google-site-verification=V6YanA96_ADZE68DvR41njjZ1M_MY-sMoo56G9Jd2Mk Satyam Education: Education and Coaching Centre

Education and Coaching Centre

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शिक्षा और कोचिंग सेंटर(Education and Coaching Centre)-

कोचिंग (Coaching) अंग्रेजी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है प्रशिक्षण, पढ़ाना, शिक्षा देना.
दूसरी ओर शिक्षा का अर्थ है सीखना, सीखाना.
(1.) इस प्रकार कोचिंग तथा शिक्षा दोनों समान अर्थ रखते हैं. व्यापक रूप में शिक्षा तथा कोचिंग का उद्देश्य है कि छात्रों का सर्वांगीण विकास (मानसिक, चारित्रिक, शारीरिक व आध्यात्मिक) अर्थात् शिक्षा छात्रों में जीवन के सुधार के लिए विवेक को जागृत करे जिससे छात्रों के चिन्तन, चरित्र तथा व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन हो. चिन्तन, चरित्र तथा व्यवहार में परिवर्तन से छात्र ओर अधिक प्रतिभाशाली, कर्त्तव्यनिष्ठ तथा व्यक्तित्व सम्पन्न हो.
(2.)संकुचित अर्थ है कि छात्रों तथा परीक्षार्थियों को नियंत्रित वातावरण में निश्चित ज्ञान को एक समय विशेष की अवधि में देने का प्रयास करना.
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(3.)शिक्षा के सम्बन्ध में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब विद्यालय शिक्षा के लिए उपयुक्त स्थान है तो फिर कोचिंग की क्या आवश्यकता है? विद्यालय में शिक्षा अर्जित करना समुचित और पर्याप्त नहीं है. उसमें जो कमी रह जाती है उसकी पूर्ति तथा ओर अच्छा करने के लिए कोचिंग की आवश्यकता है. दूसरा कारण यह है कि प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कराने के लिए भी कोचिंग की आवश्यकता होती है.
(4.)कोचिंग की दूसरी आवश्यकता इसलिए भी है कि घर पर अध्ययन का नियमित वातावरण नहीं है इसलिए बच्चों के अतिरिक्त समय का सदुपयोग नहीं हो पाता है.
(5.)तीसरा कारण है कि स्कूलों में पढ़ाई होती है, पढ़ाई के पश्चात अभ्यास करना भी आवश्यक होता है.
(6)परन्तु कोचिंग संस्थानों का केवल यह कर्त्तव्य ही नहीं है वरना विद्यालय तथा कोचिंग संस्थान में फर्क ही क्या रह जायेगा? आखिर सोचनेवाली बात यह है कि विद्यार्थी या परीक्षार्थी परीक्षा देने के बाद स्वाध्यायी क्यों नहीं होते हैं. इसका उत्तर यह है कि वर्तमान शिक्षा बोझिल है यानि यह शिक्षा छात्रों के व्यावहारिक जीवन में बहुत ही कम काम आती है जिससे छात्र येन केन प्रकारेण परीक्षा उत्तीर्ण करना ही अपना ध्येय हो समझता है.
(7..)कोचिंग संस्थानों को केवल परीक्षा केन्द्रित दृष्टिकोण ही न रखकर, उनकी स्वाध्याय में रूचि जाग्रत करने का प्रयास भी करना चाहिए. इसके लिए कोचिंग के साथ साथ पुस्तकालय व वाचनालय की व्यवस्था भी हो बहुत अच्छा होगा.
(8.)कोचिंग में ऐसे कर्मठ तथा समर्पण युक्त शिक्षक हो जो इस संसार रूपी कीचड़ में फँसे हुए को घसीटकर किनारे तक ला सके और ऐसा करना पुण्य कार्य ही है. शिक्षक को यह सोचकर कार्य करना चाहिए कि वे दूसरे के घर का नहीं बल्कि स्वयं के घर का कचरा ही साफ कर रहे हैं.
(9.)अभिभावक यह सोचते हैं कि जब विद्यालय की फीस चुकाने में मुश्किल होती है तो कोचिंग की फीस से भार दुगुना हो जाता है. ऐसी स्थिति में निर्धन छात्र किस प्रकार कोचिंग की फीस चुका सकते हैं. अव्वल तो जिन कोचिंग सेंटर का मात्र व्यावसायिक दृष्टिकोण है उनमें भेजना उचित नहीं है परन्तु कई कोचिंग सेंटर ऐसे भी है व्यावसायिक दृष्टिकोण के साथ परमार्थ का नजरिया भी रखते हैं तथा जिनकी फीस भी हम वहन कर सकते हैं.
(10.)कोचिंग की फीस को एक दूसरे नजरिए से देखे तो कई कार्य ऐसे हैं जो हम स्वेच्छापूर्वक करते हैं तथा उसमें धन भी खर्च करते हैं जैसे दान-पुण्य, तीर्थयात्रा, त्यौहार, बच्चों का पालन पोषण, सेवा सहायता, इनका तो न मालूम किस योनि में फल मिलेगा. परन्तु विद्या दान का तो मनुष्य योनि में ही फल मिलेगा, यह कम बात है क्या.
(11.)यदि किसी व्यक्ति के मस्तिष्क में यह प्रश्न उठता हो कि शिक्षा को इतना महत्त्व क्यों दिया जाये कि बच्चों को विद्यालय, कोचिंग सेंटर तथा पुस्तकालय में पढ़ने हेतु प्रेरित किया जाये. प्रत्येक माता पिता को अपने बच्चों नौकरी का सपना न रखकर तथा कष्ट सहनकर भी पढ़ाना चाहिए, बच्चों को एक बार खेलकूद से वंचित रखा जा सकता है परन्तु उन्हें शिक्षा न दिलाना उनके साथ अन्याय करना ही है.

 शिक्षा की आवश्यकता पर नीति में कहा है कि -
पठतो नास्ति मूर्खत्व जपतो नास्ति पातकम्|
जाग्रस्तु भयं नास्ति कलहो नास्ति मौनिन:||
अर्थात् जो निरंतर अध्ययनशील होता है उसमें मूर्खता नहीं रहती है. जो बराबर जप करता रहता है उसमें कोई पातक नहीं रह सकता. जो जागता रहता है उसे किसी का भी भय नहीं हो सकता. जो मौन धारण करने वाला होता है, उससे किसी का भी कलह नहीं होता है.
(12.)समाज में बिना पढ़े लिखे या कम पढ़े को कोई नहीं पूछता. हर कोई उसका तिरस्कार करते हैं. गँवार और मूर्ख समझकर उससे कोई बात नहीं करना चाहता. ऐसे व्यक्ति से कोई सलाह या सुझाव नहीं लेना चाहता है. सार्वजनिक संस्थाओं में अशिक्षित को कोई पद नहीं मिलता. समाज में आदर व सम्मान के पात्र वे ही व्यक्ति होते हैं जो सुशिक्षित और सुसंस्कृत है और जिन्हें देश-विदेश की गतिविधियों का ज्ञान है.
(13.)जो लोग शिक्षा का महत्त्व नहीं समझते हैं वे शिक्षा लाभदायक होते हुए भी अनदेखी करते हैं.शिक्षा का महत्त्व वे लोग नहीं समझ पाते हैं जो मनुष्य को मात्र शरीर समझते हैं तथा पेट भरने से संतुष्ट हो जाते हैं. यदि हम धन का महत्त्व समझते हैं क्योंकि धन से सुख-सुविधा के साधन खरीद सकते हैं इसलिए लोग धन कमाने के लिए कठिन परिश्रम करते हैं. कुछ लोग तो धन कमाने में नीति अनीति का भी विचार नहीं करते हैं. इसी शिक्षा का महत्त्व हम समझे तो शिक्षा तो मुक्तिदायिनी है.
(14.)हमें यह मनुष्य जीवन बड़ी मुश्किल से तथा परमात्मा की कृपा से मिला है. हमारा जीवन यापन समाज के सहयोग से होता है. परन्तु हमारे सौभाग्य का उदय तब होता है जब हम सार्थक विद्या अर्जित करते हैं तथा आत्मा पर से अज्ञान का पर्दा हट जाता है. लेकिन साक्षर होने से सार्थक विद्या अर्जित नहीं होती है.
(15.)धर्म, अध्यात्म, ज्ञान तथा शिक्षा अर्जित करने का अर्थ अगर यह मान लेते हैं कि पूजा-पाठ करना, स्वर्ग प्राप्ति, देवी-देवताओं से उचित-अनुचित मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है तो यही समझा जाना चाहिए कि धर्म, अध्यात्म इत्यादि को ठीक से समझा ही नहीं है.
(16.)साधु-वेश में कई व्यक्ति इस तरह घुस गये हैं जो मौज मस्ती का निर्वाह करना तथा बिना सेवा-साधनों के ही सम्मान पाते रहते हैं. सामान्य व्यक्ति इनकी पहचान नहीं कर पाता है. जब तक हमारा विवेक जाग्रत नहीं होता है, अज्ञान नहीं हटता है तो ऐसे लोगों के गिरफ्त में आ ही जायेंगे.
(17.)कोचिंग सेन्टरों की भी यही हालात है हर जगह कुकुरमुक्तों की तरह कोचिंग सेन्टरों की स्थापना की जा रही है, इनमें से अधिकांश सेन्टरों की यही हालत है कि उनका मात्र दृष्टिकोण व्यावसायिक होता है. जो छात्र छात्रा तथा अभिभावक इन सेंटरों का बाहरी आकर्षण, भौतिक सुख सुविधाओं तथा उनके आकर्षण को ही देखते हैं वे ठगे जाते हैं.
(18.)सामान्यजन में ऐसी दूरदर्शिता नहीं पाई जाती है कि अच्छे तथा परमार्थ की भावना रखने वाले कोचिंग सेंटर की पहचान कर सकें. वे तात्कालिक लाभ देखते हुए दूरगामी हानि उठाने को मजबूर हो जाते हैं. लुटेरों, चतुरों तथा अनाचारियों की पहचान करना है तो अपने आपको प्रज्ञावान, प्रतिभा सम्पन्न तथा विवेकवान बनाना होगा. वातावरण ऐसा ही है कि जब प्रबुद्ध व्यक्ति ही ठगे जाते हैं तो सामान्यजन कहां लगते हैं. अतः फूँक फूँक कदम रखने की आवश्यकता है. इस प्रकार कदम कदम शिक्षा की आवश्यकता है.
अपनी बात :-प्राचीन काल में गुरुकुल शिक्षा के केन्द्र थे जो नि:शुल्क शिक्षा प्रदान करते थे. वर्तमान काल में प्राचीन काल के बजाय हर बात में, हर क्षेत्र में बहुत परिवर्तन हो गया है. शिक्षा का व्यावसायिकरण हो गया है. वर्तमान में कोचिंग सेंटर तथा विद्यालय शिक्षा के केन्द्र हो गए हैं. व्यावसायिक दृष्टिकोण रखने में बुराई नहीं है परन्तु दूसरों को नुकसान पहुँचाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना गलत है. यदि परीक्षार्थियों का हित करके अपने जीविकोपार्जन हेतु व्यावसायिक दृष्टिकोण रखा जाये तो बुराई नहीं है. यह उनका कर्त्तव्य भी है. परीक्षार्थियों का हित करने मतलब है उनको जीवन की समस्याओं का समाधान करने वाली शिक्षा प्रदान करना. परन्तु शिक्षा भी पात्र व्यक्ति को ही दी जाती है वर्ना उनके जीवन में विवेक, विनय इत्यादि गुणों का समावेश नहीं हुआ तो ऐसा शिक्षित व्यक्ति अशिक्षित से ज्यादा स्वयं तथा दूसरों के लिए हानिकारक है.

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