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Is Eduation Pride of Man?

1.क्या शिक्षा व्यक्ति का गौरव है? का परिचय (Introduction to Is Eduation Pride of Man?)-

s Eduation Pride of Man?
Is Eduation Pride of Man?


क्या शिक्षा व्यक्ति का गौरव है? (Is Eduation Pride of Man?), इसके बारे में इस आर्टिकल में बताया गया है।

(1.)मनुष्य का मूल्यांकन विरासत में मिला हुआ धन, संपत्ति नहीं है और न ही सुंदरता है।मनुष्य की योग्यता व व्यक्तित्व शिक्षा, विद्या सद्बुद्धि, सद्ज्ञान,चरित्र और विवेक के आधार पर परखा जाता है।संसार में धनवान के बजाय शिक्षित व्यक्ति को ही वास्तविक रूप में धनी माना जाना चाहिए।

(2.)शिक्षा युवाओं का सहारा, धनवान का यश और प्रौढ़ व्यक्ति के सुख का साधन होता है।शिक्षा के आधार पर व्यक्ति विचारशील, एकाग्रचित्त और परिश्रमी बनता है। शिक्षा समृद्धि में आभूषण,कठिनाई में सहारा और प्रत्येक समय हमारे मनोरंजन का साधन है।इस प्रकार हमें शिक्षा और विद्या द्वारा अंतर्बोध होता है अर्थात् परमात्मा की अनुभूति होती है।

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(3.)युवाओं तथा प्रौढ़ व्यक्तियों का विद्या ही सच्ची मित्र और अविद्या से बढ़कर कोई शत्रु नहीं है।विद्या तथा शिक्षा से मनुष्य सम्मान प्राप्त करता है। अविद्या तथा अज्ञान के कारण ही असफलता प्राप्त होती है।मनुष्य धन-संपत्ति और जमीन जायदाद के कारण नहीं बल्कि विशेष ज्ञान,शिक्षा और विशेष अध्ययन के कारण ही आगे बढ़ता है। 

(4.)शिक्षा और विद्या का इतना अधिक महत्त्व होने के बावजूद शिक्षा और विद्या अर्जित करना और कराना दोनों ही कार्य कठिन है।कठिन कार्य इसलिए है कि शिक्षा और विद्या का अध्यापन कराने की योग्यता वही मनुष्य रखता है जो अपने चरित्र को उज्जवल व पवित्र रखता है अर्थात् आचरणयुक्त मनुष्य ही पात्रता रखता है और ऐसे मनुष्य बहुत कम विद्यमान है।ऐसा मनुष्य अपने विद्यार्थियों को तत्व-विद्या अर्थात् ऐसी विद्या जो मनुष्य को श्रेष्ठ बनाती है और उच्च स्तर पर पहुंचाती है,का ज्ञान कराने की क्षमता रखता है।

2.क्या शिक्षा मनुष्य का गौरव है?(Is Eduation Pride of Man?),शिक्षा व्यक्ति का आभूषण (Education Jewelry of Man)-

(5.)आधुनिक शिक्षा में ऐसा सामर्थ्य नहीं है जो विद्यार्थियों में चरित्र निर्माण ,कर्मठता, उत्साह,संयम और सात्त्विकता को जागृत कर सके क्योंकि वर्तमान समय में ऐसे अध्यापकों का अभाव है जिनमें उपर्युक्त गुण विद्यमान हों।जब अध्यापकों में ही वास्तविक शिक्षा व विद्या का अभाव है तो विद्यार्थियों के उद्धार के लिए जिस शिक्षा की आवश्यकता है उसका बीजारोपण कैसे सम्भव है?

(6.) आधुनिक शिक्षा में ऐसे समर्पित अध्यापकों का अभाव तो है ही साथ ही वर्तमान शिक्षा से जो विद्यार्थी डिग्री लेकर निकलते हैं उनमें से अधिकांश विद्यार्थियों में छल-कपट, चोरी, बेईमानी, दुश्चरित्रता, फैशनपरस्ती, विलासिता, अहंकार ,द्वेष,धूर्तता पाई जाती है।वास्तविक रूप में ऐसी विद्या या शिक्षा न होकर अशिक्षा ही कही जा सकती है। सच्चे अर्थों में आज शिक्षा और विद्या का अभाव ही है जो विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता ,शराब, सिगरेट ,मारपीट, लूट-खसोट, हड़ताल करना, परीक्षा में नकल करना जैसे दुर्व्यसनों में फंसाती है।

(7.)जो विद्या (ज्ञान) मनुष्य को सही दिशा, विकास, उन्नति और जीवन की सच्चाईयों का दिग्दर्शन कराती है,अपनी अंतरात्मा का बोध कराती है उसे भौतिक तथा आध्यात्मिक विद्या कहते हैं।यदि मनुष्य का विवेक जागृत ना हो तो ऐसी विद्या पतन का कारण बन जाती है।गुण, कर्म और स्वभाव में सात्विकता नहीं आती हो तो ऐसी शिक्षा मनुष्य को पशुता के बराबर लाकर खड़ा कर देती है।इस प्रकार अध्यात्म विद्या जीवन के लिए परम उपयोगी है।

(8.)अध्यात्म विद्या से मनुष्य स्वयं का मित्र तो बनता है, आजीविका के योग्य होता है तथा उसका जीवन आनंद व सुख से व्यतीत होता है। परंतु अध्यात्म विद्या को सीखने के लिए अर्थात् जीने के लिए सच्ची लगन,उत्साह व जिज्ञासा की आवश्यकता है।सच्चे अर्थों में जब हमें ज्ञान की प्यास होने लगे तभी समझना चाहिए कि हम सही दिशा में बढ़ रहे हैं।जो व्यक्ति सांसारिक कर्तव्यों का निर्वाह करने की शिक्षा व अध्यात्म-विद्या अर्जित कर लेता है तो वही मनुष्य का वास्तविक आभूषण है।

इस प्रकार उपर्युक्त विवरण में हमने क्या शिक्षा व्यक्ति का गौरव है? (Is Eduation Pride of Man?) को जानने का प्रयास किया है।

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What are Controversy in Eduation Today?

1.वर्तमान में शिक्षा में क्या विरोधाभास है? (What are Controversy in Eduation Today?)-

वर्तमान में शिक्षा में क्या विरोधाभास है? (What are Controversy in Eduation Today?), इसके बारे में इस आर्टिकल में बताया गया है।

(1.)हर व्यक्ति यही कहता है कि बच्चे देश का भविष्य हैं। परन्तु यह जानते समझते हुए भी वह बच्चों के उज्जवल चरित्र और भविष्य को श्रेष्ठ व उन्नत करने में रूचि लेता दिखाई नहीं देता है अर्थात् कथनी व करनी में अन्तर है।

(2.) दरअसल बालक देश का भविष्य हैं इसमें आधुनिक भारत के व्यक्तियों की यह सोच है कि बालक बड़ा होकर नौकरियों के लिए प्रतियोगिता में पड़ना,ऊंचा पद,ऊंचे वेतन और अधिकाधिक पैसा पाना ही अपने जीवन का लक्ष्य माने वही शिक्षा है जबकि शिक्षा व्यक्ति के गरिमा,व्यक्तित्त्व व आचरण से जुड़ती है।जैसी प्रेरणा देने वाली शिक्षा पद्धति होगी वैसी ही प्रवृत्ति के विकास को उस समाज में गौरवान्वित किया जाएगा।

यही कारण है कि वर्तमान भारतीय समाज में यही बात गौरवास्पद समझी जाती है कि उसका बच्चा ऊंचा पद तथा इतना पैसा कमाए जिससे कि उनका यश फैले और बच्चा यशस्वी हो जाए।इस प्रकार बच्चों और युवाओं के लिए यश प्राप्ति का मापदण्ड ऊंचा पद, नौकरी और पैसा अर्थात् कोई बड़ा व्यवसाय करना माना जाता है अथवा जोड़-तोड़ बैठाने में माहिर होकर कोई नेता बने।

(3.)हम बालकों को सच्चरित्र,कर्मठ, आस्थावान, संघर्षशील तथा आदर्शों के लिए अडिग, तेजस्वी के रूप में ढालने का प्रयास नहीं करते हैं।

हम यह तो चाहते हैं कि महर्षि दयानंद सरस्वती,स्वामी विवेकानंद जैसे बच्चे तो पैदा हो लेकिन उनके खुद के घर में पैदा न होकर दूसरे के घर में पैदा हों क्योंकि अपने घर में पैदा हो गया तो वंश नहीं चलेगा।

यह कैसी विचित्र बात है।इस प्रकार की मानसिकता को बदलने की आवश्यकता है।

(4.)दूसरा विरोधाभास ओर देखने को मिलता है कि जो लोग स्वयं शिक्षा-नीति,शिक्षण पद्धति,शिक्षण पाठ्यक्रम,शिक्षण संस्थाएं तथा शिक्षा के मानदण्ड तय करते हैं,बनाते हैं तथा चलाते हैं,वे ही इनकी आलोचना करते हैं।

इस प्रकार की मानसिकता से शिक्षा का ढर्रा कैसे बदला जा सकता है जबकि इसके कर्त्ता-धर्त्ता ही दोहरी मानसिकता रखते हैं।

(5.)तीसरा विरोधाभास यह देखने को मिलता है कि शिक्षा-संस्थान के कर्त्ता-धर्त्ता तो यह समझते हैं कि हमारा कर्त्तव्य पाठ्यक्रम को पूरा कराना है तथा सद्गुणों का विकास करना अभिभावकों व समाज का कार्य है।

दूसरी तरफ समाज,परिवार और अभिभावक यह समझते हैं कि बच्चा शिक्षकों की आज्ञा का पालन ज्यादा करता है व उनके चरित्र का ज्यादा प्रभाव पड़ता है और शिक्षा में पाठ्यक्रम के साथ उनके अन्य गुणों का विकास भी सम्मिलित है।।इस प्रकार एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालने से हम सबका ही नुकसान है।

2.वर्तमान में शिक्षा में क्या विरोधाभास है? (What are Controversy in Eduation Today?),को दूर करने का उपाय-

(1.)शिक्षा एक अकेले शिक्षा-संस्थान, परिवार,समाज, शिक्षा-संस्थान व मित्रों तथा अन्य महापुरुषों व संगठनों से अर्जित करता है। अतः इनका जैसा वातावरण व व्यवहार होगा बालक वैसी ही शिक्षा अर्जित करेगा। इसलिए प्रत्येक को अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करना चाहिए। एक-दूसरे पर जिम्मेदारी थोपने या उससे मुंह मोड़ना उचित नहीं है।

(2.) इसलिए जो लोग बच्चे और सम्पूर्ण समाज व देश का भविष्य उज्जवल देखना चाहते हैं, उन्हें अपने द्वारा दिए जा रहे शिक्षण व शिक्षा को उन्नत बनाना होगा। बच्चों के सामने हम स्वयं अपने आचरण से जैसा उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, उसके व्यक्तित्त्व को विकसित करने के लिए जितने सजग रहते हैं, उसमें अन्तर्निहित गुणों को उभारने में जितना प्रयास करते हैं उतना ही अच्छा व उचित होगा।यह सब शिक्षण के अंग है।

(3.)अतः प्रत्येक माता-पिता तथा प्रबुद्ध नागरिक को बच्चों में सुसंस्कार डालने का प्रयास करना चाहिए। बच्चों में श्रेष्ठ संस्कार डालना ही वास्तविक शिक्षण है।व्यक्ति निर्माण का जितना अधिक श्रेष्ठ वातावरण परिवार,समाज एवं शिक्षा संस्थान में होगा बालक का व्यक्तित्त्व उतना ही अधिक विकसित होता जाएगा तभी सुयोग्य नागरिकों की संख्या बढ़ेगी तथा बच्चों का भविष्य उज्जवल होगा।

इस आर्टिकल में हमने वर्तमान में शिक्षा में क्या विरोधाभास है? (What are Controversy in Eduation Today?) के बारे में अध्ययन किया तथा इस विरोधाभास को दूर करने के बारे में अध्ययन किया।

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how to recognize talent in children?

बालको की प्रतिभा को कैसे पहचाने? (how to recognize talent in children?)-

how to recognize talent in children?
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1.अक्सर हमारे दिमाग में यह प्रश्न उठता रहता है  कि बालकों में किस प्रकार की प्रतिभा है तथा उसको कैसे पहचाने ? बालक दिन- प्रतिदिन जो मैं जो भी क्रिया- प्रतिक्रिया तथा गतिविधियां करता है  उसके आधार पर हम उनकी प्रतिभा का पता लगा सकते हैं।
2.बालकों की प्रतिभा को पहचानने के लिए माता-पिता, अभिभावक तथा शिक्षकों का आपस में संवाद अर्थात् वार्तालाप होना आवश्यक है।
3.बालक कई प्रकार की रुचियां तथा जिज्ञासा प्रकट करता है उनमें से जिस कार्य की रुचि व जिज्ञासा बार-बार प्रकट करता है उसके आधार पर उनकी प्रतिभा को पहचाना जा सकता है। जैसे वह कोई खेल- खेलने के लिए बार-बार आग्रह करता है या नृत्य करने के लिए, अथवा गीत या भजन को सुनने के लिए बार-बार जिज्ञासा व रूचि प्रकट करता है तो उसको उस क्षेत्र में आगे  बढ़ाया जाना चाहिए। उस क्षेत्र में उसको बार-बार अवसर प्रदान करना चाहिए।
4.शिक्षकों से मिलकर यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि वह किस विषय में सबसे अधिक अंक उर्जित करता है तथा किस विषय में उसकी रुचि है।साथ ही विद्यालय में कई ऐसे कार्यक्रम आयोजित होते हैं जैसे वार्षिकोत्सव , गांधी जयंती इत्यादि के जो भी कार्यक्रम आयोजित होते हैं तो बालक उनमें से किस गतिविधि में  भाग लेने की रुचि व जिज्ञासा प्रकट करता है।
5. कुछ बालक अंतर्मुखी तथा कुछ बालक बहिर्मुखी होते हैं। जो बालक बहिर्मुखी होते हैं वे तो अपनी रुचि व जिज्ञासा प्रकट करते रहते हैं तथा उनकी चाल-चलन व व्यवहार से भी प्रकट हो जाता है कि ऐसे बालक में किस प्रकार की प्रतिभा है।परंतु अंतर्मुखी बालकों की प्रतिभा को पहचानना टेढ़ी खीर है।अंतर्मुखी बालकों की प्रतिभा को पहचानने के लिए एक कुशल गुरु की आवश्यकता होती है अर्थात् माता-पिता व शिक्षकों को मनोविज्ञान, व्यवहार शास्त्र तथा दर्शन का अच्छा ज्ञान होना आवश्यक है।
6.अंतर्मुखी बालक अपनी रुचि व जिज्ञासा प्रकट न करें और उनके चाल-चलन तथा व्यवहार से भी आपको उनकी प्रतिभा का पता नहीं चल पा रहा हो तो हमें उनके समक्ष अपनी तरफ से पहल करके पता लगाना चाहिए।जैसे आप उनसे किसी भजन को याद करके सुनने के लिए कह सकते हैं या उन्हें अपने साथ नृत्य करने के लिए कह सकते हैं। यदि उनमें प्रतिभा होगी तो वह सहर्ष तैयार हो जाएगा और उनके अंदर छुपी हुई प्रतिभा प्रकट हो जाएगी। नृत्य, खेल ,संगीत ,भजन इत्यादि में कोई प्रतिभा नहीं होती है तो पढ़ाई के विषय में उनकी प्रतिभा को ढूंढने का प्रयास करना चाहिए।जैसे गणित में उनकी प्रतिभा है या नहीं इसके लिए  घर पर कोई प्रश्न या टेस्ट लेकर परखा जा सकता है। उनको कोई प्रश्नावली समझा कर कुछ भी पूछ कर पता लगाया जा सकता है।एक- दो बार आप अपनी तरफ से पहल करें बाद में यदि बालक उस क्षेत्र में स्वयं अपनी इच्छा से कुछ भी करने के लिए रुचि जागृत करता है तो समझ ले कि बालक में उस क्षेत्र में प्रतिभा है। उस क्षेत्र विशेष का पता लगाकर धीरे-धीरे उसको प्रशिक्षित करें।आगे बढ़ाएं और उस क्षेत्र में नए-नए अवसर उनके सामने प्रस्तुत करें ताकि बालक उस में भाग ले सकें इस प्रकार उनकी प्रतिभा को निखारा जा सकता है।
7. याद रखिए आपकी बालक पर बहुत पैनी नजर रहनी चाहिए।वह किस प्रकार का खान-पान पसंद करता है किस प्रकार के मित्रों के साथ उठना -बैठना ,बातचीत करना ,घूमना ,फिरना पसंद करता है‌।‌‌ किस प्रकार के कार्यक्रम में मनोरंजन करना पसंद करता है।माता-पिता, अभिभावक, परिवार के  सदस्यों व संबंधियों तथा शिक्षकों से किस प्रकार का व्यवहार करता है। इन सब बातों को नोट करके बालक की प्रतिभा को पहचाना जा सकता है। बालक की प्रतिभा को पहचान कर उसको तराशने की आवश्यकता होती है अन्यथा वह प्रतिभा सुप्त  ही रह जाती है ।हमेशा बालक के साथ सकारात्मक व्यवहार करें जिससे वह अपनी रुचि व जिज्ञासा को आपके सामने प्रकट कर सके।
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How to provide quality education to child?

बालकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे उपलब्ध कराई जाए(How to provide quality education to child?)-

How to provide quality education to child?
How to provide quality education to child?
बालकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के( How to provide quality education to child?) लिए निम्नलिखित उपाय है-
1. वर्तमान समय में बालकों के रंग-ढंग ,चाल -चलन ,तौर- तरीके तथा कार्यप्रणाली को देखकर माता-पिता, अभिभावक, शिक्षकों तथा देश के प्रबुद्ध जन यह सोचने को विवश हो गए  हैं  कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे उपलब्ध कराई जाए ?अधिकांश स्कूलों में बालकों को व्याख्यान विधि द्वारा पढ़ाया व समझाया जाता है जो कि एक वैज्ञानिक विधि मानी जाती है । साथ ही आधुनिक युग में व्याख्यान विधि शिक्षा के लिए  उपयुक्त नहीं समझी जाती है।
2. मानव जीवन में शिक्षा एवं स्वास्थ्य दो ऐसी आवश्यकताएं है जो सरकारी स्तर पर निशुल्क उपलब्ध कराई जाती है। आज हम शिक्षा को गुणवत्ता बनाए रखने की कुछ टिप्स बताएंगे जिससे शिक्षा के स्तर में सुधार करना संभव है।
3. शिक्षक पुराने व परंपरागत तरीके से ही शिक्षण उपलब्ध कराते हैं अतः शिक्षकों को समय-समय पर रिफ्रेशर कोर्स कराया जाए तथा रिफ्रेशर कोर्स में उन्हें नवीन तकनीकी की जानकारी दी जानी चाहिए । शिक्षकों को लीडरशिप के गुर  सिखाएं जाए तथा उन्हें बताया जाए कि अपने शिक्षण के द्वारा बच्चों के सामने नई पहल करें । बच्चे पहेलियों, संगीत, मॉडल्स तथा खेल- खिलौने में रुचि रखते हैं। इसलिए उन्हें पहेलियों , संगीत, मॉडल्स तथा खेल -खिलौनों के माध्यम से शिक्षा प्रदान की जाए ।अर्थात अपने शिक्षण में इनका प्रयोग करें।
4. शिक्षकों को प्रशिक्षित करने से शिक्षा संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ेगी। शिक्षकों को तकनीकी व नई - नई जानकारियां उपलब्ध कराई जाएगी तो वह  अप टू डेट रहेंगे।
5.समाज के हर वर्ग के लोगों को  गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए नवीन तकनीकी की जानकारी और उसका इस्तेमाल किया जाना आवश्यक है ।इसके लिए शिक्षक-अभिभावक बैठक आयोजित की जानी चाहिए।अभिभावकों को बताया जाए कि बच्चों पर सतत निगरानी रखना उनका कर्त्तव्य है ।केवल शिक्षा संस्थानों पर जिम्मेदारी डाल कर अपने कर्तव्य से विमुख ना हो।
6.अभिभावकों का कर्तव्य है कि शिक्षकों के साथ-साथ अपने बच्चों को समय दें।शिक्षा संस्थान और पाठ्यक्रम से संबंधित वार्तालाप करें और उसके उपरांत नियमित रूप से विद्यालय में शिक्षकों से मिले और अपने बच्चे की प्रगति रिपोर्ट जांच पर चर्चा करें
7.जब शिक्षा संस्थान, शिक्षक और अभिभावक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ-साथ आधारभूत एवं मूलभूत संरचना उपलब्ध कराने के लिए प्रयास करेंगे तो बालकों में निश्चित रूप से परिवर्तन लाया जा सकेगा
8.यहां यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से क्या तात्पर्य है? गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में चारित्रिक शिक्षा ,व्यवहारिक शिक्षा  शामिल है। ऐसी शिक्षा बालकों को व्यवहारिक जीवन में आने वाली वास्तविक कठिनाइयों से तो परिचित कराती ही है साथ ही उन कठिनाइयों तथा समस्याओं को मुकाबला और समाधान करना सिखाती है।

9.वर्तमान में युवा वर्ग डिग्री हासिल करके जब जीवन क्षेत्र में उतरना है तो जीवन की वास्तविक घटनाओं से मुकाबला होते ही भाग खड़ा होता है। उसे इन कठिनाइयों से मुकाबला करना सिखाया नहीं जाता है।ऐसा इसलिए होता है क्योंकि माता-पिता ,अभिभावक नहीं चाहते हैं कि बच्चे खतरों का सामना करें ।यह स्वभाविक भी है परंतु खतरो का सामना करना आवश्यक भी है। अतः माता-पिता व अभिभावक ढाल बनकर न रहे बल्कि एक सहायक के रूप में रहे ।जैसे यदि बालक को तैरना सीखना है तो पानी में तो कूदना ही पड़ेगा ।लेकिन बालक जब डूबने लग जाए तब उसे पकड़ा जाए और डूबने से कैसे बचा जाता है यह बताया जाए। यदि हम केवल उसे तैरने की किताब पढ़ा कर उसे पानी में नहीं उतारेंगे अर्थात ढाल बनकर रहेंगे तो ऐसा बालक जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना नहीं कर पाएगा।केवल किताबी ज्ञान ही न देकर व्यवहारिक व क्रियात्मक ज्ञान भी दिया जाना चाहिए, जिससे बालक स्वयं समस्याओं का समाधान करना सीखें।
इस आर्टिकल में हमने बालकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे उपलब्ध कराई जाए? (How to provide quality education to child?) के बारे में सीखा।
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How to develop good qualities by education?

शिक्षा द्वारा सद्गुणों का विकास कैसे करें (How to develop good qualities by education?)-

How to develop good qualities by education?
How to develop good qualities by education?
इस आर्टिकल में शिक्षा द्वारा सद्गुणों का विकास कैसे करें (How to develop good qualities by education?) के बारे में बताया गया है।
1.आधुनिक युग में शिक्षा का संबंध रोजगार से जोड़कर देखा जाता है। रोजगार शिक्षा का एक अंग परंतु शिक्षा बहुत गहराई तथा व्यापक अर्थ वाला शब्द है। वर्तमान में जो शिक्षा दी जाती है वह केवल रोजगार प्रदान करने हेतु दी जाती है। शिक्षा के द्वारा विद्यार्थियों में सद्गुणों का विकास भी किया जाता है या की किया जा सकता है। इस वीडियो में कुछ सद्गुणों के विकास के बारे में बताया गया जैसे इ ईमानदारी, आत्मीयता व तेजस्विता इत्यादि हम सभी सद्गुणों का वर्णन नहीं बताएंगे क्योंकि वीडियो ज्यादा लंबा हो जाएगा।
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2.ईमानदारी (Honesty)-

सच्चाई, विश्वसनीयता , धन के लेनदेन व्यवहार में सच्चाई किसी को धोखा न देना , अपनी वस्तु स्थिति से ज्यादा प्रशंसा न करना, छल कपट का सहारा न लेना , कथनी और करनी में अंतर न आने देना इत्यादि को जीवन में अपना और इनके अनुसार व्यवहार करना इ ईमानदारी का पालन करना है बेईमानी को अपने विचारों और कार्यों में समावेश न होने देना । अनीति न करना न    कराना और न उसका समर्थन करना।

3.आत्मीयता (Affinity)-

प्रज्ञावान समषटी का अपने आपको अंग मानना सभी व्यक्तियों को इस प्रज्ञावान समषटी का अंग मानकर भेद से ऊपर उठकर विशाल ह्रदय का प्रमाण देना। संकीर्ण मनोवृति न रखना । सहयोग लेने देने की प्रवृत्ति का विकास करना । मिलजुल कर रहने ,मिल बांट कर खाना और साथ - साथ काम करने में प्रसन्नता अनुभव करना।
How to develop good qualities by education?
How to develop good qualities by education?
4.तेजस्विता (Spiritedness)-
कठिनाइयों, अड़चनों को पार करते हुए    साहसपूर्वक लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करना ।आदर्शो को अपनाना , मनोविकारों को हटाना, कठिनाइयों में अविचलित रहना। कुर्तियों , अनीतियों का प्रतिरोध कर उनको हटाने का कार्य करना । सन्मार्ग पर चलते हुए मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का सामना करना।

5.सदाचार का पालन करना (Abide by virtue)-

जैसा कि हमने बताया शिक्षा एक ऐसा विषय है जो बहुत व्यापक और गहराई का अर्थ लिए हुए हैं । शिक्षा के अंदर समस्त जीवन सम्मिलित हो जाता है । शिक्षा के द्वारा हमारा परिवर्तन होकर जीवन में समग्रता का समावेश होता है । सदाचार से तात्पर्य है कि जो भी सद्गुण है जैसे इमानदारी ,आत्मीयता ,तेजस्विता सत्य बोलना ,चोरी ना करना, ब्रह्मचर्य ,अहिंसा ,संतोष ,स्वाध्याय इत्यादि को पुस्तकों में पढ़ लेना ,वीडियो देख लेना या अन्य कई से ग्रहण करके जीवन में , व्यवहार में पालन करना शास्त्रों में धर्म,कर्म, नीति तथा व्यवहार के बारे में वर्णन किया गया है। हम उन्हें पढ़ लेते हैं तथा याद भी कर लेते हैं परंतु जब तक हम उस पर अमल नहीं करें , जीवन में नहीं उतारे तो वह विद्या हमारे किसी काम की नहीं है। जिस प्रकार बकरी के गले में थन लटके हुए हो तो उनसे दूध नहीं निकलता है। इसी प्रकार पुस्तकों, वीडियो इत्यादि को पढ़ - सुनकर उसको आचरण में न उतारें तो वह भी हमारे लिए किसी काम की नहीं है। अतः विद्या का अभ्यास करना आवश्यक है बिना अभ्यास के शिक्षा (विद्या) विष हो जाती है।

यहां अभ्यास से तात्पर्य है कि विद्या का उपयोग करना अर्थात् विद्या को खर्च करना , बांटना । विद्या एक ऐसा धन है जो खर्च करने से बढ़ती है तथा धन खर्च करने से घटता है। वस्तुतः आज के युग में बालकों को पुस्तक को पढ़कर   कंठाग्र करने पर जोर दिया जाता है ऐसी पुस्तक की  विद्या जीवन में काम नहीं देती।  इसलिए किसी सद्गुण व विद्या को अपने आचरण में उतारना चाहिए । सब बाते कंठाग्र   भी होनी चाहिए और उनको व्यवहार में अथवा उपयोग में लाने का कौशल भी जानना चाहिए । पुस्तक की विद्या और पराए हाथ का धन कार्य पड़ने पर उपयोग में नहीं आता । न वह विद्या है और वह धन है।
सारांश यह है कि किसी भी सद्गुण को शिक्षा के द्वारा अर्जित करने पर न तो उसका चोर  चुरा सकता है और ना ही कोई बंटा सकता है और ना इसका भार हैं।अतः शिक्षा सभी धनो में श्रेष्ठ है यदि इसको आचरण में लाया जाए ।सभी सद्गुण का महत्व भी तभी है जब हम उसको आचरण में उतारेऔर यह शिक्षा के द्वारा संभव है।
इस प्रकार इस आर्टिकल में बताए गए टिप्स के आधार पर शिक्षा द्वारा सद्गुणों का विकास कैसे करें (How to develop good qualities by education?) जान सकते हैं।
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What are conditions to get education?

1.शिक्षा प्राप्त करने की क्या शर्ते हैं?(What are conditions to get education?):-

What are conditions to get education?
What are conditions to get education?
(1.) गुरुदेव रविंद्रनाथ के अनुसार सच्ची शिक्षा प्रकृति के सानिध्य से प्राप्त होती है। वह किसी पाठ्य पुस्तक से नहीं मिलती है ।उन्होंने पाठ्यपुस्तक की शिक्षा को मूल रूप से त्याग दिया था । वे मानते थे कि सच्ची शिक्षा  पुस्तक रटने से प्राप्त नहीं हो सकती है । वह मिलती है सृजनात्मक कार्य करने से, अपनी मातृभाषा के माध्यम से , वह एकमात्र माध्यम जो व्यक्ति को सारे समाज के साथ आदान प्रदान करा सकती है और प्रकृति के सानिध्य से उसका एक अविछिन्न अंग बन जाने से। उन्होंने पूरा पूरा जान लिया था,
 समझ लिया था कि अंग्रेजी शिक्षा में इन तत्वों को न केवल अनदेखा कर दिया था बल्कि इन्हें शिक्षा के दायरे से जड़ मूल से निकाल दिया था।
(2.) हमारी प्राचीन शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानसाधना था। ज्ञान शब्द का तात्पर्य था जानकारी, बौद्ध और विवेक यहां तक कि अहंकार को समाप्त करना और विनय जैसे गुणों के विकास से था। विद्यार्थी केवल शास्त्रों का शिक्षण ही प्राप्त नहीं करता था बल्कि व्यावहारिक शिक्षा भी प्राप्त करता था।
(3.)शिक्षा की योजना बहुत सोच समझकर बनानी पड़ती है। उसका आधार दो  बातों पर रहना चाहिए । पहली मानव समाज के जो आदर्श तैयार हुए हैं , शिक्षा का उद्देश्य हो कि उसके द्वारा व्यक्ति उन आदर्शों की तरफ बढ़ता रहे। मानव संस्कृति को जो "पैटर्न" करना चाहता है, शिक्षा उस पेटर्न का निर्माण करें । दूसरा आधार होगा , व्यक्ति और समाज  का गुणधर्म यानी आदर्श चाहे कितना भी ऊंचा क्यों ना हो, शिक्षा का तरीका इस गुण धर्म को सामने रखते हुए बनेगा। व्यक्ति के गुण धर्म को भूलकर अगर शिक्षा की योजना बनेगी तो वह व्यवहारिक नहीं होगी। इसका कारण यह है कि जिसे ढालना है, उसे उसके गुण धर्म के आधार पर डाला जा सकता है। कोई मूर्ति बनानी होती है तो पहले जिस माध्यम से बनानी है, उसके चरित्र को समझना पड़ता है ।जैसे लकड़ी की होगी तो खुदाई द्वारा और कांसे की होगी तो वह ढलायी द्वारा बनेगी। इसी प्रकार शिक्षा की योजना सामाजिक और सांस्कृतिक आदर्श और मनुष्य स्वभाव दोनों के मिलान से ही बननी चाहिए।
(4.)जब से शिक्षा की योजना सोच समझकर बनने लगी, तभी से ऋषियों को और चिंतकों ने शिक्षा के विषय को उनके द्वारा होने वाले विकास के बारे में अच्छी तरह सोच कर ही रखा। गणित सिखाने का अर्थ यह नहीं है कि उससे व्यवहारिक जीवन में लाभ हो क्योंकि अधिकतर लोगों के व्यवहारिक जीवन में उच्च गणित के सिद्धांतों से कोई मतलब नहीं पड़ता है,फिर भी उसे अच्छे शिक्षण का आवश्यक अंग माना गया है। इसका कारण है गणित की शिक्षा से एक विशेष मानसिक विकास होता है जो किसी अन्य विषय के सिखाने से नहीं होता। किंतु अगर गणित सिखाने पर भी उसका यह लाभ न हो तो उसे शिक्षा में स्थान देने का कोई अर्थ नहीं होता। इसलिए शिक्षक को अपने विषय के व्यवहारिक और चारित्रिक दोनों पहलुओं के बारे में खूब गहराई से चिंतन करना चाहिए।
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2. विद्या तथा शिक्षा(Knowledge and education)-

एक तो वह जो आंतरिक बोध     (इंट्यूशन)  के द्वारा सर्जन है। दूसरी वह होती है जिसकी सर्जनात्मक बुद्धि प्रदान होती है । आंतरिक बोध वाली विद्या सिखायी नहीं जा सकती, पर उसे सर्जनात्मक का थोड़ा-बहुत ज्ञान व्यक्ति को जरूर सिखाया जा सकता है जिसका आधार बौद्धिक होता है।

3. शिक्षक की सफलता का रहस्य (Secret of teacher success):-

दो तीन बातें हैं जो सच्चा शिक्षक होने के लिए आवश्यक है। पहली तो यह कि शिक्षक का काम है कि वह वातावरण का निर्माण करें। बालक किसी पद्धति से उतना नहीं सीखते जितना वातावरण से सीखते हैं ।अनुकूल वातावरण प्रेरणादायक होता है, इसलिए शिक्षक का काम है वातावरण तैयार करना।
दूसरी बात है कि शिक्षक बालक की आवश्यकताओं को समझे। उसे बालक के व्यक्तित्व से परिचय हो, हर बालक को व्यक्तिगत तौर पर समझे और वह बाल मनोविज्ञान से परिचित हो। किताबों में जो बाल मनोविज्ञान पढ़ाया जाता है उस से मतलब नहीं। वह कोई अनावश्यक वस्तु है ऐसा अर्थ नहीं है बल्कि सच्चा मनोविज्ञान तो बालक के साथ सीधे संबंध से आता है।

और तीसरी बात जो सबसे अधिक गहरी है, वह है शिक्षक और विद्यार्थी का संबंध। यह शिक्षक और विद्यार्थी का संबंधित स्कूल या क्लासरूम का संबंध नहीं होना चाहिए। यह तो  'चेतन' का 'चेतन' के साथ संबंध होगा। बालक एक चेतन है और शिक्षक भी एक चेतन ।यह संबंध किसी टेक्निकल स्तर का नहीं होता यह संबंध होता उससे परे का संबंध , जहां मानव  का मानव से संबंध होता है, जहां ह्रदय  का ह्रदय के साथ योग होता है।
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what is difference teacher and preceptor?

शिक्षक तथा गुरु में क्या अंतर है ?(what is difference teacher and preceptor?):-

what is difference teacher and preceptor?
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1. हम शिक्षा पद्धति पर आक्षेप लगाते हैं कि वर्तमान शिक्षा पद्धति दोषपूर्ण है। परंतु वस्तुतः क्या एकमात्र कारण शिक्षा पद्धति का दोष होना ही है शिक्षा पद्धति कोई सजीव तंत्र नहीं है कि पूर्णतया उसे ही दोषी ठहराया जा सके यह ठीक है कि वर्तमान परिपेक्ष्य मैं शिक्षा पद्धति के अनुसार ही शिक्षकों को पढ़ाना पड़ता है ।परंतु वस्तुतः उसमें कई भी रास्ते हैं उसके आधार पर हम शिक्षा को उपयोगिता पूर्ण एवं महत्वपूर्ण बना सकते हैं ।उपयोगिता एवं महत्व शिक्षा तंत्र को स्थायित्व प्रदान करती है ।
2. शिक्षण पद्धति को सक्रिय करना ,उसमें जीवन डालना शिक्षकों एवं शिक्षा संस्थानों के संचालकों का कार्य है।यदि शिक्षा में उपयोगिता की कमी एवं  महत्व नहीं होगा तो उसके लिए हम ही जिम्मेदार होंगे। माता-पिता अभिभावक भी इतनी महंगी शिक्षा,अपना पेट काटकर बच्चों को उपलब्ध करवाते हैं तो अवश्य चिंतन करते हैं कि बालकों का विकास हुआ है अथवा नहीं।यदि कोई कमी रहती है तो उसका दोष शिक्षकों पर ही डाला जाता है।
तात्पर्य यह है कि उस कमी को अध्यापकों की उपेक्षा या अयोग्यता ही मानते हैं ऐसी स्थिति में शिक्षकों को छात्र/छात्राओ  की गहरी श्रद्धा से वंचित होना पड़ता है और शिक्षकों में गुरु की गरिमा का भाग नहीं जागता है। केवल पाठ्यक्रम पूर्ण करा देने से वह  गुरु  जैसे सम्मान के अधिकारी नहीं हो जाते हैं।
3. शिक्षा संस्थानों में बालक अनुशासन, सामूहिकता का लाभ ,सहयोग ,सभ्यता ,संस्कृति, विनम्रता सीखने के बजाय उच्छृंखल  ,अनुशासनहीनता, उदंड , अहंकारी,अभिमानी होता जा रहा है तो इसका तात्पर्य यह है कि शिक्षा संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध नहीं हो रही है। पत्राचार विश्वविद्यालय,खुले विश्वविद्यालय तथा निजी स्तर पर बालकों को पढ़ाने‌ अर्थात ‌ट्यूशन भेजने, प्राइवेट पढ़ाई जाने की प्रवृत्ति को एक कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का ना मिलना भी है ।इसलिए शिक्षा के प्रति ऐसी उपेक्षा और बगावत क्यों पनप रही है यह विचारणीय है ।असंतोष लंबे समय तक नहीं बना रह सकता ,उसका विकल्प उभरता है।

4. प्राचीन काल में गुरुकुल प्रणाली थी, संस्थाएं दान दक्षिणा से चलती थी। आवागमन, संचार के साधन नहीं थे। जीवन मितव्ययिता पूर्वक बिताना होता था ।निर्धन तथा अमीर व्यक्तियों के बालकों को समान सुविधाएं थी। सबको मिलजुल ही रहना होता था। बालक एशो आराम का जीवन व्यतीत नहीं कर पाते थे , विद्यार्थी काल तप, साधना में व्यतीत करना होता था । कष्ट और तपपूर्ण जीवन से ही बालकों के गुणों का विकास हो सकता है। इसलिए गुरु पद का दर्जा गुरुकुल के शिक्षकों को प्राप्त था और बालक उसी प्रकार का मान सम्मान व श्रद्धा रखते थे।
5.वर्तमान शिक्षा में अभिभावकों माता-पिता का रवैया भी ठीक नहीं है।यह ठीक है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव में माता-पिता अभिभावकों में असंतोष है ।परंतु शिक्षक यदि उज्जड व उपद्रवी बालकों को अभिभावक डांटने के बजाय उनका पक्ष लेते हैं जिससे बालक बिगड़ते ही हैं।
6. हालांकि वर्तमान समय में प्राचीन काल के बजाय परिस्थितियां बहुत बदल गई है ।परंतु बदली हुई परिस्थितियों में भी मूल सिद्धांत तो वही रखा जा सकता  है अशिक्षित बालकों को सुयोग्य बनाने हेतु प्रतिभा को  निखारने,चरित्रवान बनाने ,अनुशासित करने जैसे गुणों को अपने बलबूते पर को काफी हद तक विकसित करने से सफल हो सकता है। परंतु यह तभी संभव है जब शिक्षक का चयन सदगुण संपन्न होगा तभी शिक्षक सच्चे अर्थों में गुरु जैसे सम्मान पाने का अधिकारी होगा।
7. इस प्रकार शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करवाता है जबकि गुरु बालक का सर्वांगीण विकास करने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शिक्षक को गुरु बनने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर बालक में सद्गुणों का विकास करना ही होगा अन्यथा वह शिक्षक ही बना रहेगा । ऐसी स्थिति में शिक्षक को गुरु जैसे सम्मान प्राप्त नहीं हो सकता है।
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