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What is Demerit and solution of Current Indian Education System

1.वर्तमान शिक्षा प्रणाली के दोष एवं समाधान((What is Demerit and solution of Current Indian Education System?)-

What is Demerit and solution of Current Indian Education System
What is Demerit and solution of Current Indian Education System
भारत के स्वतंत्रता प्राप्ति को लगभग 70 वर्ष हो चुके हैं परन्तु शिक्षा प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता थी परन्तु भारत की सरकारों तथा शिक्षाविदों द्वारा इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया गया है. आज के लोकतांत्रिक भारत देश में लोकप्रिय होना तथा वोट प्राप्त करके सत्ता में बने रहना मुख्य उद्देश्य रह गया है जबकि शिक्षा व्यक्ति, समाज व देश की नींव है तथा नींव ही कमजोर होगी विद्यार्थियों तथा देश का भविष्य क्या होगा यह अनुमान लगाया जा सकता है. देश के राजनीतिज्ञों तथा शिक्षाविदों को इस शिक्षा पर ध्यान देने की आवश्यकता ही नहीं है. लोक लुभावन मुद्दों पर ध्यान देना एकमात्र मकसद रह गया है. हमारे नवयुवक विदेशों में शिक्षा प्राप्त करना गौरव समझते हैं. कोई समय था लोग विदेशों से भारत में शिक्षा प्राप्त करने के लिए नालन्दा, तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों में आते थे. इसी कारण भारत विश्वगुरु रहा है परन्तु आज की शिक्षा प्रणाली को देखकर ऐसा आभास ही नहीं होता है. आज भी शिक्षा के क्षेत्र में जो निर्णय लिये जाते हैं उनमें शिक्षाविदों का सुझाव, परामर्श पर निर्णय लिये जाते जो विदेशों में पढ़े लिखे हैं जिन्हें ठीक से भारतीय संस्कृति का ज्ञान भी नहीं है. विदेशी विद्वानों तथा विदेशों में पढ़े लिखे शिक्षाविदों को आमन्त्रित करना तथा परामर्श लेना, विश्वबन्धुत्व की भावना रखना तथा अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग लेना अच्छी बात है परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि हमारे देश की मिट्टी से जुड़े हुए जो शिक्षा शास्त्री है उनकी बुद्धि को गिरवी रख दिया जाये.
एक बात ओर आज व्यवसाय के रुप में शिक्षा क्षेत्र का चुनाव तब किया जाता है जबकि अन्य किसी क्षेत्र में जाने के रास्ते बंद हो गया हो.प्राथमिकता डाॅक्टर, इंजीनियर, बैंकों तथा सिविल सेवाओं I. A. S, RASजैसी सेवाओं को दिया जाता है. शिक्षक को समाज में सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता है बल्कि एक मुफ्तखोर की नजर से देखा जाता है. यह स्थिति हमने ही बनाई है वरना क्या कारण है कि शिक्षा के लिए अच्छी प्रतिभाओं का चयन करने के बावजूद सरकारी स्कूलों का परिणाम खराब रहता है. निजी स्कूलों का परीक्षा परिणाम तो अच्छा रहता ही है परन्तु निजी स्कूल से निकलने वाले बच्चे अनुशासित भी रहते हैं. 90%सरकारी स्कूलों की स्थिति बूचड़खानों जैसी हो गई. आखिर सोचनेवाली बात है कि एक गरीब से गरीब अभिभावक भी अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं हालांकि इसका तात्पर्य यह नहीं है कि निजी स्कूलों में बच्चों को नैतिक, आध्यात्मिक शिक्षा दी जाती है, इसमें जिम्मेदार हम सब ही एक अकेले स्कूल ही जिम्मेदार नहीं हैं. हमें यह स्थिति बदलनी होगी तथा समाज तथा देश को यह दिखाना होगा कि शिक्षक का बच्चों के भविष्य तथा एक अच्छा नागरिक बनाने में कितना योगदान होता है. ऐसा हम तभी कर शिक्षार्थीयों के प्रति समर्पित होकर, उनकी समस्याओं का समाधान करेगें. ऐसा केवल एक विषय का ज्ञाता बनने से काम चलने वाला नहीं है.अपने विषय के साथ अन्य विषयों का सामान्य ज्ञान तथा आध्यात्मिक ज्ञान में भी पारंगत होना होगा. उनका शारीरिक, मानसिक, चारित्रिक तथा आध्यात्मिक विकास की हमारी जिम्मेदारी है भले हमें सामाजिक संगठनों तथा सरकारों से सहायता मिले अथवा न मिले.

2.दोष(Demerit):-

(1.)वर्तमान शिक्षा प्रणाली में विद्यार्थियों के चिंतन, मनन, नैतिकता व चारित्रिक विकास पर ध्यान नहीं दिया जाता है.
समाधान :- वर्तमान शिक्षा प्रणाली में नैतिक तथा चारित्रिक विकास को पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया गया है. बालक के चिंतन, मनन का विकास तभी सम्भव है जब पाठ्यक्रम में आध्यात्मिक, नैतिक व चारित्रिक बातों को शामिल किया जाये तथा उनको आचरण में उतारने पर बल दिया जाये. माता-पिता तथा अध्यापकों को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है. यह तभी संभव है जब माता-पिता स्वयं भी इनको अपने जीवन में अपनाये, उनकी कथनी और करनी में कोई अन्तर न हो. बालक देखकर व अनुकरण से ज्यादा सीखता है. माता-पिता का यह दायित्व है कि वे अपने घर में इस तरह का वातावरण रखे जिससे बच्चों का नैतिक व चारित्रिक विकास हो, स्वयं दुर्व्यसनों से दूर रहे तथा अपना चरित्र शुद्ध व पवित्र रखें जिससे बच्चों पर दुष्प्रभाव न पड़े. अध्यापकों का विशेष उत्तरदायित्व है कि वे अपने आचरण को श्रेष्ठ, तप व समर्पण से युक्त रखे. वस्तुतः विद्यार्थी देखा-देखी ज्यादा सीखते हैं.
आजकल का वातावरण तथा संगति ऐसी हो गई है कि बच्चे आधुनिक सुख सुविधाओं में रहना चाहते हैं. भौतिकता तथा विज्ञान के नये नये आविष्कारों से आज युवा ही नहीं हर वर्ग चकाचौंध है क्या माता-पिता, क्या अध्यापक तथा क्या ही विद्यार्थी चारों ओर नैतिकता तथा चरित्र का पतन होता जा रहा है. आशा की किरण यही है कि उनमें कुछ शिक्षण संस्थान, ऋषि-मुनियों तथा साधु सन्तों द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों में बहुत पवित्र, भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत वातावरण उपलब्ध है तथा वे विद्यार्थियों में गुणात्मक परिवर्तन की नींव रख रहे हैं. परन्तु ऐसे विद्यार्थियों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है जो फिल्में, टी, वी, व सोशल मीडिया पर गन्दी, बेकार तथा बच्चों के कोमल दिमाग को पूर्व में परिपक्व करनेवाली अश्लील वीडियो को देखकर तथा उससे प्रेरित होकर रंगीन सपने देखते हैं. ऐसे युवा जब डिग्री लेकर वास्तविक जीवन में प्रवेश करते हैं तो जीवन की वास्तविक सच्चाइयों से सामना होने पर घबरा जाते हैं, उन्हें अपना जीवन अंधकारमय नजर आता है तथा वे अनैतिक रास्ता अपना लेते हैं. उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं देता है तथा न कुछ सोच पाते हैं कि वे क्या करे क्या न करें. ऐसी स्थिति में माता-पिता तथा अध्यापकों का दायित्व बढ़ जाता है तथा विद्यार्थियों को उनके मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है. परन्तु अभिभावक तथा अध्यापक उचित मार्गदर्शन तभी कर पायेंगे जब उनका आचरण पवित्र, शुद्ध होगा तथा सांसारिक समस्याओं का मुकाबला करने तथा उनका समाधान करने का उनको अनुभव होगा.
(2.)सुख-सुविधाएं, तकनीकी व वैज्ञानिक विकास के बावजूद तथा शिक्षण सुविधाएं कोचिंग की सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद विद्यार्थियों का उचित विकास क्यों नहीं हो रहा है?

3.समाधान (Solution):- 

वर्तमान शिक्षा प्रणाली परीक्षा केन्द्रित है जबकि प्राचीन शिक्षा प्रणाली ज्ञान केन्द्रित थी.सैद्धान्तिक तौर वर्तमान शिक्षा प्रणाली बाल केन्द्रित शिक्षा है परन्तु व्यावहारिक धरातल पर प्रत्येक बच्चे पर ध्यान नहीं दिया जाता है. इस प्रणाली में बच्चे की सोचने समझने की योग्यता का परीक्षण नहीं होता है. बच्चों के सामने नई नई समस्याएं आती हैं तो वे उसे सुलझा नहीं पाते हैं. बच्चों पर एक ही बात का दबाव रहता है कि उन्हें प्रथम तथा सबसे अव्वल आना है. अभिभावकों तथा अध्यापकों का एक ही लक्ष्य होता है कि परीक्षा परिणाम अच्छा कैसे रहे. अच्छे माता-पिता, अच्छे अध्यापक, अच्छे विद्यालय वे ही माने जाते हैं जिनके बच्चों को का परीक्षा परिणाम उत्तम रहता है. इस प्रतिस्पर्धा में बच्चों का शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक विकास गौण हो जाता है. परिणामस्वरूप विद्यार्थियों के मानसिक, चिन्तन का विकास करने बजाय रटने की प्रवृत्ति बढ़ती है. अतः पाठ्यक्रम, पुस्तकें, गाइडे सभी परीक्षा केन्द्रित हो गई है जिससे विद्यार्थियों के विकास बहुत घातक प्रभाव पड़ता है. ज्योंही परीक्षा निकट आती है विद्यार्थियों को रात-दिन पाठ्य पुस्तकें, नोट्स तथा गाइड़ो का पाठ करना, उनको रटना शुरु करा दिया जाता है. बच्चों के शारीरिक तथा मानसिक विकास नहीं हो पाता है. अतः बच्चे येन केन प्रकारेण अर्थात् नकल करके अनुचित साधनों का प्रयोग करके परीक्षा में सफल होने का प्रयास करते हैं. इस प्रकार विद्यार्थियों के मानसिक विकास का मापदंड परीक्षाफल हो गया है जिससे उनका शारीरिक, मानसिक, चारित्रिक विकास नहीं हो पाता है. ऐसी स्थिति में आध्यात्मिक विकास की बात तो सोची ही नहीं जा सकती है.

इस स्थिति को बदलना होगा बच्चों पर परीक्षा के नाम पर अनावश्यक दबाव न डालें. उनको किसी प्रकार की शारीरिक, मानसिक समस्या है तथा पढ़ाई सम्बन्धी कोई समस्या है तो उसको सुलझाने में मदद करे. परीक्षा के नाम पर अनावश्यक न तो स्वयं तथा न ही अध्यापकों पर अनावश्यक दबाव डाले. सोशल मीडिया तथा टी. वी वगैरह पर मन पर दुष्प्रभाव डालने सामग्री पर भी निगरानी रखे. उनके मित्रों का भी ध्यान रखें कोई बुरी संगति दिखाई दे प्रेम से उसे समझा दे तथा उनकी हानियों से अवगत कराये. तात्पर्य यह है कि उनके साथ मित्रवत व्यवहार करे. दिनचर्या व्यवस्थित करने में सहयोग करे. पाठ्यक्रम के अलावा भी व्यावहारिक बाते, नीति, सदाचार की बातें कहानियों के माध्यम से बताये. स्वयं भी उनके साथ बैठकर अध्ययन करने की प्रवृत्ति डाले.

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