google-site-verification=V6YanA96_ADZE68DvR41njjZ1M_MY-sMoo56G9Jd2Mk Satyam Education: Knowledge and Money both are Compulsory

Knowledge and Money both are Compulsory

Knowledge and Money both are Compulsory 

1.विद्या तथा धन(Knowledge and Money)-

प्राचीन समय में विद्या तथा धन का एक साथ रहना एक वाली स्थिति थी क्योंकि उस समय विद्वान् लोग निर्लोभी थे और त्याग, तपस्या में जीवन व्यतीत करते थे. परन्तु वर्तमान युग में विद्या तथा धन का साथ-साथ होना दुर्लभ नहीं है. अब कई धनी विद्वान् हैं तथा कई विद्वान धनी मिल जाते हैं जो छल-कपट अपनाकर नहीं बल्कि अपनी प्रतिभा के बल पर ऐसा करते हैं. दरअसल धन प्राप्त करने के लिए जो जोड़ तोड़ बिठाना पड़ता है यदि हम वैसा नहीं करते हैं तो धन प्राप्ति काफी मुश्किल है. निम्न सुभाषित पर गौर करें -
पर स्पर्धा विरोध्िन्योरेक संश्रय दुर्लभम्|
संगत श्री सरस्वत्योर्यूतये$तु सदा सतम्||.
परस्पर विरोध के कारण जिसका मिलकर रहना मुश्किल है, वे दोनों लक्ष्मी तथा सरस्वती मनुष्य के कल्याण के लिए साथ रहने लगी.
सुभाषित का तात्पर्य यह है कि प्रतिभा के बल पर विद्वान् भी धनी हो सकते हैं तथा धनी व्यक्ति भी विद्वान् हो सकते हैं.

 2.विद्या(Knowledge)-

(1.)विद्या माता की तरह रक्षा करती है, पिता की तरह हित के कामों में लगाती है, स्त्री की तरह खेद को दूर करके मनोरंजन करती है, धन को प्राप्त कराकर चारों ओर यश फैलाती है. विद्या कल्पलता के समान क्या क्या सिद्ध नहीं करती? अर्थात् सब कुछ करती है.
(2.)रूप और यौवन से सम्पन्न तथा ऊंचे कुल में उत्पन्न हुआ पुरुष भी बिना विद्या के निर्गन्ध पलास-पुष्प की भांति शोभा नहीं देता.
(3.)जो पढ़ता है, लिखता है, देखता है, पूछता है, पंडितों का साथ करता है, उसकी बुद्धि का इस प्रकार विकास होता है जैसे सूर्य की किरणों से कमल का. (4.)विद्या से मनुष्य में विनम्रता आती है, विनम्रता से व्यक्ति पात्रता प्राप्त करता है, पात्रता से धन प्राप्त होता है, धन से धर्म का पालन होता है और धर्म पालन से सुख प्राप्त होता है.
(5.)इस संसार में विद्वान् ही सुशोभित होता है, विद्वान् ही सर्वत्र आदर पाता है. विद्या से ही धन्य-धान्य मान प्रतिष्ठा आदि सब कुछ प्राप्त कर लेता है. विद्या से हर जगह सम्मान प्राप्त होता है.
(6.)विद्या मनुष्य का वास्तविक रूप और छिपा हुआ धन है. विद्या मनुष्य को भोग, सुख और सुयश देनेवाली है, विद्या गुरुओं की भी गुरु है, परदेश में विद्या ही बन्धु के समान काम आती है, विद्या ही परम देवता हैं, राज्य में विद्या का ही मान होता है, धन का नहीं. जिसमें विद्या नहीं वह मनुष्य पशु के समान है.
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(7.)दुर्जनों के हाथ में पड़कर अच्छी से अच्छी चीज भी बुरी बन जाती है. अतः विद्या पाकर दुर्जन में अहंकार आ जाता है. जैसे रावण में विद्या से अहंकार आ गया तथा वह अपने तथा परिवार के सर्वनाश का कारण बना.
अतः असली विद्वान वही है जो विद्या के बल पर व्यर्थ के वाद विवाद में नहीं पड़ता तथा विद्या को अपने आचरण में उतारता है.
(8.)विद्याहीन बड़े कुल से मनुष्य को क्या लाभ है? नीच कुल में उत्पन्न होनेवाला भी देवों(विद्वानों) के द्वारा अत्यंत सम्मानित होता है.

3.विद्या तपपूर्ण जीवन(Lustful life)-

(1.)सुखार्थी चेत् त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी च त्येजत् सुखम् |
सुखार्थिन:कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिन:सुखम् ||(चाणक्य नीति)
अर्थात् जिसे सुख की इच्छा हो, उसे विद्या प्राप्ति की आशा छोड़ देनी चाहिए और जिसे विद्या-प्राप्ति की इच्छा हो तो उसे सुख को पाने की इच्छा छोड़ देनी चाहिए क्योंकि सुख चाहनेवाले को विद्या की प्राप्ति नहीं हो सकती है और विद्यार्थी को सुख नहीं मिल सकता है.
टिप्पणी :-विद्या प्राप्त करना साधना है, कठोर तपस्या है. जिस प्रकार सोने को तपाने पर उसकी अशुद्धि दूर हो जाती है, उसी प्रकार तप व साधना से व्यक्ति के विकार दूर हो जाते हैं तभी वास्तविक विद्या सुलभ होती है. विद्या में पारंगत होने पर तथा अनुभव के पश्चात ही सुख की प्राप्ति होती है. इसलिए विद्या प्राप्ति के लिए सुख की कामना छोड़ देनी चाहिए.
(2.)विद्यानाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्न गुप्तं धनं, विद्या भोगकरी यश:सुखकारी विद्यागुरूणां गुरू:|
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्यां परं दैवतं, विद्या राजसु पूज्यते नहि धनं विद्याविहिनं पशु:||
अर्थात् मनुष्य का वास्तविक रूप और गुप्त धन है. विद्या मनुष्य को भोग, सुख और सुयश देनेवाली है, विद्या गुरुओं की भी गुरु है, परदेश में विद्या ही बन्धु के समान काम आती है, विद्या ही परम देवता है, राज्य में विद्या का ही सम्मान होता है, धन का नहीं.
टिप्पणी :-विद्या तथा धन में अन्तर यह है कि विद्या खर्च करने से बढ़ती है तथा धन खर्च करने से बढ़ता है. धन का सदुपयोग विद्वान् ही कर सकता है मूर्ख व्यक्ति धन का दुरूपयोग ही करता है. विद्या से विद्या और धन दोनों की प्राप्ति हो सकती है जबकि धन से धन ही प्राप्त किया जा सकता है. इसलिए विद्या की महिमा अपार है.
(3.)विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् |
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं तत:सुखम् ||
अर्थात् विद्या से विनम्रता प्राप्त होती है, विनम्रता से योग्यता प्राप्त होती है, योग्यता से धन प्राप्त होता है, धन से धर्म (कर्त्तव्यों) का पालन होता है और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है.
टिप्पणी :-विद्या से विनम्रता प्राप्त होती है तो ही वह वास्तविक रूप से विद्या अन्यथा अहंकार युक्त विद्या नहीं, अविद्या होती है. विद्या प्राप्त होने पर उसके उपयोग से व्यक्ति में योग्यता प्राप्त होती है जिससे सांसारिक कार्यो को दक्षता पूर्वक कर सकता है जो व्यक्ति विद्या का सदुपयोग न करके दुरूपयोग करता है वह अहंकारी होता है, ऐसा व्यक्ति डिग्रीधारी होता है. मात्र डिग्री प्राप्त करने से योग्यता नहीं आती है जब तक कि उसका व्यावहारिक जीवन में उपयोग नहीं करता है. विद्या का उपयोग करने से धन प्राप्त होता है जिससे सांसारिक कर्त्तव्यों (धर्म) का पालन होता है और जीवन सुखी होता है.

4.धन(Money)-

(1.)इस विश्व में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं होती, जो धन के द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती है. अतएव बुद्धिमान् व्यक्ति को प्रयत्नपूर्वक धन का ही उपार्जन करना चाहिए. 
(2.)धनवान् व्यक्ति से सभी मित्रता करना चाहते है, धन के रहने पर बन्धु-बांधव भी आत्मीयता का व्यवहार करते है, धनवान् व्यक्ति की ही उत्तम पुरुषों में गणना होती है और वही विद्वान् भी माना जाता है. 
(3.)इस विश्व में, ऐसी कोई विद्या, ऐसा कोई दान, ऐसा कोई शिल्प, ऐसी कोई कला एवं ऐसी कोई दृढ़ता, शूरता या स्थिति नहीं है जिसका वर्णन याचकगण धनिको की प्रशंसा करते समय न करते हो. 
(4.)इस संसार में सम्पन्न व्यक्तियों के शत्रु भी उनके साथ सज्जनता का ही व्यवहार करते है और दरिद्र व्यक्तियों के आत्मजन भी उनके प्रति दुर्जनता का भी उनके प्रति दुर्जनता का ही व्यवहार करते हैं.. यह ठीक है कि धन सांसारिक कार्ये, अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करने के लिए आवश्यक है तथा इससे अपने अधिकांश कार्य सम्पन्न किये जाते हैं. धन से बहुत कुछ कार्य किए जाते है परन्तु सब कुछ रुपया ही है यह नहीं कहा जा सकता है. विद्या भी एक धन है. विद्या तथा धन में यह फर्क है कि विद्या खर्च करने से बढ़ती है तथा धन खर्च करने से घटता है. चार पुरुषार्थों(धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में भी धन का दूसरा स्थान है. अर्थात् धन कमाया जाये परन्तु धर्मपूर्वक अन्यथा अधर्मपूर्वक कमाया गया धन अन्ततः दु:ख, क्लेश, कठिनाइयों व समस्याओं का कारण होता है. अतः धन को कमाने व संचय करने के लिए पागलपन की हद तक नहीं जाना चाहिए. 
(5.)धन का ही यह प्रभाव है कि अपूज्य मनुष्य भी पूज्य, अगम्य स्थान भी गम्य और अवन्द्य व्यक्ति भी वन्द्य हो जाता है. 
भोजन से सशक्त इंत्रियाँ जिस (6.)प्रकार शरीर के सम्पूर्ण कार्यों को स्वत: करती रहती है, उसी प्रकार मनुष्य की समस्त आवश्यकतायें भी धन से स्वत: पूर्ण होती रहती है. अतएव धन को साधनों में प्रधान साधन कहा गया है. 
(7.)धन के प्रति आसक्त व्यक्ति श्मशान की भी उपासना करता है और निर्धन माता पिता को छोड़कर अन्यत्र चला जाता है. धनसम्पन्न व्यक्ति वृद्ध होने पर भी तरुण बना रहता है और तरुण व्यक्ति भी निर्धनता के कारण वृद्ध हो जाता है. दरिद्र व्यक्ति विभिन्न दुश्चिन्ताओं से आक्रान्त होकर जर्जर हो जाता है. 
(8.)जीवन में व्यक्ति धन को प्राप्त करने के लिए येन केन प्रकारेण कोई भी साधन अपनाने के लिए तैयार रहता है उसका कारण भी है कि व्यक्ति को धन के कारण हर कहीं प्रमुखता दी जाती है. (8.)धनार्जन के लिए नैतिक-अनैतिक सभी साधनों का प्रयोग करता है. जब अनैतिक साधनों के कमाये हुए धन का परिणाम सामने आता है अर्थात् कठिनाईयां, समस्याएँ सामने आती है तो जो लोग धन के कारण आपके साथ थे वो सब छोड़कर कर चले जाते हैं तब व्यक्ति को वास्तविकता का पता चलता है. धन सम्पत्ति के लिए जब व्यक्ति इस विचार को प्रमुखता देता है कि "बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपया" तो धनहीन होने पर सब साथ छोड़ देते हैं. अतः धन के लिए इतना दीवाना होने की आवश्यकता नहीं है. धर्मशास्त्रों तथा दर्शनशास्त्र में इसको माया कहा है. हालांकि माया के बिना व्यक्ति अपने धार्मिक कर्त्तव्यों व जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता है. 
(9.)धन पैरों की धूल के समान है, जवानी पहाड़ी नदी के वेग के समान शीघ्रगामी है, आयु जल के चंचल बिन्दु के समान अस्थिर है, जीवन पानी के फेन के समान क्षणभंगुर है. ऐसी दशा में जो स्थिर बुद्धि होकर दान नहीं करते हैं और न सुख ही भोगते हैं, वे बुढ़ापे में पछता कर शोक की आग में जलते हैं.


5.बोध कथा(माया) 

एक दिन धर्म धुरन्धर महाराज युधिष्ठिर राजसभा से निवृत्त होकर जब अन्त:पुर में गये तो वहां महारानी द्रौपदी को नहीं देखा. आज मेरे आने के समय द्रौपदी कहां गई. आज तक तो कभी ऐसा नहीं हुआ ऐसा विचार करते हुए वे पलंग पर बैठकर उसकी प्रतीक्षा करने लगे. थोड़ी ही देर में द्रौपदी आ पहुँची और सती-धर्मानुसार नित्य की भांति पतिदेव को नमन किये बिना ही उनकी आज्ञा की कोई अपेक्षा न कर पलंग पर बैठ गयी. धर्मराज (युधिष्ठिर) स्वयं तत्त्वज्ञ विद्वान् थे, वे द्रौपदी के प्रताप को जानते थे, इससे मन ही मन रहस्य को समझ कर पलंग से उठ खड़े हुए. तब महारानी द्रौपदी पलंग पर लेट गयी और तुरंत ही महाराज से अपने पांव दबाने के लिए कहा. बिना ही कुछ कहे सुने युधिष्ठिर चुपचाप द्रौपदी के चरण दबाने लगे. द्रौपदी ने कहा कि महल के सब दरवाजे और खिड़कियां खोल दो. तुरन्त ही ऐसा करके धर्मराज पुनः चरण दबाने बैठ गये. इतने में महाराज के छोटे भाई भीमसेन बाहर से आए और यहां का यह विपरीत ढंग देखकर चकित रह गए. 
भीमसेन अलग हटकर मन ही मन सोचने लगे आज यह क्या हो गया जो धर्मराज देवी द्रौपदी की पगचम्पी कर रहे हैं. क्या इन दोनों को बुद्धिभ्रम हो गया या ये पागल हो गये हैं? अथवा क्या आज इनमें अधर्म का प्रवेश हो गया है? यह तो बड़े दु:ख की बात है. द्रौपदी के साथ जब मेरे रहने की बारी आयेगी तब क्या मुझको भी ऐसा ही करना पड़ेगा? नहीं, नहीं, यह कार्य मुझसे कदापि न होगा. भीम के हाथ तो रण में शत्रुओं का मर्दन करने के लिए हैं, वे स्त्री की पदचम्पी कभी नहीं कर सकते. आश्चर्य है धर्म तत्त्वज्ञ होकर भी धर्मराज ने यह प्रथा क्यों चलाई, इसको में तोडूंगा भी कैसे? अब मुझे क्या करना चाहिए? इस बात का मर्म किससे कहना चाहिए? कुछ भी निश्चय न कर सकने के कारण विषादयुक्त भीमसेन ने श्रीकृष्ण के पास जाने का निश्चय किया. वे श्रीकृष्ण के भवन पर गये. श्रीकृष्ण जी नित्य-कृत्य से निपट कर सुन्दर आसन पर विराजमान थे. भीम ने उनसे मिलकर धर्मराज तथा द्रौपदी के सम्बन्ध का सारा वृतांत आदि से अन्त तक निवेदन किया तथा प्रार्थना करके कहा - भगवन्! आप कृपा करके महाराज तथा युधिष्ठिर को समझाइए कि जिससे अपनी मनोनीति छोड़ दें, धर्मराज केवल आपका ही कहना मानेंगे. 
श्रीकृष्ण भगवान् ने कहा - भाई भीमसेन! मैं इस बात के बीच में पड़कर धर्मराज को इस विषय में कुछ भी कहना नहीं चाहता, प्रेम ऐसा ही होता है. किसी समय तुमको भी ऐसा ही करना होगा. भीमसेन ने कहा - प्रभो! तो क्या पुरुष को स्त्री के वश में होकर उसकी सेवा करनी चाहिए? 
इस प्रकार भीमसेन ने बहुत कुछ कहा - सुना, परन्तु भगवान् ने तो केवल यही उत्तर दिया 'भीम! इस बात के छेड़ने में कोई सार नहीं, जैसा धर्मराज करें वैसा ही तुम भी करो. इस प्रत्युत्तर से भीमसेन का समाधान नहीं हुआ. वह पछताता हुआ वहां लौट आया. परन्तु जब जब उसको यह बात स्मरण आती, तभी वह उदास हो जाता. दिनों-दिन उसकी चिन्ता बढ़ने लगी, शरीर दुर्बल हो गया. एक दिन कुन्ती माता ने उससे पूछा - बेटा भीम! तेरे शरीर की क्या दशा होती जा रही है? क्या तेरे खाने पीने का प्रबन्ध ठीक नहीं है, क्या तुझको किसी से भय होने लगा है? भीमसेन ने कहा - माता! मुझको एक प्रकार की बीमारी हो गई है. इस रोग की औषधि श्रीकृष्ण के पास है, परन्तु वे मुझको देते ही नहीं, आप उनसे कह दें तो अच्छा हो. तुरन्त ही कुन्ती माता ने श्रीकृष्ण के पास जाकर भीम को दवा देने को कहा! भगवान् बोले, बुआजी इस छोटी सी बात के लिए आपने इतना कष्ट क्यों उठाया? ठीक है, आज ही अमावस और शनिवार है, मैं उसको औषधि दे दूंगा. भीमसेन से कह दीजिएगा, रात को मेरे पास आ जाय. 
माता के कहने से भीम श्रीकृष्ण के पास गया, भगवान् ने कहा 'भीमसेन'! जहाँ मैं कहूँ वहां तुम जाओगे? भीम ने कहा - आप जो आज्ञा करेंगे वही करने को दास तैयार है. श्रीकृष्ण ने कहा तो उत्तर दिशा को चले जाओ, नगर से बाहर कुछ दूर एक पीपल का वृक्ष दिखाई देगा. उस पर चढ़कर तुम छिपकर बैठ जाओ और वहां जो कुछ हो, छिपे देखते रहो. तत्काल भीम उस पीपल के पेड़ के पास पहुंच गया. वहां व्याघ्र, सिंह, भूत, पिशाच, बेताल इत्यादि नाना प्रकार के डरावने शब्द कर रहे थे, पर भीम को उनकी क्या परवा थी. वह झटपट चढ़कर पीपल पर बैठ गया. डेढ़ पहर रात बीत गई. अब भीमसेन को एक से एक बढ़कर चमत्कार दिखाई देने लगे. 
सबसे पहले एक जगमगाता हुआ दिव्यप्रकाश दिखाई दिया. थोड़ी देर में एक सपाट मैदान-सा हो गया. तदनन्तर दिव्य शिल्पी विश्वकर्मा ने आकर तुरन्त एक अति सुन्दर मणियों और रत्नों से जटित विशाल मण्डप रचा. उसके बीच में एक चमकता हुआ सुन्दर सिंहासन बिछाया गया उसके आसपास कई सुन्दर-सुन्दर आसन और बिछाये गये. इस प्रकार मण्डप के तैयार होने पर एकादशरुद्र, दसों दिक्पाल तथा इंद्रादि समस्त देवता वहाँ आ गये. नारद मुनि ने, जो पहले ही से आकर व्यवस्था का कार्य कर रहे थे, उनको यथायोग्य आसनों पर बैठाया. तब छप्पन कोटि यादवों को लेकर श्रीकृष्ण परमात्मा भी वहाँ पहुँचे. उनके साथ पाण्डव भी आये, उनमें अपने समान ही दूसरे भीम को देखकर, पीपल पर बैठे हुए भीमसेन को बड़ा आश्चर्य हुआ कि अरे यह पाण्डव कौन और वह कि मैं? दोनों में सच्चा कौन? इसी अवसर पर भगवान् शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी आ पहुँचे. इनको नारद ने उच्च सिंहासन के दोनों ओर बिठाया. इस प्रकार धीरे-धीरे सारा मण्डप त्रिलोकी के कार-बार करने वाले देवता और ऋषियों से खचाखच भर गया. परन्तु मुख्य सिंहासन तो अब तक रिक्त ही पड़ा था. यह देखकर भीमसेन ने मन में सोचा कि - इस सारी देवसभा का मुख्य अधिपति तो अभी तक आया ही नहीं, न जाने वह कौन होगा? ब्रह्मा, विष्णु और शंकर ये तीनों ईश्वर भी उस सिंहासन के नीचे ही बैठे हैं तो इनसे भी श्रेष्ठ और कोई है? भीम ऐसा विचार कर ही रहा था कि इतने में ही एक महान् तेजोमयी दिव्य देवी छमछम करती हुई दूर से आती दीख पड़ी. उसके अंगों की द्युति के सामने सभा मण्डप में स्थित समस्त देवगण छविहीन हो गये थे, उसके केश खुले हुए थे और ठेठ पाँव की एड़ी तक लटक रहे थे. वह ललाट में कुमकुम, हाथ में त्रिशूल तथा पाश धारण किये हुए थी. उसके मण्डप के द्वार के निकट आते ही सभा के सब देवगण एक ही साथ उठ खड़े हुए और महामाया आदिशक्ति की जय बोलने लगे. वह महादेवी उस मण्डप में जाकर उस परम दिव्य सिंहासन पर जा विराजमान हुई. अनन्तर उसकी आज्ञा से सब देवता गण बैठ गये. 
भीमसेन की दृष्टि उस महामाया के दिव्य तेज से चकाचौंध हो रही थी, परन्तु बड़ी देर तक दृष्टि जमा कर देखने से जान पड़ा कि - अरे! यह तो देवी द्रौपदी है. क्या इसका ऐसा प्रताप है कि इसको ब्रह्मा, विष्णु आदि नमन करते हैं? अहो! द्रौपदी तो साक्षात् आदि माया है. भला देखे तो आगे क्या होता है? पहले ब्रह्मदेव उठे और हाथ जोड़कर विनती करने लगे, तब महामाया ने पूछा - कमल भू ब्रह्मदेव! सृष्टि क्रम बराबर चला जाता है न? हां माता! आपकी आज्ञा के अनुसार दास निरन्तर बर्त रहा है, ऐसा कहकर आज्ञा होने से ब्रह्मदेव अपने स्थान पर बैठ गये, तब महादेवी ने विष्णु और शिव से पूछा - हे चक्रपाणि! अपने पद के अनुसार आप सृष्टि का यथार्थ पालन करते हैं? हे शूलपाणि(शंकर)! नियमपूर्वक सृष्टि के संहार कार्य को चलाये तो चलाये जाते हैं? दोनों ने नमनपूर्वक कहा 'आपकी आज्ञानुसार सब करते जाते हैं. तदनन्तर इंद्रादि देवों तथा दिकपालों से उनके नियमित कामों के लिए पूछताछ हुई. सबसे पीछे यमराज ने आकर नमस्कार किया और रुधिर से भरे हुए छ: घड़े और एक रीता घड़ा सामने रखकर कहा कि हे-जगदम्बिके! ये छ:घड़े सृष्टि के आरम्भ से लेकर, यह कल्प आरम्भ तब से अभी तक महिषासुरादि अनेक दैत्यों और योद्धाओं के रक्त से भरे हैं, परन्तु सातवां घड़ा रिक्त है. वह अब होने वाले कौरव-पाण्डवों के युद्ध में भरने वाला है? यह सुनकर देवी द्रौपदी ने पूछा - वह किसके रक्त से भरने वाला है? दोनों पक्ष के योद्धाओं में जिसके प्रतापी रक्त से यह घट परिपूर्ण हो, ऐसा वह योद्धा कौन है? यमराज ने कहा हे जननी! भीम योद्धा अपने बल का बड़ा अभिमान करता है, उसी के रक्त से यह घट भरा जायेगा और यदि वह यहां आ जाय तो अभी मैं उसके रुधिर से उस सातवें घड़े को भी भर दूं. इतने में नारदजी बोल उठे - अरे यमराज! वह भीम तो उस पीपल-वृक्ष पर छिपा बैठा है, अपने दूतों को भेजकर पकड़ मंगवा. 
भीमसेन जो यह सब लीला देख रहा था, अब थर-थर काँपने लगा ऐसी दशा हुई कि काटे तो खून न निकले. उसने जाना कि अब तो मृत्यु आ गई. पर क्या यमदूत मुझे लेने आवेगें? जब मुझको ऐसे ही मरना है और वैसे भी मरना है, तब फिर यमदूतों के हाथ पड़ने से तो यही अच्छा है कि मैं स्वयं ही जाकर देवी द्रौपदी के चरण स्पर्श क्यों न करुं? यह तो मेरी स्त्री नहीं, बल्कि साक्षात् आदि-माया है. इसकी पगचम्पी क्या, बल्कि जो यह कहे वही मैं करने को तैयार हूं. ऐसा दृढ़ निश्चय करके द्रौपदी को प्रणाम करने के लिए भीमसेन वृक्ष पर से धड़ाम से नीचे कूद पड़ा. कूदते ही देखता है कि सारी माया जहां की तहां अदृश्य हो गई. 
यह देख भीम को बड़ा भय हुआ, उसका शरीर थर-थर कांपने लगा, कलेजा धड़कने लगा. कुछ देर पश्चात सचेत हुआ तो सामने श्रीकृष्ण ने उसको धीरज देकर कहा - हे, वृकोदर! मैं परमात्मा इस जगत् में क्षर और अक्षर - इन दोनों पुरुषों से श्रेष्ठ पुरुषोत्तम हूँ और जिसको तूने देखा वह महाशक्ति मेरी माया है. वह मेरे अधीन है पर मैं किसी के अधीन नहीं हूँ. मेरी इस माया के पाश से सारा जगत् बंधा हुआ है और मेरी प्रेरित की हुई माया सब कुछ कर सकती है इसी कारण मेरी कृपा के बिना कोई इसे जीत नहीं सकता. वह कृष्णा (द्रौपदी का दूसरा नाम) है और मैं श्रीकृष्ण के नाम से जगत् में प्रकट हूँ. इसलिए जब जब द्रौपदी के शरीर में मेरी माया का आदेश हो तब-तब उसको तू अपनी स्त्री न मानकर उसकी सेवा करना परन्तु भीम ऐसा प्रतिदिन नहीं होता. यह तो मैंने अपनी माया की महिमा तुझको दिखलाई है. 
इस प्रकार श्रीकृष्ण ने भीम को आश्वासन दिया, भीमसेन के मन की शंका और अभिमान मिट गया और वह प्रेमपूर्वक भगवान् श्रीकृष्ण को बारम्बार नमस्कार कर अपने घर लौट आया. 
किस उपाय से माया की बाधा मिट सकती है? 
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया|
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्तिते||
- भगवद्गीता 
अर्थात् यह अलौकिक, अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी योग-माया बड़ी दुस्तर है, परन्तु जो पुरुष मेरे को निरन्तर भजते हैं, वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात् संसार से तर जाते हैं. 
इस के मायाजाल से बचना बड़ा मुश्किल है हम लोग इस मायाजाल में फँसे रहते हैं परन्तु ईश्वर भक्ति अर्थात् सेवा, परोपकार, कल्याणकारी, हितकारी आचरण रखते हुए कर्म करे तथा अन्तरात्मा में उस प्रभु का ध्यान करें तो इससे छुटकारा मिल सकता है.

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