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What is Unfair Means in Exam?

1.परीक्षा में अनुचित साधनों का प्रयोग क्या हैं?(What is Unfair Means in Exam?)-

What is Unfair Means in Exam?
What is Unfair Means in Exam?
  • वर्तमान काल में शिक्षा प्रणाली परीक्षा केन्द्रित व डिग्री हासिल करने वाली हो गई है।शिक्षा का उद्देश्य नौकरी प्राप्त करने से जोड़ लिया गया है और नौकरी के लिए डिग्री की आवश्यकता है तो स्वाभाविक है कि विद्यार्थी येन केन प्रकारेण डिग्री हासिल करना चाहते हैं।
  • नौकरी (सरकारी) प्राप्त करने के पीछे अधिकांश युवाओं का मकसद है कि वेतन अधिकतम मिलता है और काम कम करना पड़ता है।छुट्टियां खूब मिल जाती है।7 घंटे की सर्विस है।सरकारी जाॅब को सेवा करने के उद्देश्य से बहुत कम युवा चुनते हैं।
  • सरकारी नौकरी प्राप्त की जा सके इसके लिए माता-पिता तथा अभिभावक बच्चों की हर फरमाइश पूरी करने की कोशिश करते हैं।बालकों को शिक्षा अर्जित करते समय जब अधिक से अधिक सुविधाएं दी जाती है तो बालक-बालिकाएं ओर अधिक सुविधाओं की मांग करने लगते हैं जिससे बालकों की सुविधा भोगी प्रवृत्ति होती जाती है।धीरे-धीरे बालक परिश्रम करने से जी चुराने लगता है। सरकारी नौकरी में परिश्रम नहीं करना पड़ता है।
  • बालक जब देखते हैं कि नौकरियों के लिए डिग्री की आवश्यकता होती है और डिग्री प्राप्त करने के लिए उनमें परिश्रम का अभाव पाया जाता है तो वे डिग्री हासिल करने के लिए अनुचित साधनों का प्रयोग करते हैं।
  • परीक्षा पास करने के लिए अनुचित साधनों का प्रयोग करते हैं।अनुचित साधनों में शामिल है साथी-विद्यार्थियों की कॉपी से नकल करना,परीक्षा प्रश्न-पत्र प्राप्त करने की तिकड़म भिड़ाना,अपने स्थान पर किसी अन्य विद्यार्थी को बिठाकर परीक्षा दिलाना,शिक्षकों तथा प्रधानाध्यापकों को डराना धमकाना,नकल करने हेतु पर्चिया तैयार करके ले जाना, अपने अन्य साथियों से नकल करने हेतु पुस्तक परीक्षा केंद्रों पर मंगवाना।
  • ऐसे अनुचित साधनों का प्रयोग करना अपराध है तथा बच्चों को उक्त कार्य में लिप्त पाए जाने पर परीक्षा से वंचित करना,आगामी वर्षों में परीक्षा देने पर रोक लगाना तथा सजा के प्रावधान है जिससे बालकों का भविष्य चौपट हो सकता है।सामाजिक रूप से माता-पिता,अभिभावक तथा बालकों की निंदा होती है।
  • बालक शुरू से भोले-भाले तथा अबोध होते हैं परंतु अभिभावकों व शिक्षकों की उदासीनता, बालकों में असफल होने के कारण अनुचित साधनों का प्रयोग करने लगते हैं। यदि उन्हें समझाया जाए की परीक्षा में फेल होने से ज्यादा नुकसानदायक परीक्षा में अनुचित साधनों का प्रयोग करना है।परीक्षा में फेल होने से केवल एक साल बर्बाद होता है जबकि परीक्षा में अनुचित साधनों का प्रयोग करने तथा पकड़े जाने पर भविष्य खराब होता है तथा सामाजिक रूप से निन्दा होती है सो अलग।
  • जो बालक परीक्षा में अनुचित साधनों का प्रयोग करते हैं उनमें धीरे-धीरे अन्य बुराइयां भी प्रवेश करती जाती है।जैसे धोखाधड़ी,बेईमानी,चोरी करना,झूठ बोलना,चालाकी करना इत्यादि।कोई समय था जब प्रमाण-पत्र के आधार पर नौकरी मिल जाती थी परन्तु आज समय यह है कि प्रमाण-पत्र के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा से गुजरना होता है। इसलिए योग्यता नहीं है तो केवल डिग्री या प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी हासिल नहीं की जा सकती है।अब नौकरी तथा निजी व्यवसाय दोनों में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना होता है।इसलिए कर्मठ व्यक्ति ही सफलता अर्जित कर सकता है।अतः गलत तरीके अपनाना स्वयं के साथ-साथ,अभिभावकों तथा लोगों के साथ विश्वासघात करना है।इसलिए सही मायने में पुरुषार्थ तथा ज्ञान-सम्पदा ही असली योग्यता है।
  • बालकों को पढ़ाना आवश्यक है इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि उनको अनुचित साधनों से परीक्षा पास करने हेतु प्रोत्साहित किया जाए।इसके बजाय यथार्थ स्थिति को समझते हुए उन्हें परिश्रम करने हेतु प्रोत्साहित किया जाए। यदि परीक्षा में बालक सफल नहीं हो पाता है और हमारा अनुमान है कि परीक्षा पास करना व पढ़ना-लिखना बालक के वश में नहीं है तो उन्हें कोई हुनर सिखाना चाहिए।बालकों को येन-केन प्रकारेण पढ़ाना और पैसा खर्च करना व्यर्थ है। परीक्षा में उत्तीर्ण होने की महत्वाकांक्षा बालक की होती है तथा अभिभावक भी चाहते हैं कि बालक अच्छे अंको से उत्तीर्ण हो परंतु अनुचित साधनों का प्रयोग करके उत्तीर्ण होना बुद्धिमता नहीं है।
  • अभिभावकों को चाहिए कि अनुचित साधनों का प्रयोग करने के बजाय उनको परिश्रमपूर्वक परीक्षा उत्तीर्ण करने में सहायक बने।वस्तुतः विद्या अध्ययन करना एक प्रकार का योगाभ्यास है।उसमें छल-कपट का प्रयोग करना तो महान संभावनाओं से अपने आप को वंचित करना है,योग भ्रष्ट होना है।अपने पतन का मार्ग चुनना है।
  • इस आर्टिकल में परीक्षा में अनुचित साधनों का प्रयोग क्या हैं? (What is Unfair Means in Exam?) के बारे में बताया गया है।

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What is Unfair Means in Exam?
What is Unfair Means in Exam?

2.परीक्षा में अनुचित साधनों का प्रयोग क्या हैं? (What is Unfair Means in Exam?) में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न-

Q:1.परीक्षा में अनुचित साधनों का उपयोग करने के बारे में छात्रों को क्या लगता है? (What do students feel about using unfair means in examination?)
उत्तर-अनफेयर मीन्स के लिए स्टूडेंट्स रिजॉर्ट क्यों? असफलता का डर: कुछ छात्रों द्वारा परीक्षा में धोखा देने का सबसे बड़ा कारण डर है। कुछ 'छात्र परीक्षा में असफल होने पर बहुत सारी समस्याओं का अनुमान लगाते हैं। उनके माता-पिता के डर से उनके माता-पिता खराब ग्रेड, उनके दोस्तों का मजाक उड़ाते हैं और भविष्य में एक संभावित अंधेरा भी हो सकता है।
Q:2.अच्छी क्यों नहीं होती? (Why are exams not good?)
उत्तर-परीक्षा एक धमकी भरा शब्द है। इससे छात्रों को मानसिक तनाव होता है। परीक्षा के डर से ग्रामीण क्षेत्रों में कई छात्र स्कूल जाने में अपनी रुचि खो देते हैं या अपनी पढ़ाई छोड़ देते हैं जिसके परिणामस्वरूप पढ़ाई छूट जाती है। परीक्षा सीखने की भावना को मार देती है।
Q:3.परीक्षा का कारण क्या है? (What is the reason for exams?)
उत्तर-परीक्षा और परीक्षण यह आकलन करने का एक शानदार तरीका है कि छात्रों ने विशेष विषयों के संबंध में क्या सीखा है। परीक्षा में दिखाया जाएगा कि प्रत्येक छात्र ने किस पाठ का सबसे अधिक रुचि लिया है और याद किया है।है।
Q:4.परीक्षा में अनुचित का अर्थ हिंदी में (unfair means in examination meaning in hindi)
उत्तर-एक अभ्यर्थी अनुचित साधनों का उपयोग करते हुए या अव्यवस्थित आचरण या अन्य को परेशान करते हुए पाया गया। उम्मीदवारों, एक परीक्षा के संबंध में या अनफेयर साधनों को संदर्भित किया जाएगा।मामले के विचार के बाद समिति ने इसे संदर्भित किया। प्रशिक्षक / अन्वेषक सजा दे सकता है।
Q:5.परीक्षा में अनुचित साधनों का उपयोग करने के कारण (reasons for using unfair means in examination)
उत्तर-असफलता का डर: कुछ छात्रों द्वारा परीक्षा में धोखा देने का सबसे बड़ा कारण डर है।क्षमता की कमी: कुछ छात्र ऐसे होते हैं जिनके पास परीक्षा की चुनौती लेने की क्षमता नहीं होती है।रुचि की कमी: कुछ छात्रों को पढ़ाई में कोई दिलचस्पी नहीं है।
Q:6.परीक्षा में अनुचित साधनों के कारण और प्रभाव (causes and effects of unfair means in examination)
उत्तर-परीक्षाओं में इस नकल के पीछे कई कारण हैं। इनमें से कुछ दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली, छात्र राजनीति, अनुपयुक्त पाठ्यक्रम, योग्य शिक्षकों की कमी, शिक्षकों की बेईमानी, शिक्षण वातावरण की कमी, जन जागरूकता की कमी आदि हैं। कई शिक्षक छात्रों को ठीक से नहीं पढ़ा सकते हैं।
Q:7.अनुचित का अर्थ (meaning of unfair means)
उत्तर-समानता और न्याय के सिद्धांतों के अनुसार पर आधारित या व्यवहार नहीं।"कई बार इस तरह की कानूनी व्यवस्था अमानवीय और अनुचित प्रतीत होती है"
इन प्रश्नों के उत्तर द्वारा परीक्षा में अनुचित साधनों का प्रयोग क्या हैं? (What is Unfair Means in Exam?) के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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Provide Quality Eduation to Children

 1.बालकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे उपलब्ध कराएं? (How to Provide Quality Eduation to Children?)-

इस आर्टिकल में बालकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे उपलब्ध कराएं (How to Provide Quality Eduation to Children) के बारे में बताया गया है।

वर्तमान समय में बालकों के रंग-ढंग,चाल-चलन,तौर-तरीकों को देखकर माता पिता,अभिभावक,शिक्षकों तथा देश के प्रबुद्ध जन यह सोचने को विवश हो गए हैं कि बालकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे उपलब्ध कराएं? (How to Provide Quality Eduation to Children?) अधिकांश स्कूलों में बालकों को व्याख्यान विधि द्वारा पढ़ाया व समझाया जाता है जो कि एक अवैज्ञानिक विधि मानी जाती है।इसलिए आधुनिक युग में शिक्षा के लिए उपयुक्त नहीं जाती है।

मानव जीवन में शिक्षा एवं स्वास्थ्य दो ऐसी आवश्यकताएं हैं जो सरकारी स्तर निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती है।आज हम शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाए रखने के लिए कुछ टिप्स बताएंगे जिससे शिक्षा के स्तर में सुधार करना संभव है।

शिक्षक पुराने और परंपरागत तरीके से शिक्षण उपलब्ध कराते हैं। अतः शिक्षकों को समय-समय पर रिफ्रेसर कोर्स कराया जाए तथा रिफ्रेसर कोर्स में उन्हें नवीन तकनीकी की जानकारी दी जानी चाहिए।

शिक्षकों को लीडरशिप के गुर सिखाए जाए तथा उन्हें बताया जाए कि अपने शिक्षण के द्वारा बच्चों के सामने नई पहल करें।बच्चे पहेलियों,संगीत,मॉडल्स तथा खेल-खिलौनो में रुचि रखते हैं।इसलिए उन्हें पहेलियों,संगीत,माॅडल्स तथा खेल-खिलौनों के माध्यम से शिक्षा प्रदान की जाए। अर्थात् अपने शिक्षण में इनका प्रयोग करें।

शिक्षकों को प्रशिक्षित करने से शिक्षा संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ेगी।शिक्षकों को तकनीकी व नई-नई जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी तो अपटूडेट रहेंगे।

समाज के हर वर्ग के लोगों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए नवीन तकनीकी की जानकारी और उसका इस्तेमाल किया जाना आवश्यक है।इसके लिए शिक्षक-अभिभावक बैठक आयोजित की जानी चाहिए। अभिभावकों को बताया जाए कि बच्चों पर सतत निगरानी रखना उनका कर्तव्य है।केवल शिक्षा संस्थानों पर जिम्मेदारी डाल कर अपने कर्तव्य से विमुख न हो।

अभिभावकों का कर्त्तव्य है कि शिक्षकों के साथ-साथ अपने बच्चों को समय दे। शिक्षा संस्थान और पाठ्यक्रम से संबंधित वार्तालाप करें। और उसके उपरांत नियमित रूप से विद्यालय में शिक्षकों से मिले और अपने बच्चों की प्रगति रिपोर्ट पर चर्चा करें।

जब शिक्षा संस्थान,शिक्षक और अभिभावक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ-साथ आधारभूत एवं मूलभूत संरचना उपलब्ध कराने के लिए प्रयास करेंगे तो बालकों ने निश्चित रूप से परिवर्तन लाया जा सकेगा।

आपको यह जानकारी रोचक व ज्ञानवर्धक लगे तो अपने मित्रों के साथ इस आर्टिकल को शेयर करें।यदि आप इस वेबसाइट पर पहली बार आए हैं तो वेबसाइट को फॉलो करें और ईमेल सब्सक्रिप्शन को भी फॉलो करें।जिससे नए आर्टिकल का नोटिफिकेशन आपको मिल सके ।यदि आर्टिकल पसन्द आए तो अपने मित्रों के साथ शेयर और लाईक करें जिससे वे भी लाभ उठाए ।आपकी कोई समस्या हो या कोई सुझाव देना चाहते हैं तो कमेंट करके बताएं।इस आर्टिकल को पूरा पढ़ें।

2.व्यावहारिक व क्रियात्मक शिक्षा आवश्यक है (Practical and performative education is necessary for Provide Quality Eduation to Children)-

यहां यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से क्या तात्पर्य है?गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में चारित्रिक शिक्षा, व्यावहारिक शिक्षा व शारीरिक शिक्षा शामिल है।ऐसी शिक्षा बालकों को व्यावहारिक जीवन में आने वाली वास्तविक कठिनाइयों से तो परिचित कराती ही है साथ ही उन कठिनाइयों तथा समस्याओं का मुकाबलाऔर समाधान करना सिखाती है।

वर्तमान में युवा वर्ग डिग्री हासिल करके जब जीवन क्षेत्र में उतरता है तो जीवन की वास्तविक कठिनाइओं से मुकाबला होते ही भाग खड़ा होता है।उसे इन कठिनाइयों से मुकाबला करना सिखाया ही नहीं जाता है।ऐसा इसलिए होता है क्योंकि माता-पिता,अभिभावक नहीं चाहते हैं कि बच्चे खतरों का सामना करें ,यह स्वाभाविक भी है।

परंतु खतरों के सामने माता-पिता या अभिभावक ढाल बनकर न रहे बल्कि एक सहायक के रूप में रूप में रहे। जैसे यदि बालक को तैरना सिखाना है तो पानी में तो कूदना ही पड़ेगा लेकिन बालक जब डूबने लग जाए तब उसे पकड़े और डूबने से कैसे बचा जाता है यह बताया जाए।यदि हम केवल उसे तैरने की किताब पढ़ाकर उसे पानी में नहीं उतारेंगे अर्थात् खतरों के ढाल बनकर रहेंगे तो ऐसा बालक जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना नहीं कर पाएगा।केवल किताबी ज्ञान ही न देकर व्यावहारिक व क्रियात्मक ज्ञान भी दिया जाना चाहिए जिससे बालक स्वयं समस्याओं का समाधान करना सीखें।

उपर्युक्त विवरण में बालकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे उपलब्ध कराएं? (How to Provide Quality Eduation to Children?) के बारे में बताया गया है।


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what is professionalisation of education?

1.शिक्षा का व्यावसायीकरण क्या है? (what is professionalisation of education?)- 

इस आर्टिकल में शिक्षा का व्यावसायीकरण क्या है? (what is professionalisation of education?) के बारे में बताया जाएगा। (1.) प्राचीनकाल में शिक्षा नि:शुल्क प्रदान की जाती थी। गुरुजनों तथा गुरुकुल का आर्थिक भार समाज द्वारा वहन किया जाता था,पर हजारों वर्षों की गुलामी के कारण हमारी प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का लोप हो गया। (2.) हजारों वर्षों के बाद भारत को जब आजादी मिली तो सरकार का दायित्व था कि जो मैकाले द्वारा शिक्षा प्रणाली लागू की गई थी उसको भारतीय परिवेश के अनुसार लागू किया जाता। (3.) मैकाले द्वारा लागू शिक्षा प्रणाली केवल क्लर्क,बाबू पैदा करने के लिए लागू की गई उसमें व्यावहारिक शिक्षा का बिल्कुल ही समावेश नहीं था,केवल सैद्धान्तिक शिक्षा दी जाती थी जो जीवन को सुचारु रूप चलाने के कहीं काम नहीं आती है।जो व्यावहारिक जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए शिक्षा आवश्यक है,वैसी शिक्षा दी नहीं जाती है। (4.), मैकाले द्वारा लागू की गई शिक्षा प्रणाली का ही वर्तमान में इतना व्यावसायिकरण हो गया है कि वर्तमान शिक्षा संस्थानों को दुकानों की संज्ञा दी जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। (5.) गली-गली में ये शिक्षा संस्थान खोले जा रहे हैं।इन शिक्षा संस्थानों द्वारा शिक्षा के सभी सिद्धान्तों और नियमों की अवहेलना की जाती है। (6.) शिक्षा संस्थानों में ज्यादातर अप्रशिक्षित शिक्षक नियुक्त किए जाते हैं। शिक्षा के स्तर में गिरावट का एक मुख्य कारण यह भी है कि कम वेतन के कारण शिक्षक मन लगाकर अपने कर्त्तव्यों का पालन नहीं करते हैं।इन निजी शिक्षा संस्थानों में से बहुत कम ऐसे शिक्षा संस्थान हैं जो स्तरीय और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में या उपलब्ध कराने में सक्षम हैं,बाकी अधिकांश शिक्षा संस्थानों ने शिक्षा को धन कमाने का साधन मान रखा है। (7.) व्यावसायिक दृष्टिकोण रखना बुरा नहीं है यदि विद्यार्थियों के हित और कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए अर्थात् छात्र-छात्राओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराई जाए। परन्तु निजी शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों और माता-पिता व अभिभावकों को आकर्षित करने के लिए तथा मोटी-मोटी फीस वसूल करने के लिए आलीशान भवन तो बना रखे हैं परन्तु उनमें योग्य शिक्षकों का अभाव हैं। (8.) सरकारी स्कूलों की हालत तो यह है कि इसमें शिक्षक वे व्यक्ति ही नियुक्ति हेतु आवेदन करते हैं जिनकी ओर क्षेत्र, व्यवसाय या प्रोफेशन में सलेक्शन नहीं होता है।अफसोस की बात तो यह है कि इन शिक्षकों को बहुत अच्छा वेतनमान मिलने के बावजूद वे अपने कर्त्तव्यों का पालन ठीक से नहीं करते हैं। सातवां वेतन आयोग मिलने के बाद तो स्थिति यह हो गई है कि ये जो कुछ पुरुषार्थ करते थे उसको भी लकवा हो गया है। (9.) माता-पिता को कामकाज की व्यस्तता के कारण वे अपने बच्चों पर ध्यान नहीं देते हैं तथा बच्चों के अंधकारमय भविष्य के लिए सरकार व शिक्षा संस्थानों को दोष देते हैं। (10.)सरकार राजनेताओं के भरोसे है और राजनेता इस कार्य में मशगूल रहते हैं कि किन हथकंडों से सत्ता में बने रहें उन्हीं कार्यों को प्राथमिकता देते हैं। (11.) शिक्षा संस्थान यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि सालभर में कोर्स कराने से ही फुर्सत नहीं मिलती तो सर्वांगीण शिक्षा तथा सर्वांगीण विकास के बारे में कैसे सोचा जा सकता है ‌ (12.) बच्चों से प्रश्न किया जाता है कि आप क्या कर रहे हो या क्या करने का इरादा है तो उनका जवाब रहता है कि उनके लायक कोई काम नहीं मिल रहा है।यानी वर्तमान युवाओं का डिग्री हासिल करने के बाद उनके अन्दर पुरुषार्थ करने की क्षमता ही नहीं रह गई है। अब ऐसे में माता-पिता बच्चों को डिग्री दिलवाकर छूठी आशाएं पाले हुए हैं।सभी युवाओं को सरकारी नौकरी मिलने से रही।मात्र 10-15% युवाओं को सरकारी नौकरी मिलती है। ऐसे में इस समस्या का तात्कालिक समाधान हमारी नजर में यही आता है कि सबसे अधिक जिम्मेदारी माता-पिता व शिक्षक की होती है। माता-पिता का सर्वप्रथम कर्त्तव्य बालकों को उत्तम संस्कार, श्रेष्ठ आचरण,मानसिक विकास तथा आध्यात्मिक उन्नति के गुणों को विकसित करना। बच्चों को सरकारी नौकरी की झूठी सान्त्वना न देकर, यथार्थ कै समझकर शुरू से ही किसी हुनर को सीखना जिससे डिग्री प्राप्त करने के बाद बालक बेरोजगार न रहे। उपर्युक्त आर्टिकल में शिक्षा का व्यावसायीकरण क्या है? (what is professionalisation of education?) के बारे में बताया गया है।

2.व्यावसायिकता का क्या अर्थ है? (What does professionalisation mean?)- 


एक पेशा, गतिविधि, या समूह पेशेवर गुण देने की क्रिया या प्रक्रिया, आमतौर पर प्रशिक्षण बढ़ाकर या आवश्यक योग्यता बढ़ाकर। "युवा खेलों के व्यवसायीकरण ने कोचिंग को तेजी से आकर्षक पेशे में बदल दिया है" व्यावसायीकरण एक सामाजिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई भी व्यवसाय या व्यवसाय अपने आप को एक सच्चे "उच्चतम निष्ठा और सक्षमता के पेशे में बदल देता है।"जो पेशे का गठन करता है उसकी परिभाषा अक्सर लड़ी जाती है।व्यावसायीकरण स्वीकार्य योग्यता, एक या अधिक पेशेवर संघों की स्थापना के लिए सबसे अच्छा अभ्यास की सिफारिश करने और पेशे के सदस्यों के आचरण की देखरेख करने के लिए जाता है, और अयोग्य एमेच्योर (यानी, पेशेवर प्रमाणन) से योग्य के सीमांकन के कुछ डिग्री। यह "व्यावसायिक बंद" बनाने की भी संभावना है, बाहरी लोगों, शौकीनों और अयोग्य से पेशे को बंद करना। पूरी तरह से व्यावसायिक नहीं किए गए व्यवसायों को कभी-कभी अर्धचालक कहा जाता है।व्यावसायिकता के आलोचकों ने साख के एक रूप के रूप में विकृत प्रोत्साहन (अनिवार्य रूप से, अपराधियों के नकारात्मक पहलुओं का एक आधुनिक एनालॉग) द्वारा संचालित अति उत्साही संस्करणों को देखा। व्यवसायीकरण की प्रक्रिया "ज्ञान-प्राधिकारियों के बीच एक पदानुक्रमित विभाजन और एक उदासीन नागरिकता का निर्माण करती है।"इस सीमांकन को अक्सर "व्यावसायिक बंद" कहा जाता है, इसका मतलब है कि पेशा फिर बाहरी लोगों, शौकीनों और अयोग्य लोगों से प्रवेश के लिए बंद हो जाता है:एक स्तरीकृत व्यवसाय "पेशेवर सीमांकन और ग्रेड द्वारा परिभाषित किया गया है।" कहा जाता है कि इस प्रक्रिया का मूल मध्य युग के दौरान अपराधियों के साथ रहा है,उन्होंने यात्रा करने वालों के रूप में अपने ट्रेडों का अभ्यास करने और अवैतनिक प्रशिक्षुओं को शामिल करने के लिए विशेष अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी।इसे क्रेडेंशियलिज़्म भी कहा जाता है,यह निर्धारित करने के लिए कि क्या किसी को कार्य करने की अनुमति है या विशेषज्ञ के रूप में बोलने के लिए औपचारिक योग्यता या प्रमाणपत्र पर निर्भरता है।इसे "हायरिंग, प्रमोशन पॉलिसी को निर्धारित करने में क्रेडेंशियल्स पर अत्यधिक निर्भरता, विशेषकर शैक्षणिक डिग्री के रूप में भी परिभाषित किया गया है।"इसे आगे भी परिभाषित किया गया है, जहां नौकरी या किसी पद के लिए क्रेडेंशियल्स को अपग्रेड किया जाता है, हालांकि, कोई कौशल परिवर्तन नहीं है जो इस वृद्धि को आवश्यक बनाता है . व्यवसायों में भी शक्ति होती है,प्रतिष्ठा, उच्च आय, उच्च सामाजिक स्थिति और विशेषाधिकार;उनके सदस्य जल्द ही एक कुलीन वर्ग के लोगों को शामिल करने आते हैं, आम लोगों से कुछ हद तक कट जाते हैं, और एक पर कब्जा कर लेते हैं समाज में ऊंचा स्थान: "एक संकीर्ण कुलीन ... एक श्रेणीबद्ध सामाजिक प्रणाली: क्रमबद्ध व्यवस्था और वर्गों की एक प्रणाली।" व्यवसायीकरण प्रक्रिया किसी पेशे के सदस्यों के आचरण और योग्यता के समूह मानदंडों को स्थापित करने के लिए जाती है और यह भी जोर देती है कि पेशे के सदस्य "मानक के अनुरूप" प्राप्त करते हैं और स्थापित प्रक्रियाओं के साथ अधिक या कम सख्ती से पालन करते हैं। कोई भी सहमत आचार संहिता, जिसे पेशेवर निकायों द्वारा पॉलिश किया जाता है,"मान्यता के लिए पेशे की सामान्य अपेक्षाओं के अनुरूप है।"विभिन्न व्यवसायों को अलग-अलग तरीके से आयोजित किया जाता है। उदाहरण के लिए, डॉक्टर उद्यमशीलता पर स्वायत्तता चाहते हैं। प्रोफेशनल्स अपनी विशेषज्ञता के कारण अधिकार चाहते हैं। पेशेवर लोगों को अपने कार्यक्षेत्र के लिए जीवन भर की प्रतिबद्धता के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। 

3.अध्यापन के व्यवसायीकरण से क्या लाभ हैं? (What are the benefit of professionalisation of teaching?)-

हाल के वर्षों में शिक्षा की धारणाओं में बदलाव हुए हैं - और यह आंशिक रूप से सूचना और शिक्षक संसाधनों के नए प्रवाह के कारण हुआ है जो इंटरनेट के रूप में पाया जा सकता है। क्योंकि हमारी वित्तीय स्थिति कैसे भंगुर है और इस वजह से कि हमारे समाज में चुनौतियां कैसे बनी हुई हैं, इस बारे में तर्क दिए गए हैं कि क्या शिक्षण को व्यावसायिक बनाया जाना चाहिए या नहीं - और यह धन के लिए अच्छा मूल्य है या नहीं। शिक्षा की दुनिया में टिप्पणी करने वालों का मानना ​​है कि यदि आप एक प्रभावी शिक्षक बनने जा रहे हैं तो आपको बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। अपने पाठों को पढ़ाना अब पर्याप्त नहीं है, क्योंकि जो लोग छात्रों के साथ कक्षा में समय बिताते हैं, उनसे कई अलग-अलग चीजों के लिए बाहर देखने की उम्मीद की जाती है - छात्रों में से एक में अवसादग्रस्तता या नकारात्मक व्यक्तित्व, या यहां तक ​​कि कुछ में दुर्व्यवहार के संकेत सहित। गंभीर हालात। इस वजह से, कई तर्क हैं कि एक शिक्षक को आधिकारिक होने की आवश्यकता है, लेकिन एक तरह से जो उन्हें पसंद करने योग्य, सम्मानजनक और स्वीकार्य बनाता है। कभी-कभी, एक बच्चा अपने माता-पिता और अपने घर से अलग महसूस कर सकता है, और इस वजह से कि एक छात्र अपने स्कूल में आधे से अधिक समय कैसे बिताता है, विश्वास में बातचीत के लिए कॉल का अगली जगह शिक्षक हो सकता है।यदि एक शिक्षक एक पेशेवर नहीं है,तो एक छात्र को कैसे लगेगा कि वे उस व्यक्ति में पर्याप्त आश्वस्त हैं जो उन्हें गंभीर मुद्दों में विश्वास करना सिखाता है? एक शिक्षक को अपने शिक्षण में सुसंगत होने की आवश्यकता है -यह सुनिश्चित करना कि वे उन सभी पाठों के लिए मौजूद हैं जो वे लेने के लिए बाध्य हैं।एक शिक्षक के रूप में सबक गुम होना न केवल व्यावसायिक अर्थों से लापरवाह है,बल्कि पाठों को रद्द करना या एक प्रतिस्थापन शिक्षक का उन छात्रों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जो कुछ भयावह परीक्षाओं से जूझ रहे हो सकते हैं,जिसमें शिक्षक की निरंतरता और दिशा की जरूरत होती है।प्रतिस्थापन शिक्षकों के साथ छात्रों के साथ एक व्यक्तिगत संबंध नहीं होने पर, कक्षा में जो कुछ कवर किया गया है, उसका ज्ञान, और शिक्षण के लिए एक अलग दृष्टिकोण, शिक्षक के व्यावसायिकता के अनुरूप नहीं होने पर छात्रों के लिए हानिकारक हो सकता है। भले ही यह दृढ़ और निष्पक्ष होना महत्वपूर्ण हो, लेकिन अपना आपा खोना बेअसर साबित हुआ है।ऐसे समय होंगे जब छात्र दुर्व्यवहार कर सकते हैं या जहां वे अपेक्षाओं को पूरा नहीं करेंगे और आपने कक्षा में क्या योजना बनाई है, लेकिन इसके बाद से कॉल के बिंदुओं पर चर्चा होनी चाहिए,न कि वैकल्पिक तरीकों जैसे चिल्लाना और बाकी हिस्सों से अलग होना।किसी मुद्दे के माध्यम से बात करने से आप तर्क के बारे में बेहतर समझ हासिल कर सकते हैं कि ऐसा क्यों हुआ है।इसके अलावा,यदि आप उन लोगों को जानने के लिए तैयार हैं जिन्हें आप पढ़ाते हैं,तो आपको उन विभिन्न परिस्थितियों का व्यापक ज्ञान हो सकता है जिन्हें वे अपने निजी जीवन में संभाल रहे होंगे। एक कामकाजी संबंध को तब और अधिक उत्पादक बनाया जा सकता है जब इसे व्यक्तिगत संबंधों के अनुरूप लाया जाए। अपने छात्रों के साथ बॉन्ड;द सिम्पसंस की पिछली रात के एपिसोड के बारे में बात करें। समय-समय पर खुला और अनौपचारिक होना वास्तव में आपके व्यावसायिकता में जोड़ सकता है। 

4.व्यावसायिकता और व्यावसायिकता के बीच अंतर क्या है? (What is the difference between professionalization and professionalism?)- 

फिर से यह निर्भर करता है कि आपके शब्द के उपयोग पर कितना प्रतिबंध है,व्यावसायिकता शब्द व्यापक और बहुत व्यापक है।व्यवसायीकरण एक पेशा बनने की दिशा में आंदोलन है, जो कि ज्ञान आधारित सेवा क्षेत्र के व्यवसायों की एक विशिष्ट श्रेणी है पृष्ठ 3 जो कि सार ज्ञान पर आधारित हैं। इस आर्टिकल में शिक्षा का व्यावसायीकरण क्या है? (what is professionalisation of education?) के बारे में बताया गया है।
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Is Eduation Pride of Man?

1.क्या शिक्षा व्यक्ति का गौरव है? का परिचय (Introduction to Is Eduation Pride of Man?)-

s Eduation Pride of Man?
Is Eduation Pride of Man?


क्या शिक्षा व्यक्ति का गौरव है? (Is Eduation Pride of Man?), इसके बारे में इस आर्टिकल में बताया गया है।

(1.)मनुष्य का मूल्यांकन विरासत में मिला हुआ धन, संपत्ति नहीं है और न ही सुंदरता है।मनुष्य की योग्यता व व्यक्तित्व शिक्षा, विद्या सद्बुद्धि, सद्ज्ञान,चरित्र और विवेक के आधार पर परखा जाता है।संसार में धनवान के बजाय शिक्षित व्यक्ति को ही वास्तविक रूप में धनी माना जाना चाहिए।

(2.)शिक्षा युवाओं का सहारा, धनवान का यश और प्रौढ़ व्यक्ति के सुख का साधन होता है।शिक्षा के आधार पर व्यक्ति विचारशील, एकाग्रचित्त और परिश्रमी बनता है। शिक्षा समृद्धि में आभूषण,कठिनाई में सहारा और प्रत्येक समय हमारे मनोरंजन का साधन है।इस प्रकार हमें शिक्षा और विद्या द्वारा अंतर्बोध होता है अर्थात् परमात्मा की अनुभूति होती है।

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(3.)युवाओं तथा प्रौढ़ व्यक्तियों का विद्या ही सच्ची मित्र और अविद्या से बढ़कर कोई शत्रु नहीं है।विद्या तथा शिक्षा से मनुष्य सम्मान प्राप्त करता है। अविद्या तथा अज्ञान के कारण ही असफलता प्राप्त होती है।मनुष्य धन-संपत्ति और जमीन जायदाद के कारण नहीं बल्कि विशेष ज्ञान,शिक्षा और विशेष अध्ययन के कारण ही आगे बढ़ता है। 

(4.)शिक्षा और विद्या का इतना अधिक महत्त्व होने के बावजूद शिक्षा और विद्या अर्जित करना और कराना दोनों ही कार्य कठिन है।कठिन कार्य इसलिए है कि शिक्षा और विद्या का अध्यापन कराने की योग्यता वही मनुष्य रखता है जो अपने चरित्र को उज्जवल व पवित्र रखता है अर्थात् आचरणयुक्त मनुष्य ही पात्रता रखता है और ऐसे मनुष्य बहुत कम विद्यमान है।ऐसा मनुष्य अपने विद्यार्थियों को तत्व-विद्या अर्थात् ऐसी विद्या जो मनुष्य को श्रेष्ठ बनाती है और उच्च स्तर पर पहुंचाती है,का ज्ञान कराने की क्षमता रखता है।

2.क्या शिक्षा मनुष्य का गौरव है?(Is Eduation Pride of Man?),शिक्षा व्यक्ति का आभूषण (Education Jewelry of Man)-

(5.)आधुनिक शिक्षा में ऐसा सामर्थ्य नहीं है जो विद्यार्थियों में चरित्र निर्माण ,कर्मठता, उत्साह,संयम और सात्त्विकता को जागृत कर सके क्योंकि वर्तमान समय में ऐसे अध्यापकों का अभाव है जिनमें उपर्युक्त गुण विद्यमान हों।जब अध्यापकों में ही वास्तविक शिक्षा व विद्या का अभाव है तो विद्यार्थियों के उद्धार के लिए जिस शिक्षा की आवश्यकता है उसका बीजारोपण कैसे सम्भव है?

(6.) आधुनिक शिक्षा में ऐसे समर्पित अध्यापकों का अभाव तो है ही साथ ही वर्तमान शिक्षा से जो विद्यार्थी डिग्री लेकर निकलते हैं उनमें से अधिकांश विद्यार्थियों में छल-कपट, चोरी, बेईमानी, दुश्चरित्रता, फैशनपरस्ती, विलासिता, अहंकार ,द्वेष,धूर्तता पाई जाती है।वास्तविक रूप में ऐसी विद्या या शिक्षा न होकर अशिक्षा ही कही जा सकती है। सच्चे अर्थों में आज शिक्षा और विद्या का अभाव ही है जो विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता ,शराब, सिगरेट ,मारपीट, लूट-खसोट, हड़ताल करना, परीक्षा में नकल करना जैसे दुर्व्यसनों में फंसाती है।

(7.)जो विद्या (ज्ञान) मनुष्य को सही दिशा, विकास, उन्नति और जीवन की सच्चाईयों का दिग्दर्शन कराती है,अपनी अंतरात्मा का बोध कराती है उसे भौतिक तथा आध्यात्मिक विद्या कहते हैं।यदि मनुष्य का विवेक जागृत ना हो तो ऐसी विद्या पतन का कारण बन जाती है।गुण, कर्म और स्वभाव में सात्विकता नहीं आती हो तो ऐसी शिक्षा मनुष्य को पशुता के बराबर लाकर खड़ा कर देती है।इस प्रकार अध्यात्म विद्या जीवन के लिए परम उपयोगी है।

(8.)अध्यात्म विद्या से मनुष्य स्वयं का मित्र तो बनता है, आजीविका के योग्य होता है तथा उसका जीवन आनंद व सुख से व्यतीत होता है। परंतु अध्यात्म विद्या को सीखने के लिए अर्थात् जीने के लिए सच्ची लगन,उत्साह व जिज्ञासा की आवश्यकता है।सच्चे अर्थों में जब हमें ज्ञान की प्यास होने लगे तभी समझना चाहिए कि हम सही दिशा में बढ़ रहे हैं।जो व्यक्ति सांसारिक कर्तव्यों का निर्वाह करने की शिक्षा व अध्यात्म-विद्या अर्जित कर लेता है तो वही मनुष्य का वास्तविक आभूषण है।

इस प्रकार उपर्युक्त विवरण में हमने क्या शिक्षा व्यक्ति का गौरव है? (Is Eduation Pride of Man?) को जानने का प्रयास किया है।

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What are Controversy in Eduation Today?

1.वर्तमान में शिक्षा में क्या विरोधाभास है? (What are Controversy in Eduation Today?)-

वर्तमान में शिक्षा में क्या विरोधाभास है? (What are Controversy in Eduation Today?), इसके बारे में इस आर्टिकल में बताया गया है।

(1.)हर व्यक्ति यही कहता है कि बच्चे देश का भविष्य हैं। परन्तु यह जानते समझते हुए भी वह बच्चों के उज्जवल चरित्र और भविष्य को श्रेष्ठ व उन्नत करने में रूचि लेता दिखाई नहीं देता है अर्थात् कथनी व करनी में अन्तर है।

(2.) दरअसल बालक देश का भविष्य हैं इसमें आधुनिक भारत के व्यक्तियों की यह सोच है कि बालक बड़ा होकर नौकरियों के लिए प्रतियोगिता में पड़ना,ऊंचा पद,ऊंचे वेतन और अधिकाधिक पैसा पाना ही अपने जीवन का लक्ष्य माने वही शिक्षा है जबकि शिक्षा व्यक्ति के गरिमा,व्यक्तित्त्व व आचरण से जुड़ती है।जैसी प्रेरणा देने वाली शिक्षा पद्धति होगी वैसी ही प्रवृत्ति के विकास को उस समाज में गौरवान्वित किया जाएगा।

यही कारण है कि वर्तमान भारतीय समाज में यही बात गौरवास्पद समझी जाती है कि उसका बच्चा ऊंचा पद तथा इतना पैसा कमाए जिससे कि उनका यश फैले और बच्चा यशस्वी हो जाए।इस प्रकार बच्चों और युवाओं के लिए यश प्राप्ति का मापदण्ड ऊंचा पद, नौकरी और पैसा अर्थात् कोई बड़ा व्यवसाय करना माना जाता है अथवा जोड़-तोड़ बैठाने में माहिर होकर कोई नेता बने।

(3.)हम बालकों को सच्चरित्र,कर्मठ, आस्थावान, संघर्षशील तथा आदर्शों के लिए अडिग, तेजस्वी के रूप में ढालने का प्रयास नहीं करते हैं।

हम यह तो चाहते हैं कि महर्षि दयानंद सरस्वती,स्वामी विवेकानंद जैसे बच्चे तो पैदा हो लेकिन उनके खुद के घर में पैदा न होकर दूसरे के घर में पैदा हों क्योंकि अपने घर में पैदा हो गया तो वंश नहीं चलेगा।

यह कैसी विचित्र बात है।इस प्रकार की मानसिकता को बदलने की आवश्यकता है।

(4.)दूसरा विरोधाभास ओर देखने को मिलता है कि जो लोग स्वयं शिक्षा-नीति,शिक्षण पद्धति,शिक्षण पाठ्यक्रम,शिक्षण संस्थाएं तथा शिक्षा के मानदण्ड तय करते हैं,बनाते हैं तथा चलाते हैं,वे ही इनकी आलोचना करते हैं।

इस प्रकार की मानसिकता से शिक्षा का ढर्रा कैसे बदला जा सकता है जबकि इसके कर्त्ता-धर्त्ता ही दोहरी मानसिकता रखते हैं।

(5.)तीसरा विरोधाभास यह देखने को मिलता है कि शिक्षा-संस्थान के कर्त्ता-धर्त्ता तो यह समझते हैं कि हमारा कर्त्तव्य पाठ्यक्रम को पूरा कराना है तथा सद्गुणों का विकास करना अभिभावकों व समाज का कार्य है।

दूसरी तरफ समाज,परिवार और अभिभावक यह समझते हैं कि बच्चा शिक्षकों की आज्ञा का पालन ज्यादा करता है व उनके चरित्र का ज्यादा प्रभाव पड़ता है और शिक्षा में पाठ्यक्रम के साथ उनके अन्य गुणों का विकास भी सम्मिलित है।।इस प्रकार एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालने से हम सबका ही नुकसान है।

2.वर्तमान में शिक्षा में क्या विरोधाभास है? (What are Controversy in Eduation Today?),को दूर करने का उपाय-

(1.)शिक्षा एक अकेले शिक्षा-संस्थान, परिवार,समाज, शिक्षा-संस्थान व मित्रों तथा अन्य महापुरुषों व संगठनों से अर्जित करता है। अतः इनका जैसा वातावरण व व्यवहार होगा बालक वैसी ही शिक्षा अर्जित करेगा। इसलिए प्रत्येक को अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करना चाहिए। एक-दूसरे पर जिम्मेदारी थोपने या उससे मुंह मोड़ना उचित नहीं है।

(2.) इसलिए जो लोग बच्चे और सम्पूर्ण समाज व देश का भविष्य उज्जवल देखना चाहते हैं, उन्हें अपने द्वारा दिए जा रहे शिक्षण व शिक्षा को उन्नत बनाना होगा। बच्चों के सामने हम स्वयं अपने आचरण से जैसा उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, उसके व्यक्तित्त्व को विकसित करने के लिए जितने सजग रहते हैं, उसमें अन्तर्निहित गुणों को उभारने में जितना प्रयास करते हैं उतना ही अच्छा व उचित होगा।यह सब शिक्षण के अंग है।

(3.)अतः प्रत्येक माता-पिता तथा प्रबुद्ध नागरिक को बच्चों में सुसंस्कार डालने का प्रयास करना चाहिए। बच्चों में श्रेष्ठ संस्कार डालना ही वास्तविक शिक्षण है।व्यक्ति निर्माण का जितना अधिक श्रेष्ठ वातावरण परिवार,समाज एवं शिक्षा संस्थान में होगा बालक का व्यक्तित्त्व उतना ही अधिक विकसित होता जाएगा तभी सुयोग्य नागरिकों की संख्या बढ़ेगी तथा बच्चों का भविष्य उज्जवल होगा।

इस आर्टिकल में हमने वर्तमान में शिक्षा में क्या विरोधाभास है? (What are Controversy in Eduation Today?) के बारे में अध्ययन किया तथा इस विरोधाभास को दूर करने के बारे में अध्ययन किया।

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how to recognize talent in children?

बालको की प्रतिभा को कैसे पहचाने? (how to recognize talent in children?)-

how to recognize talent in children?
how to recognize talent in children?
1.अक्सर हमारे दिमाग में यह प्रश्न उठता रहता है  कि बालकों में किस प्रकार की प्रतिभा है तथा उसको कैसे पहचाने ? बालक दिन- प्रतिदिन जो मैं जो भी क्रिया- प्रतिक्रिया तथा गतिविधियां करता है  उसके आधार पर हम उनकी प्रतिभा का पता लगा सकते हैं।
2.बालकों की प्रतिभा को पहचानने के लिए माता-पिता, अभिभावक तथा शिक्षकों का आपस में संवाद अर्थात् वार्तालाप होना आवश्यक है।
3.बालक कई प्रकार की रुचियां तथा जिज्ञासा प्रकट करता है उनमें से जिस कार्य की रुचि व जिज्ञासा बार-बार प्रकट करता है उसके आधार पर उनकी प्रतिभा को पहचाना जा सकता है। जैसे वह कोई खेल- खेलने के लिए बार-बार आग्रह करता है या नृत्य करने के लिए, अथवा गीत या भजन को सुनने के लिए बार-बार जिज्ञासा व रूचि प्रकट करता है तो उसको उस क्षेत्र में आगे  बढ़ाया जाना चाहिए। उस क्षेत्र में उसको बार-बार अवसर प्रदान करना चाहिए।
4.शिक्षकों से मिलकर यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि वह किस विषय में सबसे अधिक अंक उर्जित करता है तथा किस विषय में उसकी रुचि है।साथ ही विद्यालय में कई ऐसे कार्यक्रम आयोजित होते हैं जैसे वार्षिकोत्सव , गांधी जयंती इत्यादि के जो भी कार्यक्रम आयोजित होते हैं तो बालक उनमें से किस गतिविधि में  भाग लेने की रुचि व जिज्ञासा प्रकट करता है।
5. कुछ बालक अंतर्मुखी तथा कुछ बालक बहिर्मुखी होते हैं। जो बालक बहिर्मुखी होते हैं वे तो अपनी रुचि व जिज्ञासा प्रकट करते रहते हैं तथा उनकी चाल-चलन व व्यवहार से भी प्रकट हो जाता है कि ऐसे बालक में किस प्रकार की प्रतिभा है।परंतु अंतर्मुखी बालकों की प्रतिभा को पहचानना टेढ़ी खीर है।अंतर्मुखी बालकों की प्रतिभा को पहचानने के लिए एक कुशल गुरु की आवश्यकता होती है अर्थात् माता-पिता व शिक्षकों को मनोविज्ञान, व्यवहार शास्त्र तथा दर्शन का अच्छा ज्ञान होना आवश्यक है।
6.अंतर्मुखी बालक अपनी रुचि व जिज्ञासा प्रकट न करें और उनके चाल-चलन तथा व्यवहार से भी आपको उनकी प्रतिभा का पता नहीं चल पा रहा हो तो हमें उनके समक्ष अपनी तरफ से पहल करके पता लगाना चाहिए।जैसे आप उनसे किसी भजन को याद करके सुनने के लिए कह सकते हैं या उन्हें अपने साथ नृत्य करने के लिए कह सकते हैं। यदि उनमें प्रतिभा होगी तो वह सहर्ष तैयार हो जाएगा और उनके अंदर छुपी हुई प्रतिभा प्रकट हो जाएगी। नृत्य, खेल ,संगीत ,भजन इत्यादि में कोई प्रतिभा नहीं होती है तो पढ़ाई के विषय में उनकी प्रतिभा को ढूंढने का प्रयास करना चाहिए।जैसे गणित में उनकी प्रतिभा है या नहीं इसके लिए  घर पर कोई प्रश्न या टेस्ट लेकर परखा जा सकता है। उनको कोई प्रश्नावली समझा कर कुछ भी पूछ कर पता लगाया जा सकता है।एक- दो बार आप अपनी तरफ से पहल करें बाद में यदि बालक उस क्षेत्र में स्वयं अपनी इच्छा से कुछ भी करने के लिए रुचि जागृत करता है तो समझ ले कि बालक में उस क्षेत्र में प्रतिभा है। उस क्षेत्र विशेष का पता लगाकर धीरे-धीरे उसको प्रशिक्षित करें।आगे बढ़ाएं और उस क्षेत्र में नए-नए अवसर उनके सामने प्रस्तुत करें ताकि बालक उस में भाग ले सकें इस प्रकार उनकी प्रतिभा को निखारा जा सकता है।
7. याद रखिए आपकी बालक पर बहुत पैनी नजर रहनी चाहिए।वह किस प्रकार का खान-पान पसंद करता है किस प्रकार के मित्रों के साथ उठना -बैठना ,बातचीत करना ,घूमना ,फिरना पसंद करता है‌।‌‌ किस प्रकार के कार्यक्रम में मनोरंजन करना पसंद करता है।माता-पिता, अभिभावक, परिवार के  सदस्यों व संबंधियों तथा शिक्षकों से किस प्रकार का व्यवहार करता है। इन सब बातों को नोट करके बालक की प्रतिभा को पहचाना जा सकता है। बालक की प्रतिभा को पहचान कर उसको तराशने की आवश्यकता होती है अन्यथा वह प्रतिभा सुप्त  ही रह जाती है ।हमेशा बालक के साथ सकारात्मक व्यवहार करें जिससे वह अपनी रुचि व जिज्ञासा को आपके सामने प्रकट कर सके।
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How to provide quality education to child?

बालकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे उपलब्ध कराई जाए(How to provide quality education to child?)-

How to provide quality education to child?
How to provide quality education to child?
बालकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के( How to provide quality education to child?) लिए निम्नलिखित उपाय है-
1. वर्तमान समय में बालकों के रंग-ढंग ,चाल -चलन ,तौर- तरीके तथा कार्यप्रणाली को देखकर माता-पिता, अभिभावक, शिक्षकों तथा देश के प्रबुद्ध जन यह सोचने को विवश हो गए  हैं  कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे उपलब्ध कराई जाए ?अधिकांश स्कूलों में बालकों को व्याख्यान विधि द्वारा पढ़ाया व समझाया जाता है जो कि एक वैज्ञानिक विधि मानी जाती है । साथ ही आधुनिक युग में व्याख्यान विधि शिक्षा के लिए  उपयुक्त नहीं समझी जाती है।
2. मानव जीवन में शिक्षा एवं स्वास्थ्य दो ऐसी आवश्यकताएं है जो सरकारी स्तर पर निशुल्क उपलब्ध कराई जाती है। आज हम शिक्षा को गुणवत्ता बनाए रखने की कुछ टिप्स बताएंगे जिससे शिक्षा के स्तर में सुधार करना संभव है।
3. शिक्षक पुराने व परंपरागत तरीके से ही शिक्षण उपलब्ध कराते हैं अतः शिक्षकों को समय-समय पर रिफ्रेशर कोर्स कराया जाए तथा रिफ्रेशर कोर्स में उन्हें नवीन तकनीकी की जानकारी दी जानी चाहिए । शिक्षकों को लीडरशिप के गुर  सिखाएं जाए तथा उन्हें बताया जाए कि अपने शिक्षण के द्वारा बच्चों के सामने नई पहल करें । बच्चे पहेलियों, संगीत, मॉडल्स तथा खेल- खिलौने में रुचि रखते हैं। इसलिए उन्हें पहेलियों , संगीत, मॉडल्स तथा खेल -खिलौनों के माध्यम से शिक्षा प्रदान की जाए ।अर्थात अपने शिक्षण में इनका प्रयोग करें।
4. शिक्षकों को प्रशिक्षित करने से शिक्षा संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ेगी। शिक्षकों को तकनीकी व नई - नई जानकारियां उपलब्ध कराई जाएगी तो वह  अप टू डेट रहेंगे।
5.समाज के हर वर्ग के लोगों को  गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए नवीन तकनीकी की जानकारी और उसका इस्तेमाल किया जाना आवश्यक है ।इसके लिए शिक्षक-अभिभावक बैठक आयोजित की जानी चाहिए।अभिभावकों को बताया जाए कि बच्चों पर सतत निगरानी रखना उनका कर्त्तव्य है ।केवल शिक्षा संस्थानों पर जिम्मेदारी डाल कर अपने कर्तव्य से विमुख ना हो।
6.अभिभावकों का कर्तव्य है कि शिक्षकों के साथ-साथ अपने बच्चों को समय दें।शिक्षा संस्थान और पाठ्यक्रम से संबंधित वार्तालाप करें और उसके उपरांत नियमित रूप से विद्यालय में शिक्षकों से मिले और अपने बच्चे की प्रगति रिपोर्ट जांच पर चर्चा करें
7.जब शिक्षा संस्थान, शिक्षक और अभिभावक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ-साथ आधारभूत एवं मूलभूत संरचना उपलब्ध कराने के लिए प्रयास करेंगे तो बालकों में निश्चित रूप से परिवर्तन लाया जा सकेगा
8.यहां यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से क्या तात्पर्य है? गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में चारित्रिक शिक्षा ,व्यवहारिक शिक्षा  शामिल है। ऐसी शिक्षा बालकों को व्यवहारिक जीवन में आने वाली वास्तविक कठिनाइयों से तो परिचित कराती ही है साथ ही उन कठिनाइयों तथा समस्याओं को मुकाबला और समाधान करना सिखाती है।

9.वर्तमान में युवा वर्ग डिग्री हासिल करके जब जीवन क्षेत्र में उतरना है तो जीवन की वास्तविक घटनाओं से मुकाबला होते ही भाग खड़ा होता है। उसे इन कठिनाइयों से मुकाबला करना सिखाया नहीं जाता है।ऐसा इसलिए होता है क्योंकि माता-पिता ,अभिभावक नहीं चाहते हैं कि बच्चे खतरों का सामना करें ।यह स्वभाविक भी है परंतु खतरो का सामना करना आवश्यक भी है। अतः माता-पिता व अभिभावक ढाल बनकर न रहे बल्कि एक सहायक के रूप में रहे ।जैसे यदि बालक को तैरना सीखना है तो पानी में तो कूदना ही पड़ेगा ।लेकिन बालक जब डूबने लग जाए तब उसे पकड़ा जाए और डूबने से कैसे बचा जाता है यह बताया जाए। यदि हम केवल उसे तैरने की किताब पढ़ा कर उसे पानी में नहीं उतारेंगे अर्थात ढाल बनकर रहेंगे तो ऐसा बालक जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना नहीं कर पाएगा।केवल किताबी ज्ञान ही न देकर व्यवहारिक व क्रियात्मक ज्ञान भी दिया जाना चाहिए, जिससे बालक स्वयं समस्याओं का समाधान करना सीखें।
इस आर्टिकल में हमने बालकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे उपलब्ध कराई जाए? (How to provide quality education to child?) के बारे में सीखा।
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