google-site-verification=V6YanA96_ADZE68DvR41njjZ1M_MY-sMoo56G9Jd2Mk Satyam Education: what is difference teacher and preceptor?

what is difference teacher and preceptor?

शिक्षक तथा गुरु में क्या अंतर है ?(what is difference teacher and preceptor?):-

what is difference teacher and preceptor?
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1. हम शिक्षा पद्धति पर आक्षेप लगाते हैं कि वर्तमान शिक्षा पद्धति दोषपूर्ण है। परंतु वस्तुतः क्या एकमात्र कारण शिक्षा पद्धति का दोष होना ही है शिक्षा पद्धति कोई सजीव तंत्र नहीं है कि पूर्णतया उसे ही दोषी ठहराया जा सके यह ठीक है कि वर्तमान परिपेक्ष्य मैं शिक्षा पद्धति के अनुसार ही शिक्षकों को पढ़ाना पड़ता है ।परंतु वस्तुतः उसमें कई भी रास्ते हैं उसके आधार पर हम शिक्षा को उपयोगिता पूर्ण एवं महत्वपूर्ण बना सकते हैं ।उपयोगिता एवं महत्व शिक्षा तंत्र को स्थायित्व प्रदान करती है ।
2. शिक्षण पद्धति को सक्रिय करना ,उसमें जीवन डालना शिक्षकों एवं शिक्षा संस्थानों के संचालकों का कार्य है।यदि शिक्षा में उपयोगिता की कमी एवं  महत्व नहीं होगा तो उसके लिए हम ही जिम्मेदार होंगे। माता-पिता अभिभावक भी इतनी महंगी शिक्षा,अपना पेट काटकर बच्चों को उपलब्ध करवाते हैं तो अवश्य चिंतन करते हैं कि बालकों का विकास हुआ है अथवा नहीं।यदि कोई कमी रहती है तो उसका दोष शिक्षकों पर ही डाला जाता है।
तात्पर्य यह है कि उस कमी को अध्यापकों की उपेक्षा या अयोग्यता ही मानते हैं ऐसी स्थिति में शिक्षकों को छात्र/छात्राओ  की गहरी श्रद्धा से वंचित होना पड़ता है और शिक्षकों में गुरु की गरिमा का भाग नहीं जागता है। केवल पाठ्यक्रम पूर्ण करा देने से वह  गुरु  जैसे सम्मान के अधिकारी नहीं हो जाते हैं।
3. शिक्षा संस्थानों में बालक अनुशासन, सामूहिकता का लाभ ,सहयोग ,सभ्यता ,संस्कृति, विनम्रता सीखने के बजाय उच्छृंखल  ,अनुशासनहीनता, उदंड , अहंकारी,अभिमानी होता जा रहा है तो इसका तात्पर्य यह है कि शिक्षा संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध नहीं हो रही है। पत्राचार विश्वविद्यालय,खुले विश्वविद्यालय तथा निजी स्तर पर बालकों को पढ़ाने‌ अर्थात ‌ट्यूशन भेजने, प्राइवेट पढ़ाई जाने की प्रवृत्ति को एक कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का ना मिलना भी है ।इसलिए शिक्षा के प्रति ऐसी उपेक्षा और बगावत क्यों पनप रही है यह विचारणीय है ।असंतोष लंबे समय तक नहीं बना रह सकता ,उसका विकल्प उभरता है।

4. प्राचीन काल में गुरुकुल प्रणाली थी, संस्थाएं दान दक्षिणा से चलती थी। आवागमन, संचार के साधन नहीं थे। जीवन मितव्ययिता पूर्वक बिताना होता था ।निर्धन तथा अमीर व्यक्तियों के बालकों को समान सुविधाएं थी। सबको मिलजुल ही रहना होता था। बालक एशो आराम का जीवन व्यतीत नहीं कर पाते थे , विद्यार्थी काल तप, साधना में व्यतीत करना होता था । कष्ट और तपपूर्ण जीवन से ही बालकों के गुणों का विकास हो सकता है। इसलिए गुरु पद का दर्जा गुरुकुल के शिक्षकों को प्राप्त था और बालक उसी प्रकार का मान सम्मान व श्रद्धा रखते थे।
5.वर्तमान शिक्षा में अभिभावकों माता-पिता का रवैया भी ठीक नहीं है।यह ठीक है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव में माता-पिता अभिभावकों में असंतोष है ।परंतु शिक्षक यदि उज्जड व उपद्रवी बालकों को अभिभावक डांटने के बजाय उनका पक्ष लेते हैं जिससे बालक बिगड़ते ही हैं।
6. हालांकि वर्तमान समय में प्राचीन काल के बजाय परिस्थितियां बहुत बदल गई है ।परंतु बदली हुई परिस्थितियों में भी मूल सिद्धांत तो वही रखा जा सकता  है अशिक्षित बालकों को सुयोग्य बनाने हेतु प्रतिभा को  निखारने,चरित्रवान बनाने ,अनुशासित करने जैसे गुणों को अपने बलबूते पर को काफी हद तक विकसित करने से सफल हो सकता है। परंतु यह तभी संभव है जब शिक्षक का चयन सदगुण संपन्न होगा तभी शिक्षक सच्चे अर्थों में गुरु जैसे सम्मान पाने का अधिकारी होगा।
7. इस प्रकार शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करवाता है जबकि गुरु बालक का सर्वांगीण विकास करने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शिक्षक को गुरु बनने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर बालक में सद्गुणों का विकास करना ही होगा अन्यथा वह शिक्षक ही बना रहेगा । ऐसी स्थिति में शिक्षक को गुरु जैसे सम्मान प्राप्त नहीं हो सकता है।
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