google-site-verification=V6YanA96_ADZE68DvR41njjZ1M_MY-sMoo56G9Jd2Mk Satyam Education: What is Education and Theism

What is Education and Theism

What is Education and Theism
शिक्षा और आस्तिकता क्या है?(What is Education and Theism)-
(1.)परमात्मा तथा परमात्मा के विधि विधान को स्वीकारना आस्तिकता है. परमात्मा सत्प्रवृत्तियों का समूह अर्थात् कल्याणकारी, दयालु, न्यायकारी, चैतन्य, सर्वज्ञ इत्यादि शक्ति का समूह है. परमात्मा को सर्वव्यापी तथा उसके कर्मफल विधान पर विश्वास करना. उसे विश्व-व्यवस्था का अनिवार्य अंग मानते हुए अन्तरात्मा में अनुभूति करके उसका सानिध्य प्राप्त करना.
(2.)शिक्षा द्वारा बालकों को प्रारम्भ से ही परमात्मा के प्रति आस्थावान बनाने और अन्तर्बोध करने व कराने हेतु उन्हें प्रेरित करना और सहयोग करना.
(3.)आस्थावान बनने का हमारे आध्यात्मिक जगत् में तो लाभ है ही परन्तु सांसारिक जगत में भी उसका लाभ है. आस्थावान होने से हम अशुभ कार्य नहीं करते हैं तथा हमें आत्मिक संतोष प्राप्त होता है. शुभ कार्य करने हेतु हमारे आत्मिक बल में वृद्धि होती है.
(4.)अध्ययन करने में उच्चाटन नहीं होता है अर्थात् मन चलायमान नहीं होता है क्योंकि आस्तिकता का अर्थ ही यह है कि हम ध्यान तथा एकाग्रता के साथ उसकी उपासना करते हैं. ध्यान और एकाग्रता बालकों के अध्ययन में लाभदायक है.
(5.) ध्यान (Meditation)-

What is Education and Theism

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प्रतिदिन बालकों को ध्यान और एकाग्रता का अभ्यास कराने से एकाग्रता सधने लगती है. बालकों का अध्ययन करते समय मन चलायमान नहीं होता है जिससे पढ़ा हुआ ठीक से याद रहता है. ध्यान करने के लिए मन में अच्छे विचार करते रहना चाहिए. यदि अशुभ विचार आए तो उन्हें कम्पनी नहीं देनी चाहिए. रोज मन को आज्ञाचक्र (भ्रूमध्य) में एकाग्र करने का प्रयास करना चाहिए. वहाँ प्रकाशरूप ज्योति की कल्पना करनी चाहिए. प्रारम्भ में मन इधर उधर भटकता है परन्तु सतत अभ्यास और धैर्यपूर्वक करते रहने से एकाग्रता सधने लगती है.दूसरा तरीका यह है कि सुबह नित्य कर्मों से निवृत्त होकर मेट या चटाई पर सुखासन में बैठ जाएं।पश्चात आंखें बन्द करके दीपक की ज्योति का ध्यान करना चाहिए। निरन्तर सतत अभ्यास करने से एकाग्रता सधने लगती है। तीसरा तरीका तरीका यह है कि हमेशा अपने कार्य में व्यस्त रहने का अभ्यास करें, फालतू में अपने समय को नष्ट न करें क्योंकि ज्योही मन को स्वतन्त्र छोड़ते हैं त्योंही मन इधर-उधर भटकता है और हमारी एकाग्रता भंग हो जाती है।चौथा तरीक़ा है कि कुछ समय एकांत में रहने का अभ्यास करें, ध्यान रहें अकेलेपन और एकांत में अन्तर होता है। अकेलेपन का अर्थ है कि आपके पास कोई भी नहीं परन्तु आपका मन इधर-उधर भटकता रहता है और ऐसे अकेलेपन का कोई फायदा नहीं है। एकान्त का अर्थ है कि आप मन में कोई भी विचार नहीं आने देते हैं, विचारों का प्रवाह रुक जाता है। यदि एकाग्रता का अभ्यास करने पर भी मन इधर-उधर भटकता है तो धैर्य रखें, धीरे-धीरे सफलता मिलने लगती है। धैर्य नहीं होगा तो ध्यान टिक नहीं पाएगा। धैर्य न होने से हम काम अथवा ध्यान को बीच में छोड़ देंगे। ध्यान ही क्या संसार का कोई भी कार्य ध्यान के बिना पूरा नहीं होता है इसलिए ध्यान करने के लिए धैर्य धारण करना जरूरी है।
हमारा ध्यान भंग क्यों होता है,हमारा मन क्यों भटकता है।मन के भटकाने का कार्य करता है,हमारा अन्तर्मन। हमारे अन्तर्मन में संस्कार तथा किए गए कर्मों का अभ्यास अर्थात् आदतें संचित रहती है और उसी से मन निर्देशित होता है। इसलिए उन आदतों व संस्कारों को हटाकर नए एकाग्रता अर्थात् ध्यान रुपी संस्कारों का निर्माण करना होता है। पुराने संस्कार जो मन को भटकाने का काम करते हैं वे नए संस्कारों का विरोध करते हैं इसलिए तत्काल सफलता नहीं मिलती है।


(6.)शिक्षा तथा आवश्यकता का आपस में गहरा संबंध है ।सच्ची शिक्षा वही है जो मनुष्य को आस्तिक बनाती है। अपने कर्म करने में श्रद्धा उत्पन्न करती है ।बालक को शुरू से ही इस प्रकार की शिक्षा दी जानी चाहिए जिससे उसे धर्म, नैतिकता ,सदाचार इत्यादि गुणों को धारण करने की प्रेरणा मिले। 
(7.) आस्तिकता भी शिक्षा को प्रभावित करती हैं। आस्तिकता से बालकों का वैचारिक, बौद्धिक, मानसिक विकास होता है मानसिक विकास होता है तथा आचरण पवित्र बनता जाता है। शिक्षा के द्वारा भी बालकों का सर्वांगीण विकास होता है अर्थात शिक्षा का मूल उद्देश्य है बालकों का मानसिक, बौद्धिक, चारित्रिक व शारीरिक विकास करना। आस्तिकता से शिक्षा के इन उद्देश्यों की पूर्ति होती है‌।
(8.) शिक्षा व आस्तिकता का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है।इसका अर्थ यह नहीं है कि शिक्षा व आस्तिकता पर्यायवाची हैं। इनमें मूलभूत अन्तर होते हुए भी दोनों का उद्देश्य व्यापक रूप से समान है। शिक्षा के द्वारा जीवन में आस्तिकता आती है और वही सच्ची शिक्षा है।इसी प्रकार आस्तिकता से शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त किया जाता है।
(9.)सच्ची शिक्षा से नास्तिकता आ ही नहीं सकती है।सच्ची शिक्षा बालकों को जीवन में कर्म के प्रति आस्था उत्पन्न करती है‌। बालकों में शिक्षा के द्वारा आस्तिकता उत्पन्न करनी चाहिए जिससे जीवन और जगत के महत्वपूर्ण कार्यों को पूर्ण श्रद्धा व विश्वास के साथ कर सके। 
(10.)आज की शिक्षा प्रणाली में केवल भौतिक शिक्षा प्रदान करने को ही सच्ची शिक्षा मान लिया गया है जिससे आज का मानव अशांत, उच्छृंखल, बैचेन,उखड़ा-उखड़ा दिखाई देता है। भौतिक सुख समृद्धि होते हुए भी खुश व सुखी नहीं है क्योंकि उसे आस्तिकता की शिक्षा दी ही नहीं गई है या कह लीजिए दी ही नहीं जाती है।

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