google-site-verification=V6YanA96_ADZE68DvR41njjZ1M_MY-sMoo56G9Jd2Mk Satyam Education: What are conditions to get education?

What are conditions to get education?

1.शिक्षा प्राप्त करने की क्या शर्ते हैं?(What are conditions to get education?):-

What are conditions to get education?
What are conditions to get education?
(1.) गुरुदेव रविंद्रनाथ के अनुसार सच्ची शिक्षा प्रकृति के सानिध्य से प्राप्त होती है। वह किसी पाठ्य पुस्तक से नहीं मिलती है ।उन्होंने पाठ्यपुस्तक की शिक्षा को मूल रूप से त्याग दिया था । वे मानते थे कि सच्ची शिक्षा  पुस्तक रटने से प्राप्त नहीं हो सकती है । वह मिलती है सृजनात्मक कार्य करने से, अपनी मातृभाषा के माध्यम से , वह एकमात्र माध्यम जो व्यक्ति को सारे समाज के साथ आदान प्रदान करा सकती है और प्रकृति के सानिध्य से उसका एक अविछिन्न अंग बन जाने से। उन्होंने पूरा पूरा जान लिया था,
 समझ लिया था कि अंग्रेजी शिक्षा में इन तत्वों को न केवल अनदेखा कर दिया था बल्कि इन्हें शिक्षा के दायरे से जड़ मूल से निकाल दिया था।
(2.) हमारी प्राचीन शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानसाधना था। ज्ञान शब्द का तात्पर्य था जानकारी, बौद्ध और विवेक यहां तक कि अहंकार को समाप्त करना और विनय जैसे गुणों के विकास से था। विद्यार्थी केवल शास्त्रों का शिक्षण ही प्राप्त नहीं करता था बल्कि व्यावहारिक शिक्षा भी प्राप्त करता था।
(3.)शिक्षा की योजना बहुत सोच समझकर बनानी पड़ती है। उसका आधार दो  बातों पर रहना चाहिए । पहली मानव समाज के जो आदर्श तैयार हुए हैं , शिक्षा का उद्देश्य हो कि उसके द्वारा व्यक्ति उन आदर्शों की तरफ बढ़ता रहे। मानव संस्कृति को जो "पैटर्न" करना चाहता है, शिक्षा उस पेटर्न का निर्माण करें । दूसरा आधार होगा , व्यक्ति और समाज  का गुणधर्म यानी आदर्श चाहे कितना भी ऊंचा क्यों ना हो, शिक्षा का तरीका इस गुण धर्म को सामने रखते हुए बनेगा। व्यक्ति के गुण धर्म को भूलकर अगर शिक्षा की योजना बनेगी तो वह व्यवहारिक नहीं होगी। इसका कारण यह है कि जिसे ढालना है, उसे उसके गुण धर्म के आधार पर डाला जा सकता है। कोई मूर्ति बनानी होती है तो पहले जिस माध्यम से बनानी है, उसके चरित्र को समझना पड़ता है ।जैसे लकड़ी की होगी तो खुदाई द्वारा और कांसे की होगी तो वह ढलायी द्वारा बनेगी। इसी प्रकार शिक्षा की योजना सामाजिक और सांस्कृतिक आदर्श और मनुष्य स्वभाव दोनों के मिलान से ही बननी चाहिए।
(4.)जब से शिक्षा की योजना सोच समझकर बनने लगी, तभी से ऋषियों को और चिंतकों ने शिक्षा के विषय को उनके द्वारा होने वाले विकास के बारे में अच्छी तरह सोच कर ही रखा। गणित सिखाने का अर्थ यह नहीं है कि उससे व्यवहारिक जीवन में लाभ हो क्योंकि अधिकतर लोगों के व्यवहारिक जीवन में उच्च गणित के सिद्धांतों से कोई मतलब नहीं पड़ता है,फिर भी उसे अच्छे शिक्षण का आवश्यक अंग माना गया है। इसका कारण है गणित की शिक्षा से एक विशेष मानसिक विकास होता है जो किसी अन्य विषय के सिखाने से नहीं होता। किंतु अगर गणित सिखाने पर भी उसका यह लाभ न हो तो उसे शिक्षा में स्थान देने का कोई अर्थ नहीं होता। इसलिए शिक्षक को अपने विषय के व्यवहारिक और चारित्रिक दोनों पहलुओं के बारे में खूब गहराई से चिंतन करना चाहिए।
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2. विद्या तथा शिक्षा(Knowledge and education)-

एक तो वह जो आंतरिक बोध     (इंट्यूशन)  के द्वारा सर्जन है। दूसरी वह होती है जिसकी सर्जनात्मक बुद्धि प्रदान होती है । आंतरिक बोध वाली विद्या सिखायी नहीं जा सकती, पर उसे सर्जनात्मक का थोड़ा-बहुत ज्ञान व्यक्ति को जरूर सिखाया जा सकता है जिसका आधार बौद्धिक होता है।

3. शिक्षक की सफलता का रहस्य (Secret of teacher success):-

दो तीन बातें हैं जो सच्चा शिक्षक होने के लिए आवश्यक है। पहली तो यह कि शिक्षक का काम है कि वह वातावरण का निर्माण करें। बालक किसी पद्धति से उतना नहीं सीखते जितना वातावरण से सीखते हैं ।अनुकूल वातावरण प्रेरणादायक होता है, इसलिए शिक्षक का काम है वातावरण तैयार करना।
दूसरी बात है कि शिक्षक बालक की आवश्यकताओं को समझे। उसे बालक के व्यक्तित्व से परिचय हो, हर बालक को व्यक्तिगत तौर पर समझे और वह बाल मनोविज्ञान से परिचित हो। किताबों में जो बाल मनोविज्ञान पढ़ाया जाता है उस से मतलब नहीं। वह कोई अनावश्यक वस्तु है ऐसा अर्थ नहीं है बल्कि सच्चा मनोविज्ञान तो बालक के साथ सीधे संबंध से आता है।

और तीसरी बात जो सबसे अधिक गहरी है, वह है शिक्षक और विद्यार्थी का संबंध। यह शिक्षक और विद्यार्थी का संबंधित स्कूल या क्लासरूम का संबंध नहीं होना चाहिए। यह तो  'चेतन' का 'चेतन' के साथ संबंध होगा। बालक एक चेतन है और शिक्षक भी एक चेतन ।यह संबंध किसी टेक्निकल स्तर का नहीं होता यह संबंध होता उससे परे का संबंध , जहां मानव  का मानव से संबंध होता है, जहां ह्रदय  का ह्रदय के साथ योग होता है।
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