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How to Develop Creativity

सृजनात्मकता का विकास (How to Develop Creativity)-

How to Develop Creativity
How to Develop Creativity

(1.)सृजन का अर्थ है रचना, निर्माण. जिन विद्यार्थियों में सृजनात्मक योग्यता होती है उनमें रचनात्मकता, सहनशीलता तथा शालीनता होती है.

(2.)सृजनात्मकता का अर्थ केवल किताबी ज्ञान प्राप्त करना नहीं होता है बल्कि उनमें रचनात्मकता, परिवर्तनशीलता, उपलब्धि शामिल है एवं किसी भी कार्य में महत्त्व प्राप्त करने के लिए कुशल होना है. तात्पर्य यह है कि सैद्धांतिक ज्ञान को व्यावहारिक जीवन में मूर्त रूप देना सृजनात्मकता है.
(3.)विद्यार्थी जीवन से यदि ही यदि बालकों में सृजनात्मक योग्यता का विकास किया जाए तथा बालकों की जिस क्षेत्र में रुचि व लगन हो उसे प्रोत्साहित किया जाए तो इससे उनमें निर्णय क्षमता का विकास होता है और वे अपनी समस्याओं, कमजोरियों, अज्ञानताओं का समाधान स्वयं कर लेते हैं.
(4.)प्रत्येक विद्यार्थी की रूचि, मनोवृत्ति, विचारधारा भिन्न भिन्न होती है. किसी विद्यार्थी की विज्ञान में, किसी की संगीत में, किसी की अध्यात्म में रूचि होती है और वे इन क्षेत्रों में कुछ नवीन व विशिष्ट खोज प्रस्तुत करते हैं, शिक्षकों के सम्मुख रखते हैं. उनकी इस प्रतिभा, योग्यता को पहचान कर उसका विकास करना सृजनात्मकता का विकास है.
(5.)जो बालक वस्तुओं की उपयोगिता, आर्थिक पहलू में रूचि प्रकट करते हैं ऐसे बालक भौतिक आवश्यकताओं पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं. ऐसे बालक व्यावहारिक शिक्षा को पसन्द करते हैं, उन्हें सैद्धांतिक और आदर्शवादी शिक्षा में रूचि नहीं होती है. परमात्मा में यदि उनकी आस्था भी होती है तो वे भौतिक सम्पत्ति, धन-सम्पत्ति को अर्जित करने की मंशा रखते हैं.

(6.)कुछ बालक आर्थिक क्षेत्र, व्यापार, विज्ञापन आदि को अपने सिद्धांतों के विपरीत मानते हैं उनकी रूचि सामाजिक क्षेत्र के रचनात्मक कार्यों में होती है.
(7.)कुछ विद्यार्थियों की रूचि धार्मिक व आध्यात्मिक क्षेत्र में होती है. वे शुरू से रहस्य मय, धार्मिक तत्वों को अपने जीवन में उतारने में रूचि रखते हैं. उन्हें विश्व ब्रह्माण्ड में परमात्मा की छवि दिखाई देती है. प्रारम्भ से ही वे ध्यान, उपासना, चिन्तन, मनन में रूचि व जिज्ञासा रखते हैं.
(8.)उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि प्रत्येक बालक की भिन्न भिन्न क्षेत्रों में रचनात्मक क्षमता होती है. यह आवश्यक नहीं है कि सृजनात्मक क्षमता को शिक्षा संस्थानों में ही तराशा जाए. माता-पिता, अभिभावकों का भी कर्तव्य है कि बालकों की सृजनात्मक क्षमता की पहचान कर उसको विकसित किया जाए.
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अपने बारे में:मैं सत्यम एजुकेशन वेबसाइट का मालिक हूं।मैं मनोहरपुर जिला-जयपुर (राजस्थान) भारत पिन कोड -303104 से सत्य नारायण कुमावत हूं।मेरी योग्यता -बी.एससी,बीएड है.मैंने एमएससी के बारे में पढ़ा है।किताबें:मनोविज्ञान,दर्शन,आध्यात्मिक,वैदिक,धार्मिक,योग,स्वास्थ्य और कई अन्य ज्ञानवर्धक पुस्तकें पढी हैं।मुझे M.sc,एम.कॉम.,अंग्रेजी और विज्ञान तक लगभग 15 वर्षों का शिक्षण अनुभव है। (About my self I am owner of Satyam Education website.I am satya narain kumawat from manoharpur district-jaipur (Rajasthan) India pin code-303104.My qualification -B.SC. B.ed. I have read about m.sc. books,psychology,philosophy,spiritual, vedic,religious,yoga,health and different many knowledgeable books.I have about 15 years teaching experience upto M.sc. ,M.com.,English and science.)

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