने से, आज्ञा पालन करने से व्यक्ति की आयु, विद्या, यश और बल की वृद्धि होती है.इस उक्ति पर विचार करने पर यह बात थोड़ी अटपटी लगती है कि अभिवादन करने से आयु, विद्या, यश व बल किस प्रकार बढ़ते है? अपने से बड़ों को प्रणाम करने से व्यक्ति अपने चारों ओर एक ऐसे वातावरण का निर्माण कर लेता है जिसमें आलस्य, अविद्या और असंयम पनप नहीं सकते हैं. उसके चारों ओर सकारात्मक वातावरण का निर्माण हो जाता है. नकारात्मक वातावरण, बुरी आदतों से दूर हटता चला जाता है.
How To Respect Our Parents And Elders

How To Respect Our Parents And Elders 

(3.)आजकल शिक्षा या डिग्री हासिल करके सही मायने में शिक्षित नहीं होकर केवल साक्षर होता है. क्योंकि ज्यों-ज्यों उच्च कक्षाओं में बालक जाता है त्यों-त्यों उनमें से नम्रता तथा शील के स्थान पर उच्छृंखलता, बड़ों का अनादर करना व अहंकारी होता जाता है. अर्थात् ज्ञानार्जन करने के साथ ही उस ज्ञान का ऐसा नशा चढ़ता जाता है जैसे कोई व्यक्ति मादक पदार्थ का सेवन करता जाता है तो उसका नशा बढ़ता जाता है. ऐसी स्थिति सद्बुद्धि, नम्रता, सत्प्रवृतियां जो उसके अन्दर होती है वो भी बाहर निकल जाती है. इसी कारण परिवार में सुख-शान्ति के स्थान कलह, वैमनस्य, दुराग्रह, एक दूसरे को अपमानित करना, बड़ों को प्रणाम न करना जैसी प्रवृतियां पाई जाती है.
(4.)प्रणाम व अभिवादन करने, बड़ों का आदर करना प्रारंभ करने से यदि आपके प्रति उनकी भावनाएं अच्छी भी नहीं है तो यह प्रभाव पड़ेगा कि उनका आशीर्वाद लेने से आपके प्रति उनका धीरे-धीरे शुद्ध भाव होता जाएगा और फिर आपके प्रति जो शुभकामनाएं करेंगे, निष्फल नहीं होगी.

(5.) हमने बालकों में शुरू से अच्छे संस्कार डालना प्रारंभ नहीं किया और न हमारे में अच्छे संस्कार हो तो जब भी अच्छे संस्कारों का महत्व मालूम पड़ जाए तभी से हमें स्वयं का तथा बालकों के आचरण को सुधार करना प्रारंभ कर देना चाहिए. जब जागे तभी सवेरा के अनुसार अच्छे कार्य का प्रारंभ कर देना चाहिए.




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